क्या बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखा जाना चाहिए?

punjabkesari.in Monday, Jun 29, 2026 - 05:08 AM (IST)

इस समय दुनिया भर में बचपन से संबंधित नीतियों को नए सिरे से गढ़ा और विचारा जा रहा है। वे सरकारें जो कभी इंटरनैट को इतिहास का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक साधन बताकर इसकी सराहना करती थीं, अब एक ऐसा सवाल पूछ रही हैं, जिसे उठाना एक दशक पहले बेहद वर्जित प्रतीत होना था-क्या 16 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया का उपयोग करने की अनुमति होनी चाहिए?

2025 के अंत में ऑस्ट्रेलिया ने इस सवाल का स्पष्ट जवाब ‘नहीं’ में दिया और 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया खातों पर देशव्यापी प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद ब्रिटेन, इंडोनेशिया, मलेशिया और कई अन्य देशों ने भी इसी तरह के कदम उठाने की घोषणा की है। जो चिंता कभी कुछ फिक्रमंद माता-पिता तक सीमित थी, वह अब मुख्यधारा की सार्वजनिक नीति और चर्चा का विषय बन चुकी है।

इसका कारण समझ पाना कठिन नहीं है। विकसित देशों में वह पीढ़ी, जो अपनी जेबों में स्मार्टफोन लेकर बड़ी हुई है, मानसिक संकट के लक्षण दिखा रही है। किशोरों में ङ्क्षचता, उदासी, अकेलापन और खुद को नुकसान पहुंचाने तक की घटनाओं की दर बढ़ रही है। जब फेसबुक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट और टिकटॉक हमारे सामने आए थे, उनका स्वागत आपसी संपर्क के चमत्कारी साधनों के रूप में किया गया था, ऐसे साधनों के रूप में, जिन्होंने दूरियां घटा दीं, संचार को लोकतांत्रिक बनाया और बच्चों एवं किशोरों को अपनी आवाज दी। किशोरों ने इन्हें बहुत उत्साह के साथ अपनाया और फिर धीरे-धीरे यह उनका जुनून ही बन गए। कोविड महामारी के आगमन ने इस रुझान को और तेज कर दिया। लॉकडाऊन ने बच्चों को घरों और स्क्रीनों तक सीमित कर दिया। इसके बाद शोध का एक बड़ा सिलसिला सामने आया, जिसका निष्कर्ष था कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म सिर्फ बातचीत या संचार के तटस्थ साधन नहीं हैं। ये बड़ी सोच-समझकर तैयार की गई ‘ध्यान खींचने वाली मशीनें’ हैं, जिनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उपयोगकत्र्ता, विशेष रूप से युवा, कभी भी स्क्रॉलिंग करना बंद करना न चाहें। 

अध्ययन यह तो दर्शाते हैं कि सोशल मीडिया के बहुत अधिक उपयोग और खराब मानसिक स्वास्थ्य के बीच संबंध हो सकता है लेकिन ये संबंध हमेशा सीधे तौर पर कारण नहीं माने जा सकते। इसके अलावा यह सवाल भी उठता है कि पूर्ण प्रतिबंध से बच्चे क्या कुछ खो बैठेंगे। बहुत-से युवाओं के लिए सोशल मीडिया सीखने, दोस्ती करने और अपने जैसे लोग ढूंढने का जरिया है, विशेष रूप से उनके लिए, जो अकेले हैं, हाशिए पर हैं या अपने आस-पास के लोगों और सामाजिक माहौल से अलग हैं। किसी छोटे कस्बे के उस किशोर के लिए, जो स्थानीय ढांचे में फिट नहीं बैठता, ऑनलाइन समुदाय खतरे की बजाय सहारा साबित हो सकता है। पूर्ण प्रतिबंध का विरोध करने वाले चेतावनी देते हैं कि प्रतिबंध बच्चों को इंटरनैट के अन्य कम नियंत्रित और अधिक अंधेरे कोनों की ओर धकेल सकते हैं, जिसका नुकसान कहीं अधिक होगा। समस्या खुद तकनीक नहीं, बल्कि इसके उपयोग के बारे में शिक्षा, मार्गदर्शन और जिम्मेदारी की कमी है।

भारत की स्थिति बुनियादी तौर पर अलग है। देश ने इतिहास में सबसे तेज डिजिटल बदलावों में से एक देखा है। एक ही पीढ़ी के भीतर, करोड़ों परिवारों के पास पहली बार स्मार्टफोन और इंटरनैट की पहुंच आई है। इसके परिणाम असाधारण रहे हैं और इसके फायदे भी सबके सामने हैं। लेकिन इसने एक बड़ा विरोधाभास भी पैदा किया है-भारत के अनगिनत घरों में बच्चा ही परिवार का सबसे अधिक तकनीकी जानकारी रखने वाला सदस्य है। घर के वयस्क अपने बच्चों से केवल 1 या 2 साल पीछे नहीं, अक्सर और कई मामलों में वे एक बिल्कुल अलग दुनिया में जी रहे होते हैं। 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध भारत में लागू करना कठिन होगा और शायद इससे समाधान कम और बहस अधिक पैदा होने की संभावना है। देश का विशाल क्षेत्र, डिजिटल बुनियादी ढांचे में असमानता और जिस आसानी से उम्र के प्रतिबंधों को बाईपास किए जा सकने की संभावना है, वे सिर्फ प्रतिबंध लगा देने को नाकाफी जवाब सिद्ध करेंगे।

भारत को एक बहु-स्तरीय रणनीति की आवश्यकता है, जो प्लेटफॉर्मों पर उम्र के सत्यापन, बच्चों और माता-पिता दोनों के लिए डिजिटल साक्षरता कार्यक्रमों और स्कूलों के पाठ्यक्रम में ऑनलाइन खतरों के बारे में शिक्षा को शामिल करे। डिजिटल स्पेस में बच्चों के लिए कानूनी सुरक्षा को भी मजबूत और लागू करने की आवश्यकता है। नीति-निर्माताओं को इस लालच से बचना चाहिए कि माता-पिता की निगरानी को ही प्राथमिक समाधान मान लिया जाए, जबकि निगरानी की कमी खुद समस्या का एक हिस्सा है। देश के बच्चे दुनिया के सबसे बड़े और सबसे तेजी से बढ़ते डिजिटल वातावरण में बड़े हो रहे हैं और डिजिटल उपयोग के बारे में अक्सर वे अपना नेतृत्व करने के लिए जिम्मेदार वयस्कों से कई कदम आगे होते हैं। इस कारण भारत के लिए यह चुनौती बहुत बड़ी और अलग किस्म की है। इस चुनौती का सही जवाब खोजना हमारे समय की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में से एक है।-सुकीरत आनंद 


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