मंदिरों व महलों की नगरी अगरतला, यात्रा के साथ लें पर्यटन का आनंद

Saturday, August 19, 2017 10:13 AM
मंदिरों व महलों की नगरी अगरतला, यात्रा के साथ लें पर्यटन का आनंद

भौगोलिक दृष्टि से त्रिपुरा देश की मुख्यभूमि से सुदूर व अलग-थलग स्थित है। उत्तर-पूर्व के लोग त्रिपुरा की राजधानी अगरतला तक बस से पहुंच सकते हैं लेकिन देश के अन्य हिस्सों के निवासियों के लिए यहां तक पहुंचने का सबसे सरल व व्यावहारिक साधन कोलकाता से छोटी-सी हवाई उड़ान है। त्रिपुरा की संस्कृति तथा विरासत की झलक यहां हर ओर दिखाई देती है। हाल ही में इस राज्य ने देश को दीपा करमाकर जैसी विश्वस्तरीय जिमनास्ट दी है। अगरतला हवाई अड्डे से बाहर आते ही इस शहर के हरे-भरे नैसर्गिक रूप का सहज ही पता चल जाता है। 

 

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साथ ही इसके कॉलेज तिला इलाके में उपनिवेशी काल में बनी सुंदर इमारतें व स्मारक भी ध्यान आकर्षित करते हैं। आज यहां एक कॉलेज है जो एक शानदार ईको पार्क से घिरा है तथा इसमें एक सुंदर झील भी है जहां सर्दियों में प्रवासी पक्षी बड़ी संख्या में आते हैं। पहली नजर में अगरतला बंगाल के किसी समृद्ध कस्बे जैसा दिखाई देता है। सड़कों पर अधिकतर संकेत बंगाली में लिखे हैं हालांकि, सड़कों व बाजारों में पहाड़ी जनजातीय लोग अधिक दिखाई देते हैं। 

 

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शहर विशिष्ट संस्कृति, विरासत तथा स्मारकों के लिए प्रसिद्ध है। त्रिपुरा में बंगलादेशी, भारतीय बंगालियों तथा करीब की पहाडिय़ों पर रहने वाली दस जनजातियों की जीवनशैली का प्रभाव स्पष्ट है। राजधानी अगरतला होआरा नदी के तट पर बसी है। इसे 1760 में त्रिपुरा राजघराने की राजधानी बनाया गया था जब महाराजा कृष्णमाणिक्य सरल आवाजाही तथा खुले स्थान के लिए उदयपुर से अपनी राजधानी यहां ले आए थे। उदयपुर तब उत्तर-पूर्वी भारत का एक राज्य था। शहर में अधिकतर निर्माण जैसे महल, सड़कें तथा जल आपूर्ति के लिए तालाब आदि 1838 के आसपास महाराजा कृष्णकिशोर माणिक्य ने करवाए थे। 

 

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शहर का उज्जयंत महल अत्यधिक सुंदर है। 19वीं सदी की शुरूआत में बना यह महल इंडो-सारासेनिक (भारतीय-अरबी) स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना है। इसके विशालकाय गुम्बद तथा लम्बे-लम्बे बरामदे, नक्काशीदार दरवाजे तथा फव्वारे मन मोह लेते हैं। यह महल 1947 तक अगरतला पर राज करने वाले माणिक्य राजवंश का लम्बे समय तक आवास था। महल के एक हिस्से ‘अंदर महल’ में आज भी उनके वंशज रहते हैं। महल में हाथी दांत से बना विख्यात राज सिंहासन भी है। इसमें एक संग्रहालय भी स्थापित किया गया है। 

 

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इसके अलावा 2 अन्य छोटे महल पुष्पवंत महल तथा मालंच निवास भी देखने लायक हैं। वहीं अगरतला से 53 किलोमीटर दूर स्थित मेलाघर में नीर महल भी अति सुंदर है।
अगरतला से बंगलादेश-भारत सीमा केवल 2 किलोमीटर की दूरी पर है। सीमा के दोनों ओर के लोगों की संस्कृति तथा भाषा इतनी मिलती-जुलती है कि उनमें अंतर करना बेहद कठिन है। शाम को 5 बजे भारत की ओर से सीमा सुरक्षा बल यानी बी.एस.एफ. तथा दूसरी ओर से बंगलादेश राइफल्स के जवान अपने-अपने राष्ट्र ध्वज उतारते हैं। यह आयोजन सीमा पर बने गेट पर होता है जिसे देखने के लिए अमृतसर के वाघा बार्डर की तरह ही बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। 


