हादसों के देश भारत में प्रशासन की समस्या

punjabkesari.in Wednesday, Feb 04, 2026 - 04:14 AM (IST)

वर्ष 2026-27 का बजट पेश किया जा चुका है और सरकार ने सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 7$5 प्रतिशत रहने के लिए स्वयं को शाबाशी दी है किंतु एक प्रश्र अभी भी अनुत्तरित रह गया है कि क्या हम विश्व में आपदाग्रस्त देश बन गए हैं? ऐसा लगता है कि हम एक के बाद एक आपदा का सामना कर रहे हैं और इन आपदाआें में मरने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है परंतु समय पर निवारात्मक कदम उठाने के लिए हमारे अधिकारियों के कानों पर कभी भी जूं नहीं रेंगती है।

हाल ही में कोलकाता के बाहरी हिस्से में एक गोदाम में अग्निकांड में 29 लोगों के मरने की खबर है तथा यह संख्या और बढ़ सकती है। इस बात का पता लगाने की बजाय कि यह किसकी लापरवाही से हुआ या किसे रिश्वत दी गई, भाजपा और तृणमूल कांग्रेस जवाबदेही को नजरंदाज कर रहे हैं। केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने आरोप लगाया है कि यह किसका पैसा है और अब तक किसी की गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई है? इस पर तृणमूल कांग्रेस ने उत्तर दिया है कि निजी गोदाम को नियंत्रित करना संभव नहीं है। यह समझा जा सकता है क्योंकि राज्य में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और सत्ता की लड़ाई चल रही है। इससे पूर्व दिसंबर में गोवा के नाइट क्लब में भयावह अग्रिकांड में 25 लोग मारे गए। बाद में पता चला कि इस नाइट क्लब का निर्माण अवैध ढंग से किया गया था और यह बिना लाइसैंस के चल रहा था। मैजिस्टे्रट की जांच में सामने आया कि इसके निर्माण में गंभीर खामियां थीं और विभिन्न स्तरों पर अधिकारियों के साथ सांठ-गांठ थी किंतु किसी को जवाबदेह नहीं ठहराया गया और केवल नाइट क्लब के मालिकों को गिरफ्तार किया गया। 

इससे पूर्व कोलकाता के एक अस्पताल में 89 लोग मारे गए। आशानुरूप अस्पताल का लाइसैंस रद्द किया गया और मुख्यमंत्री ने इस घटना के लिए कठोर दंड देने की घोषणा की तथा इसके मालिकों को गिरफ्तार किया गया किंतु अग्नि शमन उपायों के बारे में वह मौन रहीं। ‘राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो’ के आंकड़ों के अनुसार देश में प्रति वर्ष होने वाले डेढ़ लाख अग्निकांडों में 27,000 से अधिक लोग मारे जाते हैं। अग्निकांडों में 57 प्रतिशत से अधिक मौतें आवासीय क्षेत्रों में होती हैं और अक्सर ऐसी घटनाएं रात के समय होती हैं जब वहां रहने वाले लोग सो रहे होते हैं। इसके अलावा देश में प्रति वर्ष लाखों लोग दोषपूर्ण योजना निर्धारण के कारण काल के ग्रास बन जाते हैं। सड़क दुर्घटनाआें में निरंतर वृद्धि हो रही है। गत वर्ष भारत में 4$ 73 लाख सड़क दुर्घटनाओं में 1$ 70 लाख मौतें हुई हैं। उदाहरण के लिए पिछले महीने की एक घटना को ही लें। दिल्ली में एक दंपति 8 घंटे तक अपनी कार में फंसे रहने के कारण मारे गए। किसी ने भी उनकी मदद नहीं की। यदि उन्हें समय पर अस्पताल पहुंचाया गया होता तो वे बच सकते थे। 

हैरानी की बात यह है कि पीड़ित और उनके परिवार को पहुंचने वाले मनोवैज्ञानिक आघात के बावजूद सरकार ने सड़क सुरक्षा के लिए कोई ठोस अभियान नहीं चलाया और यही स्थिति अग्निकांडों के बारे में है जिन्हें रोकने के लिए अखिल भारतीय स्तर पर कोई अभियान नहीं चलाया गया है। इन दुर्घटनाओं में एक सामान्य-सा पैटर्न दिखाई देता है। दैनिक शासन-प्रशासन में कड़ाई पर ध्यान देने की बजाय वर्ष 2047 तक विकसित भारत के राजनीतिक दिखावे पर ध्यान दिया जा रहा है। भारत में सबसे स्वच्छ शहर इंदौर में पिछले माह लोक स्वास्थ्य आपदा आई जहां सीवेज की लीकेज के कारण पेयजल दूषित हो जाने के चलते फैली बीमारी में अनेक लोग मारे गए और सैंकड़ों लोग बीमार हो गए पर इस बारे में भी केवल बातें ही की गईं। सम्बन्धित अधिकारियों के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की गई और जल सुरक्षा निगरानी के किसी प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया गया। सरकार के पास भीड़ प्रबंधन की भी व्यवस्था नहीं है। गत वर्ष सितंबर में तमिलनाडु में अभिनेता से राजनेता बने विजय की रैली में पुलिस के भीड़ प्रबंधन में नाकाम रहने से 45 लोगों की मौत और अनेक लोग घायल हो गए। यह बताता है कि हमारे देश में जन सुरक्षा को बिल्कुल महत्व नहीं दिया जाता है। इसी तरह रॉयल चैलेंजर द्वारा पहली बार आई.पी.एल. ट्राफी जीतने के बाद आयोजित समारोह में भीड़ में भगदड़ मच गई। पिछले वर्ष प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ में मीडिया की खूब चकाचौंध रही जिसमें 50 करोड़ से अधिक लोग आए। इस मेले में हुई भगदड़ में 200 से अधिक लोग मारे गए और सैंकड़ों घायल हुए। उसके एक माह बाद नई दिल्ली के रेलवे स्टेशन पर भीड़ के चलते भगदड़ में 40 लोग मारे गए और अनेक घायल हुए किंतु दोनों ही घटनाओं को नजरंदाज कर दिया गया। 

