पाकिस्तान कर रहा सिख श्रद्धालुओं को उनके पूजा-पाठ के अधिकार से वंचित

punjabkesari.in Sunday, Sep 13, 2026 - 03:31 AM (IST)

पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों से जुड़े गहरे तनाव की एक स्पष्ट याद दिलाते हुए, हाल ही में पाकिस्तान के सिख तीर्थयात्रियों के एक जत्थे को अपनी पवित्र यात्रा पूरी करने से रोक दिया गया, जो श्री हेमकुंट साहिब यात्रा और प्रकाश पर्व समारोहों सहित धार्मिक तीर्थयात्राओं के लिए भारत जाने का प्रयास कर रहा था। दिल्ली, पंजाब और उत्तराखंड के ऐतिहासिक तीर्थस्थलों के दर्शन के लिए भारत सरकार द्वारा वैध वीजा दिए जाने के बावजूद, 100 से अधिक श्रद्धालुओं के इस समूह को पाकिस्तानी आव्रजन (इमिग्रेशन) अधिकारियों द्वारा अचानक खड़ी की गई नौकरशाही बाधाओं का सामना करना पड़ा।

मनमाने नियमों की भेंट चढ़े वित्तीय बलिदान : भारत सरकार द्वारा जारी वैध वीजा से लैस 104 श्रद्धालुओं के इस समूह ने श्री हरमंदिर साहिब और श्री हेमकुंट साहिब सहित पवित्र स्थलों की तीर्थयात्रा पर जाना था। मौजूदा भू-राजनीतिक प्रतिबंधों के कारण वाघा सीमा के सीधे जमीनी मार्ग से जाने से रोके जाने पर, इन तीर्थयात्रियों ने अपने आध्यात्मिक दायित्वों को पूरा करने के लिए असाधारण कदम उठाए। अपनी निजी बचत का त्याग करते हुए और सामूहिक रूप से लगभग 2 करोड़ पाकिस्तानी रुपए खर्च करके, उन्होंने नई दिल्ली पहुंचने के लिए शारजाह के रास्ते वैकल्पिक हवाई यात्रा की व्यवस्था की। इसके बावजूद, उनकी भक्ति को सुविधा की बजाय अचानक नौकरशाही की शत्रुता का सामना करना पड़ा। हवाई अड्डे पर, आव्रजन अधिकारियों ने अनापत्ति प्रमाण पत्र (एन.ओ.सी.) न होने का हवाला देते हुए अचानक उनकी रवानगी रोक दी, एक ऐसी शर्त, जिसकी न तो पहले कोई जानकारी दी गई थी और न ही इसे नियमित रूप से लागू किया जाता था।

पी.आर. का मुखौटा बनाम संस्थागत शत्रुता :  यह पाकिस्तान द्वारा अपने गैर-मुस्लिम नागरिकों के लंबे समय से चले आ रहे सुनियोजित उत्पीडऩ का ताजा अध्याय है। हालांकि इस्लामाबाद धार्मिक सद्भाव का दिखावा करने के लिए सिख तीर्थयात्राओं से जुड़े पी.आर. (जनसंपर्क) अभियानों का नियमित रूप से सहारा लेता है, लेकिन जमीनी हकीकत एक ऐसे सुनियोजित सरकारी तंत्र को उजागर करती है, जिसका मकसद अल्पसंख्यकों को डराना, हाशिए पर धकेलना और उनकी बुनियादी मानवीय गरिमा को छीनना है।

प्रशासनिक बाधाओं का एक तय ढर्रा : यह घटना कोई छिटपुट प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों द्वारा झेली जाने वाली संस्थागत उदासीनता और व्यवस्थागत पाबंदियों के व्यापक ढर्रे को दर्शाती है। जहां पाकिस्तानी हुकूमत सीमा पार सिख तीर्थयात्राओं का इस्तेमाल जनसंपर्क के एक साधन के रूप में अक्सर करती है, वहीं जमीनी हकीकत कहीं अधिक चिंताजनक तस्वीर पेश करती है। जब अल्पसंख्यक नागरिक विदेशों में पवित्र स्थलों के दर्शन करके अपनी धार्मिक स्वतंत्रता के बुनियादी अधिकार का इस्तेमाल करने का प्रयास करते हैं, तो उन्हें अंतिम समय के नियमों के जाल, मनमानी एन.ओ.सी. मांगों और वित्तीय संकट का सामना करना पड़ता है।

पहचान और मौलिक अधिकारों का हनन : पाकिस्तान में सिख अल्पसंख्यकों के लिए, जिनकी आबादी लक्षित धर्मांतरण, सुरक्षा खतरों और सामाजिक अलगाव के कारण हाल के दशकों में तेजी से घटी है, पवित्र तीर्थयात्रा करने की अनुमति न मिलना उनकी आस्था और पहचान पर सीधा प्रहार करता है। किसी मेजबान राष्ट्र द्वारा जारी किया गया धार्मिक वीजा आध्यात्मिक पूर्ति को सुगम बनाने के लिए होना चाहिए, न कि घरेलू अधिकारियों द्वारा नौकरशाही प्रतिशोध को जन्म देने के लिए।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जांच की मांग : इन फंसे हुए तीर्थयात्रियों की दुर्दशा अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और धार्मिक स्वतंत्रता की निगरानी करने वाली संस्थाओं द्वारा पाकिस्तान के अपने अल्पसंख्यक समुदायों के प्रति व्यवहार की बारीकी से जांच करने की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है। आध्यात्मिक आस्था को कभी भी नौकरशाही दबाव या राजनीतिक पैंतरेबाजी का बंधक नहीं बनाया जाना चाहिए। सच्ची धार्मिक स्वतंत्रता के लिए यह अनिवार्य है कि अल्पसंख्यकों को बिना किसी भय या अवरोध के अपने धर्म का पालन करने के लिए आवश्यक गरिमा, सुरक्षा और आवागमन की स्वतंत्रता दी जाए।-कृष्ण भनोट


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