त्रिपुरा के अधिकतर वासी वैष्णवी हैं और यहां अनेक हिंदू व वैष्णव मंदिर हैं। इनमें सबसे बड़ा जगन्नाथजी मंदिर है जिसका वास्तुशिल्प दक्षिण भारतीय मंदिरों से प्रेरित है। शहर से 14 किलोमीटर दूर पुराने अगरतला में चतुर्दश देवता मंदिर भी अति सुंदर है जहां 14 देवियों की पूजा होती है। इन देवियों के कोक-बोरोक अथवा त्रिपुरी भाषा में नाम हैं- 1. लाम्प्रा, 2. अखत्रा, 3. बिखत्रा, 4. बुरासा, 5. थुमनाईरोक, 6. बोनीरोक, 7. संग्रोमा, 8. मवताईकोतोर, 9. त्विमा, 10. सोंग्राम, 11. नोकसुमवताई, 12. माइलूमा, 13. खुलूमा और 14. स्वकलमवताई हैं। 


हालांकि त्रिपुरा के अधिक महत्वपूर्ण मंदिरों को देखने के लिए अगरतला से 55 किलोमीटर दूर उदयपुर जाना होगा। इनमें माताबारी के नाम से भी पुकारे जाने वाले माता त्रिपुरा सुंदरी मंदिर को देखने सबसे ज्यादा लोग पहुंचते हैं। 500 वर्ष प्राचीन यह मंदिर बंगाली चार-चाला स्थापत्य कला में निर्मित है। इसमें काली माता की मूर्ति की प्रतिमा स्थापित है जिन्हें लोग त्रिपुरा सुंदरी या त्रिपुरेश्वरी पुकारते हैं। यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है इसलिए भी इसकी मान्यता अत्यधिक पवित्र स्थल के रूप में है।
लाल रंग के इस मंदिर में शक्ति मां को प्रसन्न करने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं और यहां दिन भर कई तरह की व्यापारिक व सामाजिक गतिविधियां जारी रहती हैं।
उदयपुर का अन्य प्राचीन मंदिर है भुवनेश्वरी मंदिर। 17वीं सदी में निर्मित यह मंदिर गोमती नदी के तट तथा पुराने शाही महल के करीब है। यह महल आज खस्ताहाल है परंतु इस मंदिर का स्थल तथा स्थापत्य कला स्वत: ही मन में आदर-भाव पैदा करती प्रतीत होती है। यह वही शक्ति व आभास है जिसने कइयों को प्रभावित किया है जिनमें महान लेखक रबीन्द्रनाथ टैगोर भी एक हैं। उन्होंने इसे अपने उपन्यास तथा नाटक का हिस्सा बनाया है। 


त्रिपुरा का एक अन्य बेहद सुंदर आकर्षण नीरमहल है जो अगरतला से 54 किलोमीटर दूर है। इस महल में नाटकीय मुगल शैली वास्तुशिल्प है। रुद्र सागर झील से घिरे इस महल के साथ लुका-छिपी खेलते सूर्य के शानदार नजारे को देखने के लिए डिंगी नौका की सैर सर्वोत्तम है। झील में कमल के फूलों के बीच मौजूद कई तरह के पक्षी भी मन मोह लेते हैं। शाम के वक्त इस महल में सुंदर रोशनी की जाती है। 


कैसे पहुंचें: कोलकाता से घरेलू उड़ान यहां पहुंचने का सबसे सरल तथा व्यावहारिक साधन है।


कहां ठहरें : यहां पर सस्ते-महंगे होटलों के अलावा सरकारी टूरिस्ट लॉज में रुकने का बंदोबस्त भी हो सकता है।



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