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सरकार महामारी को नियंत्रित करने में ‘सक्षम’ नहीं

2020-09-13T04:17:06.237

संसद सत्र 180 दिनों की समय-सीमा समाप्त होने से 5 दिन पहले 14 सितम्बर को बुलाया जाएगा। संविधान का अनुच्छेद-85 कहता है कि संसद के 2 सत्रों के बीच 6 महीने से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए यानी कि 180 दिन। भारत के समकालीन इतिहास में यह एक असाधारण क्षण है। 

कोविड-19 महामारी में वैश्विक प्रमाण की एक सदी में पहली बार भारतीय लोग, केंद्र और राज्य सरकारें चरम सीमा का परीक्षण कर रही हैं। 44 लाख से अधिक मामलों और 75,000 मौतों के साथ भारत अब ब्राजील से आगे और अमरीका के पीछे है। भारत अब दुनिया में दूसरे स्थान पर है। हालांकि वक्र समतल नहीं है यह 90 डिग्री ऊपर की ओर एक लड़ाकू विमान की तरह चढ़ाई कर घूम रहा है। 135.26 करोड़ लोगों में से मात्र 5 करोड़ लोगों के परीक्षण के साथ भारत बहुत लम्बे समय से किसी भी टीके को नहीं देख सका। वास्तविकता यह है कि मृत्युदर कम है जो रक्षात्मक रूप से राहत की बात है। हालांकि यह दुर्भाग्यवश अस्थायी साबित हो सकता है। 

दुनिया में सबसे खतरनाक लॉकडाऊन और वह भी 4 घंटे के नोटिस पर पूरी तरह से विफल रहा। इस तथ्य से ज्यादा कुछ भी नहीं है कि 22 मार्च को जनता कफ्र्यू लागू होने के दिन भारत में 381 मामले और 7 मौतें हुई थीं। 6 महीने बाद आंकड़े दर्दनाक हो चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का दुर्भाग्यपूर्ण दावा है कि, ‘‘आज पूरा देश कोरोना वायरस के खिलाफ  युद्ध लड़ रहा है। महाभारत 18 दिनों में जीता गया था लेकिन कोरोना वायरस के खिलाफ युद्ध को 21 दिन लगेंगे।’’ 

मोदी की यह बात एक बुरे मजाक की तरह लगती है। एक सवाल जो पूरा देश पूछ रहा है कि सरकार महामारी को नियंत्रित करने में सक्षम क्यों नहीं हुई है? खास कर तब जब चीन जहां से इस दुष्ट बीमारी की उत्पत्ति हुई वह भी इससे बाहर निकलने में सफल रहा। दुनिया भर में संक्रमण आज 27 मिलियन से अधिक है और बीमारी से लगभग 8 लाख 90 हजार से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। 

हालांकि चीन में वायरस खत्म हो चुका है, लेकिन पिछले साल राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने चिकित्सा पेशेवरों के लिए एक पुरस्कार समारोह के दौरान कहा कि चीन ने यात्रा प्रतिबंधों के संयोजन के माध्यम से इस वायरस पर जीत प्राप्त की जिसे चीन ने एक असाधारण और ऐतिहासिक परीक्षण के रूप में पारित किया था। कोरोना वायरस के खिलाफ लोगों की लड़ाई में शी ने कहा,‘‘हम आर्थिक सुधार और कोविड-19 के खिलाफ युद्ध में दुनिया का नेतृत्व कर रहे हैं।’’ केरल में पहला मामला दर्ज किए जाने के 52 दिनों के बाद एन.डी.ए. सरकार ने 30 मार्च को जनता कफ्र्यू की घोषणा की। 

दुर्भावनापूर्ण और खराब तरीके से निष्पादित लॉकडाऊन का सबसे गंभीर असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। लॉकडाऊन के शुरूआती दिनों में यह स्पष्ट हो गया था कि महामारीविद अर्थशास्त्री तथा अर्थशास्त्री महामारीविदों में बदल गए हैं। जबकि पूर्व में अर्थव्यवस्था चरमरा गई थी। 2019-20 के वित्त वर्ष की चौथी तिमाही के आर्थिक आंकड़ों में अनुमान लगाया गया कि जी.डी.पी. की वृद्धि दर 3.1 प्रतिशत रहेगी। तथ्य यह है कि पिछले चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के आॢथक आंकड़ों के अनुसार उम्मीद की जा रही थी कि लॉकडाऊन ने भारतीय अर्थव्यवस्था को नीचे कर लिया है। 

2019-20 की पहली तिमाही में जी.डी.पी. 35.35 लाख करोड़ से सिकुड़ कर 2020-21 की पहली तिमाही में 26.90 लाख करोड़ हो गई। 2019-20 की पहली तिमाही में 5.2 प्रतिशत की वृद्धि की तुलना में 23.9 प्रतिशत का संकुचन दिखाई दिया। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय  (एन.एस.ओ.) द्वारा आधिकारिक बयान दिया गया जिसमें कहा गया कि सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था के बारे में बात करने के प्रयास सबसे दयनीय और खराब स्थिति में हैं। 

एक और मुद्दा वह राज्यों को जी.एस.टी. मुआवजे का है। जब 2015 से 2017 तक जी.एस.टी. ढांचे पर बातचीत की जा रही थी, एन.डी.ए.-भाजपा सरकार ने राज्यों से वायदा किया था कि उनके उप-सम्प्रभु कर लगाने के अधिकार के बदले में उनको  राजस्व में 14 प्रतिशत चक्र वृद्धि की क्षतिपूर्ति की जाएगी। यह 2022 तक किसी विशेष वर्ष में उस आंकड़े और वास्तविक जी.एस.टी. संग्रह के बीच अंतर की गणना करना था। जी.एस.टी. शासन के कार्यान्वयन को सुचारू बनाने और राज्यों को राजस्व संग्रह में कमी की क्षतिपूर्ति के लिए इस व्यवस्था को रखा गया था। यह राष्ट्र के संघीय ढांचे पर एक हमले जैसा है। संसद संभावित रूप से संविधान के अनुच्छेद 1 के लिए बहुत उत्तेजित होगी जिसमें कहा गया है कि भारत राज्यों का संघ होगा। संसद में बहुत कठिन और खोजपूर्ण प्रश्र होंगे कि क्या भारत मुकाबला करने के लिए तैयार था? चीन-पाकिस्तान के साथ संघर्ष, कोविड-19 महामारी और धराशायी हुई अर्थव्यवस्था निश्चित तौर पर एक बड़े सवाल हैं।-मनीष तिवारी


Pardeep

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