कांग्रेस का भी हो रहा रोमन साम्राज्य की तरह ‘पतन’

10/8/2019 12:57:12 AM

सन् 476 ईस्वी में इतिहास के सबसे बड़े रोमन साम्राज्य का अंतत: पतन हो गया। रोमन साम्राज्य लगभग 500 वर्षों तक विश्व की सबसे बड़ी महाशक्ति बना रहा। दूसरी ओर सन् 2019 में 134 वर्ष पुरानी कांग्रेस पार्टी का पतन भी उसी तरह हो रहा है। भ्रष्टाचार के आरोप में उसके नेता जेल में बंद हैं, पार्टी दिशाहीन हो गई है और अपने ‘अन्नदाता’ पर निर्भर है। यह एक तरह से जीवनहीन और मृत्युहीन जीवन की ओर बढ़ रही है।

कांग्रेस वह पार्टी है जिसने देश के लिए स्वतंत्रता प्राप्त की और लगभग 60 वर्षों तक देश में शासन किया तथा अनेक तूफानों का सामना करते हुए हमेशा विजयी हुई किन्तु आज मोदी की भाजपा राजनीति की धुरी बन गई है और कांग्रेस के विकल्प बनने की कोई आशा नहीं बची है। पार्टी आज भी नेहरू-गांधी परिवार पर निर्भर है और इसीलिए सोनिया को अंतरिम अध्यक्ष बनाया गया है जबकि 20 माह पूर्व उन्होंने दिसम्बर, 2017 में पार्टी की बागडोर अपने पुत्र राहुल के हाथों में सौंप दी थी।

क्या पार्टी मृत्यु की दहलीज पर खड़ी है? उसके समक्ष अस्तित्व का संकट है। हालांकि सोनिया और उनके पुराने विश्वस्त नेता इस डूबती नैया को बचाने का प्रयास कर रहे हैं। क्या उसे अंतिम क्षणों में बचाया जा सकेगा क्योंकि पार्टी अपने ध्वस्त ढांचे की धूल से सनी पड़ी है। पार्टी का भविष्य क्या है? क्या उसका पुनरुद्धार संभव है? यदि यह संभव है तो इससे कोई फर्क पड़ेगा? पार्टी की स्थिति का आकलन करना हो तो गोवा और कर्नाटक को देखिए जहां पर पार्टी के विधायक पार्टी छोड़ रहे हैं। 

यही स्थिति महाराष्ट्र, हरियाणा, आंध्र और दिल्ली में भी है तथा उत्तर प्रदेश में पार्टी नेता पार्टी के निर्देशों का उल्लंघन कर रहे हैं। महाराष्ट्र व हरियाणा में गुटबाजी और अंदरूनी कलह के कारण पार्टी में दोफाड़ हो गया है और नेता अलग-अलग दिशाओं में जा रहे हैं जबकि दोनों राज्यों में इसी माह विधानसभा चुनाव होने हैं तथा बिहार, दिल्ली और झारखंड जहां आगामी महीनों में चुनाव होने वाले हैं, वहां भी पार्टी में गुटबाजी और मतभेद जारी हैं, जिससे लगता है कि पार्टी ने अपनी पहचान और कार्य खो दिए हैं। 

जरा देखिए, किस तरह कांग्रेस ने महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के समारोह के संदर्भ में मोदी को वाकओवर दिया है। भाजपा ने गांधी जयंती को स्वच्छ भारत का राजनीतिक संदेश देने के लिए उपयोग किया जबकि उस पार्टी ने, जिसका कभी महात्मा ने नेतृत्व किया था, कहीं भी राजनीतिक सृजनशीलता नहीं दिखाई और इस अवसर पर पार्टी केवल सोनिया के भाषण, राहुल के ट्वीट और प्रियंका की पदयात्रा ही आयोजित करवा पाई। राजनीतिक गलियारों में यह उत्सुकता बनी हुई है कि क्या सोनिया कांग्रेस को एक बार पुन: चुनाव जीतने वाली पार्टी बना सकती हैं? क्या वह पूरे देश में मोदी-शाह की जोड़ी को चुनौती दे सकती हैं? 

