क्या पंजाब के लोग झूठे वायदों की राजनीति को सबक सिखाना सीख गए हैं

punjabkesari.in Monday, Jun 27, 2022 - 04:39 AM (IST)

हलका संगरूर से लोकसभा उप-चुनावों में सिमरनजीत सिंह मान की ऐतिहासिक विजय ने आम आदमी पार्टी (आप) का ताना-बाना हिलाकर रख दिया है। मान को हलका संगरूर के 9 हलकों से कुल 253154 वोटें पड़ीं, जबकि  आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार गुरमेल सिंह घराचो कड़ी टक्कर देने के बावजूद 5822 वोटों के अंतर से चुनाव हार गए। ‘आप’ उम्मीदवार को 247332 वोटें पड़ीं। इनके अलावा कांग्रेस, भाजपा, अकाली दल के उम्मीदवारों की जमानतें जब्त हो गईं।

पंजाब के चुनावी इतिहास में यह पहला अवसर है जब 3 बड़ी पारम्परिक पार्टियों की जमानतें जब्त हुई हों। दूसरी ओर अधिकतर चुनावों में अपनी जमानतें जब्त करवाने वाली पार्टी शिरोमणि अकाली दल अमृतसर ने पहली बार 4 बड़ी पाॢटयों को हराकर अपनी जीत का झंडा बुलंद किया है। पंजाब की राजनीति में संगरूर का यह चुनाव इतिहास के पन्ने के तौर पर सदा याद रहेगा। 

आमतौर पर कोई भी उप-चुनाव, चाहे लोकसभा का हो या विधानसभा का, उसे सत्ताधारी पार्टी ही जीतती है क्योंकि अफसरशाही, लोगों की आशाएं, लोगों के कामकाज तथा अन्य राजनीतिक ताने-बाने सरकार से बंधे होते हैं। इसलिए लोग शासक पार्टी के हक में वोट डालते हैं। मगर यदि लोगों में किसी लम्बे शासनकाल के बाद किसी तरह की निराशा फैल जाए तो यकीनन विरोधी दलों को जीत हासिल होती है। जिस तरह 1994 में गिद्दड़बाहा के उप-चुनाव में लोगों ने तत्कालीन बेअंत सिंह की कांग्रेस सरकार को धोबी पटका देकर अकाली दल के उम्मीदवार मनप्रीत सिंह बादल को 1600 के करीब वोटों से जिताया था। इसके अतिरिक्त 2019 में दाखा के उप-चुनाव के दौरान शिरोमणि अकाली दल के उम्मीदवार मनप्रीत सिंह अयाली ने कैप्टन अमरेन्द्र सरकार के उम्मीदवार संदीप सिंह संधू को करीब 15000 वोटों से हराया था। 

परन्तु मात्र 3 महीने के समय में पंजाब के लोगों द्वारा बड़े बहुमत से चुनी आम आदमी पार्टी की सरकार के विरुद्ध फतवा आना अत्यंत हैरानीजनक और राजनीतिक माहिरों की समझ से बाहर है। जिला संगरूर ‘आप’ की राजनीतिक राजधानी है,आम आदमी पार्टी का अस्तित्व है। ‘आप’ के इंकलाब का बिगुल हलका संगरूर से बंधा है। जब 2019 के लोकसभा चुनावों में सारे भारत में ‘आप’ को एक भी सीट नहीं मिली थी, उस समय भी संगरूर ने ही आम आदमी पार्टी की लाज रखी थी। संगरूर के लोगों ने भगवंत मान को करीब 1 लाख 11 हजार वोटों से जिताकर लोकसभा में भेजा था। जहां से पंजाब में सरकार बनने की नींव रखी गई थी। 

2022 के विधानसभा चुनावों में यदि जिला संगरूर लोकसभा के 9 हलकों की बात करें तो हलका सुनाम से सर्वाधिक 94795 वोटें पड़ी थीं, जिनमें से 75277 वोटों की लीड थी। हलका दिड़बा से 82630 वोटें पड़ी थीं और 50655 वोटों की लीड थी। हलका संगरूर से 74851 वोटें पड़ीं और 36430 वोटों की लीड थी। हलका बरनाला से 64800 वोटें पड़ीं और 37622 वोटों की लीड थी। हलका भदौड़ से 63967 वोटें पड़ीं और 37558 वोटों की लीड थी। 

हलका लहरागागा से 60058 वोटें पड़ीं और 26518 वोटों की लीड थी। हलका महलकलां से 53714 वोटें पड़ीं और 30347 वोटों की लीड थी। यदि 2022 के विधानसभा चुनावों में संगरूर के कुल 9 हलकों का लेखा-जोखा करें तो आम आदमी पार्टी के इन 9 हलकों से 643354 वोटें पड़ी थीं और कुल 9 हलकों की लीड 373610 की थी। जबकि दूसरी ओर मान दल को इन 9 हलकों में 82578 वोटें पड़ी थीं। शिरोमणि अकाली दल मान केवल हलका महलकलां से ही अपनी जमानत बचा सका था जहां उनके उम्मीदवार गुरजंट सिंह को 23367 वोटें मिली थीं। मगर 3 महीनों के अंतराल में सिमरनजीत सिंह मान का ग्राफ तो अढ़ाई लाख से अधिक वोटों पर पहुंच गया मगर आम आदमी पार्टी साढ़े 6 लाख से सिकुड़ती हुई अढ़ाई लाख से भी नीचे रह गई। 

बेशक आम आदमी पार्टी की सरकार गत 3 महीनों में अपनी ओर से कई बढिय़ा काम करने का राग अलाप रही है और कई स्कीमें लागू करने की घोषणा भी कर रही है मगर लोगों का विश्वास जीतने में ‘आप’  नेता असफल रहे हैं। राज्यसभा में गैर-पंजाबियों को भेजने से पंजाब के लोगों में काफी गिला है, मंत्रियों व विधायकों द्वारा लोगों के फोन न उठाना, कार्यकत्र्ताओं को सम्मान न देना, महंगाई पर रोक न लगना, रिश्वतखोरी का पहले से बढ़ जाना, लोगों के दफ्तरों में कामकाज न होना, कानून-व्यवस्था की समस्या, गुरु साहिब की बेअदबियों के इंसाफ को नजरअंदाज करना, अफसरशाही का सरकार पर भारी पडऩा आदि कई अन्य बड़े कारण हैं। 

दूसरी ओर पंजाब के लोग किसी भी हालत में अकाली दल बादल तथा कांग्रेस को मुंह नहीं लगाना चाहते। ‘आप’ पंजाब के लोगों के लिए एक आशा की किरण है। लोगों की नाराजगी तथा गुस्सा जग जाहिर है, जिसे आम आदमी पार्टी समझ नहीं सकी। अपने गुस्से का ट्रेलर उन्होंने सिमरनजीत सिंह मान को जिताकर दिखा दिया है। यदि ‘आप’ की सरकार अब भी न संभली, पंजाब के मुद्दों को गंभीरता से न लिया, पंजाब के लोगों की आशाओं के अनुसार न चले तो फिर पंजाब के लोगों को अपनी राह बनानी आती है। अभी भी आम आदमी पार्टी का अधिक नुक्सान नहीं हुआ है। मगर पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान व उनकी सरकार को एक कड़े इम्तिहान की घड़ी से गुजरना होगा। प्रभु भला करें, पंजाब की राजनीति का रब्ब राखा।-जगरूप सिंह जरखड़
 


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