सावरकर को ‘भारत रत्न’ देने की मांग को लेकर विवाद
punjabkesari.in Tuesday, Feb 17, 2026 - 03:56 AM (IST)
हिंदू विचारक विनायक दामोदर सावरकर को भारत रत्न देने की मांग ने कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष और भाजपा के बीच चल रही राजनीतिक बहस को फिर से शुरू कर दिया है, जिससे उनके विचारों, विश्वासों और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका को लेकर गहरे मतभेद सामने आए हैं। इस मुद्दे ने पहली बार 2019 में बड़ा राजनीतिक तूल पकड़ा, जब भाजपा की महाराष्ट्र इकाई ने सावरकर को भारत रत्न देने की सिफारिश की, जबकि कांग्रेस ने इस पर तीखा हमला किया। यह मांग 2024 में भी फिर से उठी, जब शिवसेना (यू.बी.टी.) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने सवाल किया कि सावरकर को भारत रत्न पुरस्कार क्यों नहीं दिया गया।
सावरकर कौन हैं और वे विवादित क्यों हैं?
1883 में नासिक के पास भगूर में दामोदर और राधाबाई सावरकर के घर जन्मे, उनकी शुरुआती जिंदगी उत्तरजीविता और व्यावहारिक चयनों से भरी थी, जैसे कि अंग्रेजों से बातचीत करना और दया याचिकाएं दायर करना, जिसने उनकी जटिल विरासत को आकार दिया। बहुत से लोग सावरकर को भारत रत्न देने का विरोध करते हैं क्योंकि उन्होंने अंडेमान की सेलुलर जेल से अंग्रेजों को दया याचिकाएं लिखी थीं। आलोचकों का मानना है कि ये याचिकाएं सालों की कुर्बानी से ज्यादा कमजोरी दिखाती हैं। टॉर्चर खत्म करके नॉर्मल जिंदगी में लौटना इंसान की एक स्वाभाविक इच्छा है। सावरकर ने शहीद बनने की बजाय जिंदा रहना चुना। उनका मानना था कि एक जिंदा क्रांतिकारी, भले ही उसे पाबंद किया गया हो, अंडेमान में मरे हुए हीरो से ज्यादा देश के लिए कर सकता है। सावरकर ने ब्रिटिश सरकार से अपनी याचिकाओं में माफी नहीं मांगी। एक काबिल वकील होने के नाते, उन्होंने कैदियों की स्थिति पर सफाई मांगी। उन्होंने कहा कि उन्हें इस डरावनी जगह पर बिना यह जाने कि उन्हें आम कैदी माना जाता है या पॉलिटिकल कैदी, कैद कर दिया गया था। सावरकर को इस शर्त पर रिहा किया गया कि वह पॉलिटिक्स में शामिल नहीं हो सकते और उन्हें रत्नागिरी जिंले में ही रहना होगा।
सावरकर ने खुद को एक समाज सुधारक के तौर पर पेश किया जो छुआछूत को खत्म करने के लिए समर्पित थे, इस मुद्दे पर उन्होंने बहुत काम किया। हालांकि, उन्होंने क्रांतिकारी आंदोलन के लिए भूमिगत समर्थन भी बनाए रखा। उन्होंने रत्नागिरी में पतित पावन नाम का एक मंदिर बनवाया, जो सभी समुदायों और जातियों के लोगों के लिए खुला था। इस पहल से ऊंची जाति के हिंदू परेशान हो गए। हाल ही में नेहरू आर्काइव से मिले दस्तावेजों से पता चलता है कि भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को विनायक दामोदर सावरकर को देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान भारत रत्न न देने की सलाह दी थी। यह बात सावरकर की विरासत और इससे पैदा हुए राजनीतिक मतभेदों को लेकर चल रही बहस को और गहरा करती है। जून, 1963 में, नेहरू ने लिखा, ‘‘मैं आपका वह पत्र लौटा रहा हूं जिसमें श्री सावरकर को भारत रत्न देने का सुझाव दिया गया है। हालांकि उन्होंने आजादी की लड़ाई में योगदान दिया था लेकिन बाद में वह विवादों में आ गए। मुझे नहीं लगता कि हमें यह सुझाव मानना चाहिए।’’ जबकि उस समय के कई सुधारकों ने हिंदू धर्म के ढांचे के अंदर ‘अछूतों’ को ऊपर उठाने की कोशिश की, सावरकर एक तर्कवादी थे, जो इस ढांचे को पूरी तरह से खत्म करना चाहते थे। उन्होंने सिर्फ उपदेश नहीं दिए, उन्होंने अपनी मान्यताओं के समर्थन के लिए कदम भी उठाए।
उन्होंने पतित पावन मंदिर बनवाया, जो भारत के उन पहले मंदिरों में से एक था, जहां सभी जातियों के लोगों का स्वागत किया जाता था, जिनमें उस समय अछूत माने जाने वाले लोग भी शामिल थे। एक दलित पुजारी को नियुक्त करके और अंतरजातीय खाने और शादी को बढ़ावा देकर, उन्होंने सामाजिक नियमों को चुनौती देने की कोशिश की। उनकी कोशिशों का मकसद अलग-अलग समुदायों के बीच सम्मान जगाना, बराबरी को बढ़ावा देना और सामाजिक सुधार को बढ़ावा देना था। सार्वजनिक रिकॉर्ड से पता चलता है कि सावरकर को गिरफ्तार किया गया था और उन पर साजिश का आरोप लगाया गया था। फिर भी, 10 फरवरी, 1949 को, जज आत्मा चरण की अध्यक्षता वाली लाल किले की स्पैशल कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया। सभी सबूतों की समीक्षा, जिसमें अप्रूवर दिगंबर बडगे की गवाही भी शामिल है, इसमें शामिल कानूनी प्रक्रिया को रेखांकित किया गया है। इंडियन एविडैंस एक्ट के तहत, किसी साथी के सबूत को भरोसेमंद होने के लिए स्वतंत्र सबूतों से पुष्टि की जानी चाहिए। प्रॉसिक्यूशन यह देने में नाकाम रहा। सावरकर के पोते, राजेंद्र सावरकर ने केंद्र सरकार से अपने दादा के ‘स्वतंत्रवीर’ टाइटल को मान्यता देने की मांग की है, यह कहते हुए कि यह मोहनदास कर्मचंद गांधी को दिए गए ‘महात्मा’ टाइटल जैसा होगा।
कई लोग सावरकर को भारत रत्न देने का विरोध करते हैं। इनमें कांग्रेस पार्टी, लैफ्ट पाॢटयां और कुछ विपक्षी ग्रुप शामिल हैं। शिवसेना लंबे समय से इस सम्मान के लिए जोर दे रही है, और भाजपा भी इसका समर्थन करती है। वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते हुए, उन्होंने सावरकर को यह सम्मान देने पर विचार किया लेकिन इसके खिलाफ फैसला किया। जब से मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, शिवसेना भाजपा से यह मान्यता देने का आग्रह करती रही है लेकिन पिछले 11 सालों में ऐसा नहीं हुआ। सावरकर के कई समर्थक हैं लेकिन कई विरोधी भी हैं। कौन जीतेगा, यह सवाल मिलियन डॉलर का सवाल हो सकता है, लेकिन अगर मोदी में राजनीतिक इच्छाशक्ति है, तो हम जल्द ही वीर सावरकर को यह खिताब देते हुए सुन सकते हैं।-कल्याणी शंकर