सोनिया का नेतृत्व सारे देश को स्वीकार्य नहीं
उल्लेखनीय है कि सोनिया के नेतृत्व को पूरे देश में स्वीकार नहीं किया गया था, जैसा कि 1998 में उनके द्वारा पार्टी की बागडोर संभालने के बाद कांग्रेस के प्रदर्शन से स्पष्ट हो जाता है। यह सच है कि 2004 और 2009 के चुनावों में उनके नेतृत्व में पार्टी केन्द्र में सत्ता में आई और पार्टी ने अनेक राज्यों में विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज की। हालांकि तब भी वाजपेयी और अडवानी की जोड़ी से उन्हें कड़ी चुनौती मिल रही थी किन्तु पार्टी का मत प्रतिशत 1999 के बाद लगभग 28 प्रतिशत ही बना रहा जो अब 20 प्रतिशत से कम हो गया है और यह इस ओर संकेत देता है कि पार्टी मरणासन्न हो रही है। सोनिया के नेतृत्व में अलग-अलग विचारधारा वाली क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियां, जैसे द्रमुक, राकांपा और राजद एक मंच पर आईं और उन्होंने कांग्रेस को विभिन्न क्षेत्रीय दलों, सामाजिक, जातीय वर्ग और धार्मिक समूहों का शीर्ष संगठन बनाया। 

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार नि:संदेह पार्टी के लिए यह एक कठिन समय है। यह किसी दुस्साहस का समय नहीं है। पार्टी का अस्तित्व समाप्त होने जा रहा है और पार्टी के हाल के रिकार्ड को देखें तो यह मरणासन्न हो गई है किन्तु पार्टी में बहुलवादी लोकतंत्र के पोषण के तत्व हैं और इसके चलते यह पुनर्जीवित हो सकती है। पार्टी में नेतृत्व की रिक्तता है। ऐसे नेताओं का अभाव है जो निर्णायक, सही और समय पर निर्णय ले सकें तथा उनका कार्यान्वयन करवा सकें। पार्टी में आज सुदृढ़ विचारधारा का अभाव भी है और यह पूर्णत: परिवार पर निर्भर है जो उसे एकजुट बनाए रखता है। हाल के वर्षों में पार्टी अनेक संगठनों से जुड़ी है। अब पार्टी सत्ता से बाहर है और अजेय भाजपा सत्तारूढ़ है। 

ढांचागत सुधार की जरूरत
पार्टी में ढांचागत सुधार की आवश्यकता है। पार्टी को संगठन का पुनर्गठन करना होगा और भाजपा के वैचारिक विकल्प के रूप में जनता से संवाद स्थापित करना होगा। इसके लिए सबसे पहले पार्टी को अपने उन पुराने नेताओं से पल्ला झाडऩा होगा जो राज्यसभा सिंड्रोम से ग्रस्त हैं। उन्हें पार्टी से बाहर करना होगा क्योंकि इन नेताओं का न तो जनाधार है और न ही जनता से संवाद। इसके साथ ही पार्टी को संसाधनों की आवश्यकता भी है क्योंकि संसाधनों की कमी एक मुख्य अड़चन बन रही है जिसके चलते पार्टी समर्थकों का नैटवर्क नहीं बना पा रही है न ही नए नेताओं का पोषण कर पा रही है और मोदी सरकार को चुनौती देने के लिए लोकप्रिय चुनावी एजैंडा भी नहीं बना पा रही है। सोनिया जानती हैं कि यह एक आपात स्थिति है क्योंकि पार्टी में धर्मनिरपेक्षता का भी पतन हो रहा है और लगातार 2 लोकसभा चुनावों में हार और नेतृत्व संकट के चलते पार्टी जड़ बन गई है। 

