जानें, आत्मा तथा परमात्मा में क्या अंतर है

Friday, May 5, 2017 1:35 PM
जानें, आत्मा तथा परमात्मा में क्या अंतर है

श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप
व्याख्याकार : स्वामी प्रभुपाद 
अध्याय छह ध्यानयोग

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन:।। 21।।


शब्दार्थ : सर्व-भूत-स्थम्—सभी जीवों में स्थित; आत्मानम्—परमात्मा; सर्व—सभी; भूतानि —जीवों को;  च—भी; आत्मनि—आत्मा में; ईक्षते— देखता है; योग-युक्त-आत्मा—कृष्ण चेतना में लगा व्यक्ति; सर्वत्र— सभी जगह;  सम-दर्शन:—समभाव से देखने वाला।


अनुवाद : वास्तविक योगी समस्त जीवों में मुझको तथा मुझमें समस्त जीवों को देखता है। नि:संदेह स्वरूपसिद्ध व्यक्ति मुझ परमेश्वर को सर्वत्र देखता है।


तात्पर्य : कृष्णभावनाभावित योगी पूर्ण दृष्टा होता है क्योंकि वह परब्रह्म कृष्ण को हर प्राणी के हृदय में परमात्मा रूप में स्थित देखता है। अपने परमात्मा रूप में भगवान सबके हृदय में स्थित होते हैं। पूर्णयोगी जानता है कि भगवान नित्यरूप में दिव्य हैं और सब में स्थित होने के कारण भौतिक रूप से प्रभावित नहीं होते। यही भगवान की परम निरपेक्षता है। यद्यपि आत्मा भी प्रत्येक हृदय में विद्यमान है, किन्तु वह एक साथ समस्त हृदयों में (सर्वव्यापी) नहीं है। आत्मा तथा परमात्मा का यही अंतर है। जो वास्तविक रूप से योगाभ्यास करने वाला नहीं है वह इसे स्पष्ट रूप में नहीं देखता। एक कृष्णभावनाभावित व्यक्ति कृष्ण को आस्तिक तथा नास्तिक दोनों में देख सकता है। स्मृति में इसकी पुष्टि इस प्रकार हुई है- आततत्वाच्च मातृत्वाच्च आत्मा हि परमो हरि:। भगवान सभी प्राणियों का स्रोत होने के कारण माता और पालनकर्ता के समान हैं। 


जिस प्रकार माता अपने समस्त पुत्रों के प्रति समभाव रखती है उसी प्रकार परम पिता (या माता) भी रखता है। फलस्वरूप परमात्मा प्रत्येक जीव में निवास करता है। बाह्य रूप से भी प्रत्येक जीव भगवान की शक्ति (भगवद् शक्ति) में स्थित है। जैसा कि सातवें अध्याय में बताया जाएगा, भगवान की दो मुख्य शक्तियां हैं- परा तथा अपरा। जीव पराशक्ति का अंश होते हुए भी अपराशक्ति से बद्ध है, जीव सदा ही भगवान की शक्ति में स्थित है। प्रत्येक जीव किसी न किसी प्रकार भगवान में ही स्थित रहता है। योगी समदर्शी है क्योंकि वह देखता है कि सारे जीव अपने-अपने कर्मफल के अनुसार विभिन्न स्थितियों में रह कर भगवान के दास होते हैं। अपराशक्ति में जीव भौतिक इंद्रियों का दास रहता है जबकि पराशक्ति में वह साक्षात परमेश्वर का दास रहता है। इस प्रकार प्रत्येक अवस्था में जीव ईश्वर का दास है। कृष्णाभावनाभावित व्यक्ति में यह समदृष्टि पूर्ण होती है। 

(क्रमश:)



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