जनसमर्थन से ही हो सकता जनसंख्या नियंत्रण

2021-07-30T06:58:13.537

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जनसंख्या नियंत्रण नीति लागू करने के फैसले ने इस विषय को राजनीतिक गलियारों में चर्चा से लेकर आम लोगों के बीच सामाजिक विमर्श का केंद्र बना दिया है। राजनीतिक दल और अन्य संगठन अपने-अपने वोट बैंक और राजनीतिक नफा-नुक्सान को ध्यान में रखकर इसका विरोध अथवा समर्थन कर रहे हैं लेकिन अगर राजनीति से इतर बात की जाए तो यह विषय अत्यंत गंभीर है, जिसे वोट बैंक की राजनीति ने संवेदनशील भी बना दिया है। 

दरअसल आज भारत जनसं या के हिसाब से विश्व में दूसरे स्थान पर आता है और यू.एन. की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2027 तक भारत विश्व की सबसे अधिक जनसं या वाला देश बन जाएगा। मगर क्या हमने कभी सोचा है कि जनसंख्या के लिहाज से पहले स्थान पर आने वाले भारत के पास इतने संसाधन और इतनी जगह है जिससे यह अपने सपूतों को एक स मानजनक एवं सुविधाजनक जीवन दे सके? भारत के पास विश्व की कुल भूमि क्षेत्र का मात्र 2.4 प्रतिशत है जबकि भारत की आबादी दुनिया की कुल आबादी का 16.7 प्रतिशत है, जबकि विश्व के विकसित देशों की सामूहिक जनसं या 17 प्रतिशत के आसपास है। ये आंकड़े बता रहे हैं कि स्थिति कितना गंभीर रूप ले चुकी है। 

ऐसे ही कुछ और दिलचस्प आंकड़ों की बात की जाए तो विश्व का सबसे अधिक क्षेत्रफल वाला देश रूस जनसंख्या के मामले में 9वें स्थान पर है और जो चीन जनसं या के मामले में पहले स्थान पर आता है, वह क्षेत्रफल के हिसाब से विश्व में चौथे स्थान पर आता है, जबकि भारत 8वें स्थान पर। यानी भारत के पास भूमि कम है लेकिन इसकी जनसं या ज्यादा है। क्या इन परिस्थितियों में कोई भी देश गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा जैसी समस्याओं से लड़कर अपने नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार लाने की कल्पना भी कर सकता है? 

लेकिन इसे भारत का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि इस देश की राजनीति उस मोड़ पर पहुंच गई है जहां हर विषय वोट बैंक से शुरू हो कर वोट बैंक पर ही खत्म हो जाता है। खेती किसानी हो या फिर शिक्षा, स्वास्थ्य अथवा जनसं या जैसे मूलभूत विषय, सभी को वोट बैंक की राजनीति से होकर गुजरना पड़ता है। हमारे राजनेता अपने राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर उठ कर कुछ सोच ही नहीं पाते। विगत कुछ समय से यह देखा जा रहा है कि सत्ताधारी दल अगर किसी समस्या का समाधान खोजने के प्रयास में कोई कानून या नीति लेकर आता है तो विपक्ष उसके विरोध में उतर आता है। 

इस समय देश वाकई में अजीब दौर से गुजर रहा है जहां एक तरफ देश में जनसं या नियंत्रण के लिए कानून लाना वर्तमान परिस्थितियों में आवश्यक प्रतीत हो रहा है तो दूसरी तरफ इस विषय का राजनीतिकरण कर बड़े पैमाने पर इसका विरोध होने की आशंका भी बनी हुई है। इसलिए  जनसंख्या से संबंधित कोई भी कानून बनाने से पहले आवश्यक है कि इस विषय में जन जागरूकता लाई जाए। इससे लोग बढ़ती जनसं या के दुष्प्रभावों और सीमित परिवार के फायदों से परिचित ही नहीं होंगे बल्कि इस विषय में दुष्प्रचार से भ्र्रमित होने से भी बचेंगे। 

हालांकि उत्तर प्रदेश सरकार की प्रस्तावित जनसंख्या नियंत्रण नीति में  जनसंख्या नियंत्रित करने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करने की दिशा में सोचा गया है। इसीलिए प्रस्तावित नीति में परिवार नियोजन करने वाले परिवारों को सरकार की ओर से विशेष सुविधाएं दी जा रही हैं तो अधिक बच्चों वाले परिवारों को इन सुविधाओं से वंचित रखा जा रहा है। लेकिन इस विषय को लेकर राजनीतिक बयानबाजी अपने चरम पर है। उत्तरप्रदेश के उलट अगर भारत के ही राज्य केरल का उदाहरण लिया जाए तो यहां सबसे कम सकारात्मक जनसंख्या वृद्धि दर होने के साथ-साथ उच्चतम जीवन प्रत्याशा और उच्चतम लिंगानुपात है। 

यानी जनसंख्या की वृद्धि नियंत्रण में है, लोगों का जीवन स्तर बेहतरी की ओर अग्रसर है और लड़का-लड़की का अनुपात भी देश में सबसे अधिक है। गौरतलब है कि  केरल केवल जनसं या के मामले में ही बेहतर नहीं है वो साक्षरता के मामले में भी सबसे अधिक साक्षरता दर के साथ भारत का अग्रणी राज्य है। जबकि उत्तर प्रदेश न सिर्फ जनसं या के मामले में 29वें पायदान पर आता है बल्कि लिंगानुपात में भी 26 वें पायदान पर है।

यहां यह बता दिया जाए कि केरल में  जनसंख्या नियंत्रण के लिए कोई कानून नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है कि अगर हम यह समझें कि जनसंख्या को कानून से ही नियंत्रित किया जा सकता है तो ऐसा नहीं है। कानून अपने आप में अपर्याप्त रहेगा जब तक लोग उसे स्वेच्छा से स्वीकार न करें। इसलिए सरकार चाहे किसी राज्य की हो या केंद्र की, जनसं या नियंत्रण जैसे विषय पर जल्दबाजी में कानून लाकर जनसं या को कितना नियंत्रित कर पाएगी, यह तो समय बताएगा लेकिन बैठे-बिठाए विपक्ष को एक मुद्दा जरूर दे देगी। 

जैसे हमने प्लास्टिक को कानूनी तौर पर बैन करने से पहले देश में प्लास्टिक मुक्ति को जन आंदोलन बनाया, देश को स्वच्छ रखने के लिए स्वच्छता को भी जनांदोलन बनाकर उसमें जन-जन की भागीदारी सुनिश्चित की, उसी प्रकार जनसं या नियंत्रण के लिए भी कानून के साथ-साथ जनजागरूकता के लिए विभिन्न अभियान चलाए जाने चाहिएं, ताकि लोग स्वेच्छा से इसमें भागीदार बनें। जनसंख्या विस्फोट के दुष्परिणामों और सीमित परिवार के फायदों से अगर लोग जागरूक होंगे तो कोई दल कोई संगठन इसे लेकर वोट बैंक की राजनीति नहीं कर पाएगा। अत: वर्तमान परिस्थितियों में जनसं या नियंत्रण के लिए कानून जितना जरूरी है, उतना ही जनसमर्थन भी जरूरी है जो जनजागरण से ही संभव है।- डॉ.नीलम महेंद्र


सबसे ज्यादा पढ़े गए

Content Writer

Pardeep

Recommended News