वस्तुत: राहुल के त्यागपत्र से यह कटु सच्चाई सामने आई है जिससे यह स्पष्ट भी हो गया है कि पार्टी में नेहरू-गांधी वंश के अलावा किसी को नेतृत्व नहीं दिया जा सकता है, जिसके चलते पार्टी नेताओं में उदासीनता भी छाने लगी है। पार्टी के कार्यकत्र्ताओं में अनुच्छेद-370 को समाप्त करने, हिन्दुत्व राजनीति, राष्ट्रवाद जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर वैचारिक भ्रम व्याप्त है। इसके अलावा भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की गिरफ्तारी और मोदी-शाह द्वारा नए राजनीतिक प्रचार से पार्टी की स्थिति और कमजोर हुई है। 

अनुच्छेद-370 के मुद्दे पर पार्टी के अनेक वरिष्ठ नेताओं द्वारा सरकार का समर्थन करने से पार्टी का और अपमान हुआ है तथा विधानसभा चुनावों में एक और हार भाजपा के वर्चस्व के सक्षम विकल्प के रूप में पार्टी की एक और परीक्षा होगी। पार्टी में स्पष्ट दृष्टिकोण का अभाव है, जिसके चलते पार्टी भाजपा का मुकाबला करने और खुद को एक मजबूत संगठन के रूप में पुनर्गठित करने के उद्देश्यों से भटक रही है। विशेषकर इसलिए भी कि पूरे देश में कांग्रेस का मत प्रतिशत कम हो रहा है इसलिए पार्टी को चाहिए कि वह विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों में अपने संगठन और सामाजिक आधार का विस्तार करे। 

वैचारिक रुख स्पष्ट करना होगा
सोनिया का दायित्व स्पष्ट है। उन्हें न केवल आगामी विधानसभा चुनावों में पार्टी को जीत दिलानी है अपितु पार्टी के भीतर बढ़ रहे मतभेदों को भी दूर करना है। उन्हें पार्टी में पुराने नेताओं और युवा नेताओं के बीच की चौड़ी खाई को भी पाटना होगा। इसके अलावा पार्टी को इधर-उधर की हांकने की बजाय महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपना वैचारिक रुख स्पष्ट करना होगा और जनता से जुडऩे के लिए रोजी-रोटी के मुद्दों को उठाना होगा। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि पार्टी इन लक्ष्यों को किस तरह प्राप्त करेगी किन्तु सोनिया के आने के बाद लोकसभा चुनावों में हार के बाद की उदासी में कुछ कमी आई है। सोनिया के समक्ष भी विकल्प सीमित हैं। या तो पार्टी पुराने नेताओं का साथ देकर आगे बढ़े या एक मजबूत नेता को चुने जो उसे मरणासन्न स्थिति से बाहर निकाल सके। किन्तु किसी राजनीतिक योजना के अभाव में यह अंतिम उपाय भी पार्टी के लिए एक मृत्युहीन मृत्यु की तरह दिखाई देता है। 

कुछ लोगों का यह भी मानना है कि पार्टी के पास एक विकल्प बचा है और उसका पूरी तरह दोहन नहीं हुआ है तथा वह विकल्प प्रियंका वाड्रा हैं किन्तु 2019 के चुनाव परिणाम बताते हैं कि गांधी परिवार ने जनता को आकॢषत करने की क्षमता खो दी है। कुल मिलाकर पार्टी को तुरंत सुधारात्मक कदम उठाने होंगे अन्यथा वह भी वामपंथी दलों की तरह अप्रासंगिक बन जाएगी। राजनीति धारणा का खेल है और सोनिया गांधी को कांग्रेस को मरणासन्न स्थिति से बाहर निकालने के लिए अपने अनुभव, कुशलता और राजनीतिक संपर्कों का प्रयोग करना होगा। देखना यह है कि वह इस दिशा में कितनी सफल होती हैं किन्तु वह जितनी जल्दी पहल करें उतना अच्छा क्योंकि कांग्रेस को जीवनहीन और मृत्युहीन जीवन नहीं जीना चाहिए।-पूनम आई.कोशिश 
 


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