‘दल-बदली’ असल में लोकतंत्र का खंडन
punjabkesari.in Sunday, Jul 26, 2026 - 05:11 AM (IST)
‘दल -बदल’ हकीकत में लोकतंत्र का खंडन है। लोकतंत्र का मूल सिद्धांत ‘जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा’ है। जबकि दल-बदल संबंधित ‘दल-बदलू’ द्वारा जनादेश के साथ किया गया विश्वासघात है। ‘दल-बदलू’ कभी भी ‘जनता का और जनता के लिए’ वाली भूमिका अदा नहीं कर सकता। वह अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए भविष्य में भी जनता से मिले समर्थन से दगा कमाएगा, या फिर राजनीति के खेल में दगा कमाने वाली शक्तियों की कठपुतली के रूप में हस्तक्षेप करेगा। अवसरवादी राजनीतिक नेताओं द्वारा आजकल की जा रही विशुद्ध रूप से स्वार्थी हितों से प्रेरित, सिद्धांतहीन दल-बदलियों के प्रति आम जनता की प्रतिक्रिया को भी उपर्युक्त अनुभवों की रोशनी में ही मापा जा सकता है। ‘दल-बदल’ का कारण, जन-हितैषी विचारधारा के प्रति समर्पित होकर जनता की भलाई के लिए राजनीतिक रणक्षेत्र में कूदना, जैसा कि नेता पार्टी बदलते समय अक्सर बयानबाजी करते हैं, बिल्कुल भी नहीं होता। बल्कि इस निंदनीय प्रवृत्ति का मुख्य कारण तो राजनीति को सत्ता का आनंद लेने और मनमर्जी से लूट-खसोट करने का साधन समझना है।
2014 में, मोदी सरकार द्वारा केंद्रीय सत्ता हथिया लेने के बाद ‘दल-बदल’ कराने के लिए भाजपा द्वारा साम-दाम-दंड-भेद की गंदी नीति के तहत हर ओछा हथियार इस्तेमाल किया जा रहा है। याद रहे ये दल-बदल सत्ता और धन के लोभ-लालच के तहत और भ्रष्टाचार करने के एवज में मिलने वाली सजा से बचने के लिए किए जा रहे हैं। आर.एस.एस. और इससे जुड़े संगठनों ने ई.डी., सी.बी.आई. आदि एजैंसियों द्वारा की जाने वाली संभावित कार्रवाइयों के जरिए दूसरे राजनीतिक दलों के भ्रष्ट और चरित्रहीन नेताओं को डराकर दल-बदल करवाने को एक ‘लाभदायक धंधा’ बना लिया है। इस काम में सरकारी व गोदी मीडिया, कॉर्पोरेट घराने और भगवा विचारों से प्रभावित नौकरशाह भी संघ-भाजपा का पूरा हाथ बंटा रहे हैं।
पूंजीवादी व्यवस्था में नैतिकता, सिद्धांतवादिता और स्वाभिमान की भावना से अछूतेपन के कारण आम लोग भी राजनीति में आई विकृतियों के खिलाफ आवाज नहीं उठाते। उल्टा, कई बार तो किसी न किसी लालच के वशीभूत होकर वे स्वार्थी ‘दल-बदलुओं’ का साथ देने में भी कोई शॄमदगी महसूस नहीं करते। ‘दल-बदल विरोधी कानून’ भी शासक वर्गों के नियंत्रण में होने के कारण ‘दल-बदल’ की इस घातक बीमारी को रोकने में सक्षम नहीं रहा।
अब उम्मीद सिर्फ आम लोगों की पैनी और उच्च राजनीतिक-विचारधारात्मक चेतना पर ही रखी जा सकती है। लोगों को जागरूक करके ही दल-बदलुओं को जनता से अलग-थलग करने की आशा की जा सकती है। दल-बदल, चाहे किसी भी दल के किसी भी बड़े या छोटे नेता द्वारा किया जाए, लोगों को चाहिए कि वे ऐसे खोटे इंसान का हर क्षेत्र में पूर्ण बहिष्कार करके उसे ‘बेइज्जत’ करें। यदि किसी राजनेता का अपनी वर्तमान पार्टी की नीतियों या विचारधारा से कोई मतभेद खड़ा हो गया है या उसे किसी अन्य विचारधारा से लगाव हो गया है, तो ऐसा व्यक्ति पहले वे सभी पद त्यागे, जो आम जनता द्वारा उसे उस पार्टी में रहते हुए बख्शे गए थे। साथ ही नई पार्टी में उसे निचले स्तर पर काम दिया जाए ताकि वह नई विचारधारा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता साबित कर सके। संभव है कई लोग इस प्रक्रिया को असंभव या व्यावहारिक न होने योग्य कहकर इसकी निंदा करें। परंतु फिर भी हर बीमारी का इलाज ‘जनता’ रूपी डॉक्टर के पास ही है। जनता को इस योग्य बनाए जाने की जिम्मेदारी वामपंथी, लोकतांत्रिक और प्रगतिशील ताकतों तथा लोकतंत्र के सच्चे समर्थक बुद्धिजीवियों के कंधों पर ही है।-मंगत राम पासला