यदि ऐसी घटनाओं को नजरंदाज किया जाता रहा तो फिर सुधारात्मक कदम कैसे उठाए जाएंगे? सड़क, रेल या हवाई दुर्घटना या भगदड़, किसी को भी ले लें, हर समय हर घटना के समय सुरक्षात्मक उपाय नहीं किए जाते हैं। इनके लिए कौन जवाबदेह होगा? प्रश्न उठता है कि क्या बाबुओं के पास स्वयं में सुधार करने का साहस है? क्या चयन का मानदंड क्षमता और सत्यनिष्ठा होगी या सिफारिश और संपर्क होंगे? यह सर्वविदित है कि जो सत्ता में उच्च पदों पर हैं सबसे पहले अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ देते हैं। उसके बाद राजनेताओं का नंबर आता है और ये दोनों मिलकर काम करते हैं। जिसके चलते भ्रष्टाचार और अव्यवस्था बढ़ती है। आज हमारे राज्य ‘समर्पित नौकरशाही’ या पार्टियों से जुड़ी नौकरशाही के लिए कुख्यात हो गए हैं जिसके चलते राजनीतिक बदलाव पर नौकरशाहों के बड़े पैमाने पर स्थानांतरण किए जाते हैं। राज्य में सत्ता बदलने पर अनिवार्यत: स्थानांतरण किए जाते हैं जिसके चलते अधिकतर अधिकारी कोई पहल नहीं करते हैं। 

वस्तुत: अधिकारियों की राजनीतिक पहचान आजकल इतनी स्पष्ट हो जाती है कि नौकरशाह भी भविष्यवाणी कर देते हैं कि किस पार्टी के सत्ता में आने पर किस नौकरशाह को शीर्ष पद मिलेगा। सिविल सेवा एक संभ्रांत क्लब बन गया है जो अपने हितों की रक्षा करता है और सभी शीर्ष पदों पर कब्जा करते हैं। इसी के चलते इन नौकरशाहों ने विभिन्न समितियां आदि बना ली हैं और उनमें उच्च पद प्राप्त करते हैं और ये पद उन्हें किसी पार्टी को लाभ पहुंचाने के बदले में दिए जाते हैं। सही व्यक्ति को सही पद पर तैनात करने की बजाय हमारे नेता लोग गलत कारणों से गलत व्यक्ति को सही पद पर नियुक्त करते हैं जिससे एेसी स्थिति बनती है जिसमें जाति, भ्रष्टाचार, राजनीतिक संपर्क आदि महत्वपूर्ण होते हैं और पदोन्नति में भी यही मानदंड अपनाए जाते हैं जिसके चलते प्रशासन कमजोर और स्वेच्छाचारी होता जा रहा है क्योंकि नौकरशाहों को अपने कत्र्तव्यों के निर्वहन के लिए न्यूनतम ज्ञान प्राप्त करने का समय भी नहीं मिल पाता। 

नि:संदेह हम शासन के संकट का सामना कर रहे हैं। हमारी नौकरशाही का निर्माण मूलत: स्थिरता और नियंत्रण के लिए किया गया है न कि नागरिकों के प्रति जवाबदेही के लिए। इसके अलावा कार्य निष्पादन के दबाव के बिना रोजगार की सुरक्षा के चलते किसी अधिकारी को दंडित करना कठिन बन जाता है। इसके साथ ही विभागीय जांच में वर्षों लग जाते हैं और ये मामले वर्षों तक चलते हैं इसलिए जब तक इस पर निर्णय होता है तब तक संबंधित अधिकारी सेवानिवृत्त हो जाता है। 

नौकरशाही में पदोन्नतियां कार्य निष्पादन पर आधारित होने की बजाय वरिष्ठता पर आधारित होती हैं। अत: स्पष्ट है कि नौकरशाही को प्रशासनिक खामियों को दूर करने के लिए सामूहिक रूप से ठोस कदम उठाने के बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए। साथ ही व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए भी उपाय करने होंगे। इस संबंध में अमरीका की तरह जीरो टालरैंस सिद्धांत और सनसैट सिद्धांत का पालन करना चाहिए। इसके अंतर्गत सरकारी कार्यकलापों के औचित्य की हर समय समीक्षा की जाती है ताकि कोई गलत कदम न उठाया जा सके। 
यदि हमारे नौकरशाह स्वयं में बदलाव नहीं लाते हैं तो एक समय आएगा जब वे अप्रासंगिक बन जाएंगे। क्या नौकरशाह इस स्थिति से बाहर आकर कार्य करेंगे या वे अभी भी स्टील फ्रेम बने रहेेंगे जिस पर शासन और जवाबदेही के अभाव में जंग लगता रहेगा?-पूनम आई. कौशिश


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