ईरान को मिला नया लीडर, कितनी बदलेगी तस्वीर

punjabkesari.in Tuesday, Mar 10, 2026 - 05:45 AM (IST)

अमरीका और इसराईल द्वारा संयुक्त सैन्य अभियान के तहत तेहरान को निशाना बनाए जाने के बाद मध्य-पूर्व में स्थिति अत्यंत गंभीर हो गई है। इस सैन्य कार्रवाई में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद ईरान की सियासत में एक ऐसा मोड़ आ गया है, जिसने पूरी दुनिया की सांसें थाम दी हैं। अली खामेनेई के निधन के बाद उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को देश का नया सर्वोच्च नेता घोषित किया गया है। इस फैसले के बाद अमरीका और इसराईल की प्रतिक्रिया तेज हो गई है और मध्य-पूर्व में तनाव बढऩे की आशंका जताई जा रही है। 

मोजतबा खामेनेई ऐसे समय में सत्ता संभाल रहे हैं, जब ईरान गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। अमरीका और इसराईल ने चेतावनी दी है कि वे ईरान के परमाणु कार्यक्रम और सैन्य ठिकानों को पूरी तरह नष्ट करने तक नहीं रुकेंगे। पूरी दुनिया की नजरें अब तेहरान की अगली रणनीतिक चाल पर टिकी हैं। अब मोजतबा खामेनेई को यह तय करना है कि वह खामेनेई की मौत का बदला लेने के लिए ‘महायुद्ध’ का रास्ता चुनेंगे या फिर देश को विनाश से बचाने के लिए कूटनीति का सहारा लेंगे। 

अयातुल्ला अली खामेनेई, वह शख्सियत, जो दशकों तक ईरान की तकदीर का आखिरी फैसला लेते रहे, अब इस दुनिया में नहीं हैं। करीब 4 दशक तक अयातुल्ला अली खामेनेई ईरान के सिस्टम का चेहरा रहे। उन्होंने देश की अंदरूनी और बाहरी राजनीति पर अपना लगभग पूरा कंट्रोल रखा। उनकी मौजूदगी ही ईरान की सियासत की दिशा तय करती थी। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। अमरीकी-इसराईली हमले में उनकी मौत के बाद सत्ता के गलियारों में हलचल तेज है। सवाल सिर्फ नए चेहरे का नहीं, बल्कि उस राह का भी है, जिस पर ईरान आगे बढ़ेगा। यह ठीक है कि खामेनेई की मौत से ईरान की वर्तमान सरकार का तंत्र पूरी तरह ध्वस्त तो नहीं होगा लेकिन यह फिर कभी पहले जैसा भी नहीं हो पाएगा। खामेनेई ने अपनी जिंदगी में हमेशा पश्चिम और खास तौर से अमरीका को अविश्वास की निगाह से देखा। इसलिए, उनके बाद बदलाव आना तय है। इतना तो साफ है कि ईरान के खाड़ी देशों पर हमलों ने इन देशों की तेहरान के साथ सावधानीपूर्ण और संतुलित संबंध बनाए रखने की नीति को भारी हानि पहुंचाई है तथा खाड़ी देशों की इसराईल के साथ व्यापक सुरक्षा सांझेदारी की संभावनाओं के मार्ग को प्रशस्त किया है। यदि ईरान खाड़ी देशों में अपने हमलों को नहीं रोकता तो नि:संदेह बाकी के खाड़ी देश भी इस तरह का कदम उठा सकते हैं। 

इतना ही नहीं, यदि ईरान खाड़ी देशों में अपने अभियान को बढ़ाता है तो खाड़ी देशों के साथ एक व्यापक सैन्य संघर्ष की स्थिति भी बन सकती है। इसमें संदेह नहीं कि खाड़ी देशों पर ईरान के हमलों ने तेहरान के पश्चिम एशियाई क्षेत्र में कूटनीतिक रूप से और अधिक अलग-थलग पडऩे की संभावनाओं को बढ़ा दिया है। वहीं दूसरी तरफ, इन हालात में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती इसराईल-ईरान के बीच कूटनीतिक संतुलन बैठाना होगा। इसराईल हमारा बड़ा रक्षा भागीदार है, जबकि ईरान क्षेत्रीय संपर्क की दृष्टि से अहम है। खाड़ी और मध्य-पूर्व में करीब 90 लाख भारतीय रहते हैं। उनकी सुरक्षा पर अब सीधा असर पड़ेगा। भारत को मिलने वाली कुल विदेशी मुद्रा का लगभग 38 फीसदी हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। भारत अपनी लगभग 60 फीसदी ऊर्जा जरूरत इसी क्षेत्र से आयात करता है। अगर सप्लाई रुकी तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका बड़ा असर पड़ेगा। साथ ही, चाबहार पोर्ट के अलावा होर्मुज समुद्री मार्ग बंद होने से भारत के व्यापार पर बेहद प्रतिकूल असर पड़ेगा। भारत पहले से रूस से तेल खरीदने को लेकर अमरीकी दबाव में है। ऐसे में यह स्थिति भारत के लिए कूटनीतिक और आॢथक रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण है। भारत के ईरान से ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंध रहे हैं। अब नए नेतृत्व के साथ तालमेल बैठाना भी एक बड़ी कूटनीतिक परीक्षा होगी। 

कुल मिलाकर, खामेनेई की मौत केवल ईरान की नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र और दुनिया की राजनीति को बदल सकती है। आने वाले दिन निर्णायक साबित होंगे। अब सवाल यह है कि क्या ईरान में एक और क्रांति होगी या फिर सेना सत्ता अपने हाथ में ले लेगी? क्योंकि ईरान का सुप्रीम लीडर देश की राजनीति और सेना दोनों पर सबसे बड़ा नियंत्रण रखता है। इसलिए यह पद केवल धार्मिक या राजनीतिक नेतृत्व का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की दिशा तय करने वाला है। यही वजह है कि खामेनेई के बाद अब पूरी दुनिया की नजर तेहरान पर टिकी हुई है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि नया नेता कौन होगा, बल्कि यह भी है कि क्या ईरान की नीतियां बदलेंगी या फिर वही पुराना टकराव जारी रहेगा? खैर, ईरान की शासन व्यवस्था में क्या बदलाव आएगा, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन खामेनेई की मौत कई दूसरे देशों के लिए परेशानी की वजह जरूर बन सकती है।-रवि शंकर
 


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