''पानी पर पहला हक किसका, किसानों का या डेटा सेंटर्स का?'': पवन खेड़ा ने महाराष्ट्र सरकार से पूछा सवाल
punjabkesari.in Sunday, Sep 27, 2026 - 11:23 AM (IST)
नई दिल्ली : कांग्रेस के राज्यसभा सांसद पवन खेड़ा ने महाराष्ट्र सरकार की डेटा-सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाने की योजनाओं पर सवाल उठाए हैं। राज्य के 358 में से 265 तालुकाओं में सूखा घोषित होने के बीच उन्होंने खेती, घरों और इंडस्ट्री के इस्तेमाल के लिए पानी के बंटवारे को लेकर चिंता जताई है। खेड़ा का यह बयान महाराष्ट्र सरकार द्वारा 265 तालुकाओं में सूखा घोषित करने के एक दिन बाद आया है। 2026 के खरीफ सीजन के दौरान कम बारिश और लंबे समय तक सूखे के कारण राज्य के लगभग 74 प्रतिशत हिस्से में ये हालात बने हैं। सरकार ने प्रभावित किसानों और ग्रामीण परिवारों के लिए कई राहत उपायों की घोषणा की है।
खेड़ा ने X पर एक पोस्ट में कहा, 'मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने आधिकारिक तौर पर महाराष्ट्र के 358 में से 265 तालुकाओं (यानी राज्य के लगभग 75% हिस्से) में सूखा घोषित किया है। और यह तब हो रहा है जब महाराष्ट्र तेजी से अपनी डेटा-सेंटर इंडस्ट्री का विस्तार कर रहा है।' खेड़ा ने कहा कि राज्य ने डेटा सेंटर्स के लिए 300 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का निवेश आकर्षित किया है और 2032 तक 5.7 GW डेटा-सेंटर क्षमता का लक्ष्य रखा है। उन्होंने बताया कि डेटा सेंटर्स को भारी मात्रा में बिजली और पानी की जरूरत होती है और पानी की खपत इस्तेमाल की जाने वाली कूलिंग टेक्नोलॉजी पर निर्भर करती है।
उन्होंने कहा, 'वे कितना पानी इस्तेमाल करते हैं, यह कूलिंग टेक्नोलॉजी पर निर्भर करता है, लेकिन पानी की जरूरत एक अहम बात है, खासकर महाराष्ट्र जैसे पानी की कमी वाले इलाकों में।' कांग्रेस नेता ने सीवेज को ट्रीट करके और उसे दोबारा इस्तेमाल लायक बनाकर इंडस्ट्री में इस्तेमाल करने की योजनाओं का भी जिक्र किया जिसमें डेटा सेंटर्स को ऐसा पानी सप्लाई करना भी शामिल है।
खेड़ा ने कहा, 'खबरों के मुताबिक सरकार एक ऐसे सिस्टम की योजना बना रही है जिसमें म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन सीवेज को ट्रीट करेंगे, MIDC उसे और साफ करेगा, और फिर उस दोबारा इस्तेमाल लायक पानी को डेटा सेंटर्स और दूसरी इंडस्ट्रीज को बेचा जाएगा।' सूखा घोषित होने के बीच उन्होंने सवाल उठाया कि सरकार यह कैसे पक्का करेगी कि डेटा-सेंटर सेक्टर के विस्तार के लिए किसानों और आम नागरिकों के हिस्से का पानी दूसरी तरफ न मोड़ा जाए।
उन्होंने पूछा, 'जब महाराष्ट्र का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा आधिकारिक तौर पर सूखे की चपेट में है, तो सरकार की क्या योजना है जिससे यह पक्का किया जा सके कि राज्य के जल संसाधनों को किसानों और आम नागरिकों से हटाकर इस बड़े डेटा-सेंटर विस्तार के लिए इस्तेमाल न किया जाए?' खेरा ने आगे सवाल किया, 'महाराष्ट्र जैसे राज्य में (जहां भारत में किसानों की आत्महत्या की दर सबसे ज्यादा है) पानी पर पहला हक किसका है : किसानों का या डेटा-सेंटरों का?'
उन्होंने यह भी पूछा कि अगर राज्य औद्योगिक इस्तेमाल के लिए सीवेज को ट्रीट करने के सिस्टम विकसित करने को तैयार है, तो खेती के लिए रीक्लेम्ड पानी उपलब्ध कराने में वैसी तत्परता क्यों नहीं दिखाई जा रही है। इस बीच महाराष्ट्र सरकार ने कई उपायों की घोषणा की है, जिनमें फसल-ऋण का पुनर्गठन, कृषि-संबंधी ऋण की वसूली को टालना, भूमि राजस्व और कृषि बिजली बिलों में छूट, जरूरत पड़ने पर पानी के टैंकर, चारे की व्यवस्था और रोजगार-गारंटी योजना के नियमों में ढील शामिल है। जिला कलेक्टरों को फसल-नुकसान का आकलन शुरू करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
सरकार ने कहा है कि फसल के नुकसान के लिए आर्थिक सहायता की घोषणा तय आकलन प्रक्रिया पूरी होने के बाद अलग से की जाएगी। सूखे की घोषणा और सरकार के राहत उपाय ऐसे समय में आए हैं जब महाराष्ट्र पानी की उपलब्धता और कृषि संबंधी जरूरतों को लेकर चिंताओं का सामना कर रहा है, और साथ ही डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार और डेटा-सेंटर सेक्टर में निवेश आकर्षित करने की अपनी व्यापक योजनाओं पर भी काम कर रहा है।
