‘हमने क्या खोया-हमने क्या पाया’ भारत और चीन के बीच करीब 10

2021-02-21T03:14:32.89

महीनों से वास्तविक नियंत्रण रेखा (एल.ए.सी.) पर जारी गतिरोध वाले माहौल के बाद दोनों देशों की सेनाओं की वापसी की प्रक्रिया शुरू हो गई है। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने 11 फरवरी को संसद में जानकारी देते हुए कहा कि समझौते के अनुसार दोनों देश पैंगोंग त्सो झील के उत्तरी तथा दक्षिण क्षेत्रों से क्रमवार सेना पीछे हटाने के लिए सहमत हो गए हैं। 

उन्होंने यह भी कहा कि इस संधि के अनुसार भारत ने कुछ भी नहीं खोया और हम किसी भी देश को अपनी 1 इंच जमीन भी नहीं सौंपेंगे। चीन अपनी सेनाओं की 135 कि.मी. वाली पैंगोंग त्सो झील की फिंगर-8 (पहाड़ी) से पीछे सिरजाप पोस्ट के निकट वापसी करेगा और भारत अपनी सेना फिंगर-3 वाली जगह के नजदीक धनसिंह थापा पक्की पोस्ट तक सीमित रखेगा। 

पैंगोंग त्सो के इस 10-12 कि.मी. वाले क्षेत्र के भीतर दोनों देशों की ओर से फिलहाल पैट्रोलिंग करने पर रोक लगा दी गई है। पहले पड़ाव का कार्य पूरा होने के बाद उसकी सांझे तौर पर जांच की जाएगी तथा उसके बाद ही अगली कार्रवाई सम्भव हो पाएगी। इस समझौते को लेकर पूर्व रक्षामंत्री ए.के. एंटनी तथा कुछ अन्य सांसदों की ओर से वर्तमान बजट सत्र के दौरान उजागर किए गए पहलुओं के बारे उन्हें चुप करा दिया गया। 

लातों के भूत बातों से नहीं मानते
उल्लेखनीय है कि पैंगोंग त्सो झील के उत्तर-दक्षिण की ओर 8 पहाडिय़ों वाला क्षेत्र है जिसको फिंगर कहा जाता है। 1962 के युद्ध के उपरांत चीन की सेना फिंगर-8 तक वापस आ गई थी। वैसे भी भारत के दस्तावेजों के अनुसार एल.ए.सी. फिंगर-8 के पूर्वी क्षेत्र से गुजरती है। उस समय से लेकर भारतीय सेना की टुकडि़या अक्सर फिंगर-4 से लेकर 8वीं पहाड़ी के बीच पैट्रोलिंग करती रहीं। गत वर्ष के शुरू में पी.एल.ए. ने तिब्बत में सैन्य अभ्यास करने के बाद पूर्वी लद्दाख में पड़ती 823 कि.मी. वाली एल.ए.सी. के इर्द-गिर्द तोपों, टैंकों, संचार साधनों तथा हथियारों के भंडार इत्यादि सहित भारी गिनती में सेना को स्थापित करना शुरू कर दिया तथा वायुसेना भी सरगर्म हो गई। 

पी.एल.ए. ने एल.ए.सी. पार करके 5-6 मई को पैंगोंग त्सो झील के उत्तर-पूर्व से भारतीय क्षेत्र में प्रवेश कर गैर-जिम्मेदाराना हरकतें कीं तथा हमारे खुफिया तंत्र को इसकी भनक उस समय लगी जब चीनी सैनिकों ने फिंगर-4 तथा 5 के दरमियान पैट्रोलिंग कर रही सुरक्षा फोर्स पर तारों वाले सरिए, डंडों तथा पत्थरों से हमला कर दिया। हमारे कुछ जवान जख्मी भी हुए। फिर इस क्षेत्र में पी.एल.ए. ने निर्माण कार्य आरम्भ कर दिए। 

कहीं टैंट लग गए, बंकर बनाए गए तथा हैलीपैड भी आप्रेशनल हो गए। नौसेना की किश्तियां भी यहां पर पहुंचनी शुरू हो गईं। जब सेना तथा कूटनीतिक स्तर पर कई बैठकों के दौरान अनधिकृत तौर पर बैठे चीनी सैनिकों को वहां से हटाया न गया तो फिर हमारे बहादुर जवानों ने फिंगर-4 के दक्षिण में पड़ते 15 हजार फुट की ऊंचाई वाले कैलाश रेंज तथा कठोर चुनौतियों से भरपूर तथा रणनीतिक महत्ता वाली 6-7 चोटियों पर अगस्त के आखिर में कब्जा कर लिया। यह वह महत्वपूर्ण क्षेत्र है जहां से पी.एल.ए. के बेस कैम्प तथा उसकी गन पोजीशनों तथा टैंकों पर निगाह रखी जा सकती है। 

एक पुरानी कहावत  ‘‘लातों के भूत बातों से नहीं मानते।’’ यहां पर लागू होती है। फिर जाकर पेइचिंग को समझौता करना पड़ा जिसको अलग-अलग नजरिए से देखा जा सकता है। नि:संदेह चीन तो फिंगर-4 से 8 तक का क्षेत्र खाली कर देगा मगर हमें तो फिंगर-4 से पीछे फिंगर-3 तक हटना पड़ा तथा इसके साथ-साथ अत्यंत रणनीतिक महत्ता वाला क्षेत्र भी हमारे हाथों से जाता रहा। फिर भी क्या खोया क्या पाया, इसका फैसला तो पाठक ही कर सकते हैं। 

बाज वाली नजर
दोनों देशों के प्रतिनिधियों की ओर से पहले पड़ाव के समझौते के अनुसार निरीक्षण करने के उपरांत गोगरा, हॉट सिंप्रिग पैट्रोलिंग प्वाइंट-14, 15, 7 के बारे में सेना के अधिकृत वाले क्षेत्र संबंधी बातचीत होनी है। असली समस्या तो 16 हजार फुट की ऊंचाई वाले 900 वर्ग कि.मी. में फैले देपसांग समतल क्षेत्र की है जोकि सीयोक दरिया के उत्तर क्षेत्र में पड़ता है। इसके ज्यादातर क्षेत्रफल पर भारतीय सेना का कब्जा है और पी.एल.ए. पूर्वी हिस्से में तैनात है। 

वास्तव में पेइचिंग माओ त्से तुंग के सिद्धांत के अनुसार तिब्बत दाएं हाथ की हथेली तथा लद्दाख, नेपाल, सिक्किम, भूटान तथा अरुणाचल प्रदेश पांच उंगलियां हैं जिसको मुक्त करवाना वह लाजिमी समझता है। यही एक कारण है कि चीन से पंचशील से लेकर सीमावर्ती क्षेत्र का समाधान ढूंढने की खातिर कई समझौते 1993, 1996, 2005 तथा 2013 इत्यादि में हुए मगर चीन की ओर से बार-बार इसकी उल्लंघना की गई। क्योंकि उसकी नीयत में खोट है और उसके इरादे नेक नहीं।-ब्रिगे. कुलदीप सिंह काहलों (रिटा.)
 


Content Writer

Pardeep

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