ऑनलाइन अश्लील सामग्री से बिगड़ते बच्चे

punjabkesari.in Friday, Jun 26, 2026 - 05:38 AM (IST)

सोशल मीडिया पर बच्चों के लिए आसानी से उपलब्ध अश्लील सामग्री चिंता का विषय है। पिछले दिनों आगरा से सामने आए एक मामले ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि बच्चों के लिए ऑनलाइन डिजिटल प्लेटफॉर्म कितने सुरक्षित हैं। वहां के फतेहाबाद रोड इलाके की रहने वाली एक महिला ने एक प्रचलित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर आपत्तिजनक कंटैंट देखने के बाद एक सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर के खिलाफ साइबर थाने में शिकायत दर्ज कराई है। 

महिला का कहना था कि उनके बच्चे मोबाइल पर रील्स देख रहे थे, तभी अचानक एक ऐसी रील सामने आ गई, जिसमें अश्लील और डबल मीनिंग कंटैंट था, जिसे देखकर बच्चे असहज और परेशान हो गए। जब महिला ने खुद वह वीडियो देखा, तो वह भी काफी विचलित हो गई। इस महिला का मानना है कि इस तरह का कंटैंट बच्चों के मानसिक विकास और पारिवारिक माहौल दोनों के लिए खतरनाक है। आजकल हमारे आसपास यही कुछ हो रहा है, बच्चा मां-बाप को तंग करे तो उसके हाथ में मोबाइल पकड़ा दो, उसे रील चलाने दो, चाहे उसमें अश्लील फिल्म ही क्यों न चलने लगे।

इंटरनैट के बढ़ते इस्तेमाल ने हमारे लिए एक तरफ जहां जानकारी का भंडार खोल दिया है, वहीं इस पर बच्चों के लिए खुले तौर पर उपलब्ध अवांछनीय सामग्री से सांस्कृतिक खतरे भी तेजी से बढ़े हैं। हाल ही में एक सर्वे में भारतीय माता-पिता की एक गंभीर समस्या सामने आई। इस सर्वे के मुताबिक, देश में 300 से ज्यादा शहरों में हर दूसरे पेरैंट्स का मानना है कि उनके बच्चों ने इंटरनैट पर या तो गलत कंटैंट देखा है या साइबर बुलिंग का शिकार हुए हैं। इंटरनैट पर बुलिंग और गलत कंटैंट के एक्सपोजर का बच्चों के मानसिक और व्यावहारिक विकास पर काफी गहरा असर पड़ रहा है।

इंटरनैट पर उपलब्ध हिंसक गेम्स या वीडियो बच्चों के दिमाग को इस कदर प्रभावित करते हैं कि वे असल जिंदगी में भी बात-बात पर गुस्सा करने लगते हैं। सर्वे में भी यह बात सामने आई है कि बच्चों का व्यवहार पहले की तुलना में ज्यादा आक्रामक हुआ है। वे अपनी भावनाओं पर नियंत्रण खोने लगते हैं। साइबर बुलिंग (अर्थात इंटरनैट, सोशल मीडिया, मैसेजिंग ऐप्स या अन्य डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल करके किसी व्यक्ति को डराने, धमकाने, नीचा दिखाने या परेशान करने की ऑनलाइन प्रक्रिया) का शिकार होने पर बच्चे अक्सर हीन भावना से भर जाते हैं। उन्हें डर होता है कि बाहर जाने पर लोग उनका मजाक उड़ाएंगे या उन्हें दोबारा निशाना बनाया जाएगा। इस डर के कारण वे खुद को कमरे में बंद कर लेते हैं और परिवार व दोस्तों से दूर होकर अकेलेपन का शिकार हो जाते हैं। ऑनलाइन डराए-धमकाए जाने के कारण बच्चों में नींद न आना, भूख की कमी और पढ़ाई में मन न लगने जैसी समस्याएं पैदा होती हैं। लंबे समय तक यह स्थिति रहने पर वे एंग्जाइटी या डिप्रैशन की ओर बढ़ सकते हैं।

आज के डिजिटल दौर में सोशल मीडिया हर किसी की जिंदगी का हिस्सा बन गया है। खासकर 13 से 18 साल के बच्चे सबसे ज्यादा सक्रिय हैं। अमरीका की कैलिफोर्निया अदालत में मेटा ने बड़ा खुलासा किया। सोशल मीडिया पर 13-15 साल के करीब 20 प्रतिशत बच्चे ऐसी न्यूड और अश्लील तस्वीरें देख रहे हैं, जिन्हें वे देखना नहीं चाहते। कंपनी की रिसर्च के मुताबिक, यह कंटैंट बिना मांगे बच्चों के सामने आता है। एल्गोरिद्म की वजह से ऐसे फीड बार-बार दिखाई देते हैं। मनोविज्ञान के विशेषज्ञों का कहना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का अश्लील कंटैंट बच्चों के मानसिक और भावनात्मक विकास पर नकारात्मक असर डाल सकता है। इस समय बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर सीमित प्रतिबंध लगाने की मांग दुनिया भर में तेजी से बढ़ रही है। यह कोई बुरा सुझाव नहीं है। हो सकता है कि इससे हमारे देश के बच्चों के नैतिक मूल्यों को कुछ सुरक्षा मिल जाए।-डा. वरिन्द्र भाटिया 


सबसे ज्यादा पढ़े गए

Related News