नेपाल-तिब्बत पर मंडरा रहा बड़े सैलाब का खतरा, 47 झीलें कभी भी ला सकती हैं तबाही

punjabkesari.in Thursday, Aug 27, 2026 - 01:26 PM (IST)

नई दिल्ली। नेपाल और तिब्बत की सीमा पर आई विनाशकारी बाढ़ ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते ग्लेशियर और ग्लेशियल झीलों के खतरे की ओर ध्यान खींचा है। लांगटांग लिरुंग पर्वत की ढलानों से ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे गिरा। इससे कुछ समय के लिए पानी और मलबे का रास्ता रुका और बाद में त्रिशुली नदी में अचानक तेज बाढ़ आ गई। इस घटना ने सवाल खड़ा कर दिया है कि नेपाल के पहाड़ी इलाकों में ऐसी और कितनी घटनाएं हो सकती हैं।

नेपाल-तिब्बत सीमा क्यों है संवेदनशील?
लांगटांग घाटी और त्रिशुली नदी बेसिन नेपाल-चीन सीमा का बेहद संवेदनशील इलाका माना जाता है। यहां ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। ग्लेशियर के पिघलने से उसके ऊपर या आसपास पानी जमा होने लगता है, जिससे ग्लेशियल झीलें बनती हैं। इन झीलों में कुछ छोटी होती हैं, जो ग्लेशियर के ऊपर बनती हैं, जबकि कुछ बड़ी झीलें ग्लेशियर के आगे बनती हैं। अगर इन झीलों की प्राकृतिक दीवार टूट जाए या अचानक पानी बाहर निकल जाए तो नीचे के इलाकों में कुछ ही समय में भारी बाढ़ आ सकती है।

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47 ग्लेशियल झीलें मानी गईं संभावित खतरनाक
अंतरराष्ट्रीय पर्वतीय विकास केंद्र और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की रिपोर्ट्स के अनुसार कोशी, गंडकी और कर्णाली नदी बेसिन में करीब 3,624 ग्लेशियल झीलें दर्ज की गई हैं। इनमें लगभग 2,070 झीलें नेपाल में, 1,509 तिब्बत में और 45 भारत में हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक इनमें 47 झीलों को संभावित रूप से खतरनाक ग्लेशियल झीलें माना गया है। इनमें 21 नेपाल में, 25 तिब्बत में सीमा पार क्षेत्र में और एक भारत में स्थित है। इनमें ज्यादातर झीलें कोशी बेसिन में बताई गई हैं। कुछ अन्य वैज्ञानिक अध्ययनों में ग्यिरोंग-त्रिशुली और पोइक्कू-भोटेकोसी जैसे सीमा पार नदी क्षेत्रों में भी कई झीलों को ज्यादा जोखिम वाला बताया गया है।

20 साल में बढ़ी झीलों की संख्या
वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार पिछले दो दशकों में हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों की संख्या और उनका क्षेत्रफल दोनों बढ़े हैं। साल 2000 से 2020 के बीच कई इलाकों में इन झीलों का तेजी से विस्तार हुआ है। लांगटांग क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं। इससे नई झीलें बन रही हैं और पहले से मौजूद झीलों का आकार भी बढ़ रहा है। यही वजह है कि वैज्ञानिक भविष्य में ग्लेशियल झीलों से जुड़ी घटनाओं को लेकर चिंता जता रहे हैं।

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सिर्फ झील नहीं, ग्लेशियर टूटना भी बड़ा खतरा
ग्लेशियल झीलों के अलावा ग्लेशियर का टूटना, हिमस्खलन और मलबे का अचानक नीचे आना भी बड़ी बाढ़ का कारण बन सकता है। कई बार पहाड़ से गिरने वाला मलबा नदी का रास्ता रोक देता है। इसके पीछे पानी जमा होता रहता है और जब यह बांध टूटता है तो अचानक तेज बहाव के साथ बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर आता है। मोरेन यानी ग्लेशियर के साथ जमा मिट्टी-पत्थरों की प्राकृतिक दीवारें भी समय के साथ कमजोर हो सकती हैं। तापमान बढ़ने और परमाफ्रॉस्ट के पिघलने से पहाड़ी ढलानों की स्थिरता पर भी असर पड़ता है।

बारिश, भूकंप और हिमस्खलन बढ़ा सकते हैं खतरा
मॉनसून के दौरान होने वाली भारी बारिश, भूकंप और हिमस्खलन ग्लेशियल झीलों के लिए खतरा बढ़ा सकते हैं। यदि किसी झील की प्राकृतिक दीवार टूटती है तो पानी तेजी से नीचे की ओर बह सकता है। चीन-नेपाल सीमा का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जहां ऊंचाई पर बनी झीलों का पानी कुछ ही समय में नेपाल की नदियों तक पहुंच सकता है। इसी कारण सीमा पार मौजूद ग्लेशियल झीलों की निगरानी नेपाल के लिए भी बेहद जरूरी है।

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भविष्य में बढ़ सकती हैं ऐसी घटनाएं
वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण आने वाले वर्षों में ग्लेशियर से जुड़ी बाढ़ और अन्य घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है। उच्च पर्वतीय एशिया में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी ग्लेशियल झील फटने से आने वाली बाढ़ का जोखिम इस सदी के अंत तक काफी बढ़ने का अनुमान जताया गया है। भोटेकोसी, मेलमची और सिक्किम जैसे हिमालयी क्षेत्रों में पहले भी अचानक आई बाढ़ और ग्लेशियर से जुड़ी घटनाएं भारी नुकसान कर चुकी हैं। इन घटनाओं ने दिखाया है कि खतरा केवल बड़ी ग्लेशियल झीलों से ही नहीं, बल्कि ग्लेशियर टूटने और नदी का रास्ता अचानक रुकने से भी पैदा हो सकता है।

समय रहते तैयारी जरूरी
विशेषज्ञों का कहना है कि खतरे वाली झीलों की लगातार निगरानी, पानी के स्तर पर नजर, आधुनिक पूर्व चेतावनी प्रणाली और स्थानीय लोगों को समय पर सूचना देने की व्यवस्था जरूरी है। सीमा पार स्थित झीलों के मामले में नेपाल और चीन के बीच बेहतर सहयोग भी महत्वपूर्ण है। सिर्फ एक-दो खतरनाक झीलों पर काम करने से समस्या का पूरी तरह समाधान नहीं होगा। तेजी से बदलते मौसम और ग्लेशियरों की स्थिति को देखते हुए पूरे हिमालयी क्षेत्र में लगातार निगरानी की जरूरत है। कुल मिलाकर, नेपाल और तिब्बत की सीमा पर मौजूद ग्लेशियल झीलें और तेजी से बदलते ग्लेशियर आने वाले समय में बड़ा खतरा बन सकते हैं। 47 संभावित खतरनाक ग्लेशियल झीलों का आंकड़ा इस खतरे की गंभीरता को समझने के लिए काफी है। समय रहते निगरानी, पूर्व चेतावनी और सीमा पार सहयोग मजबूत किया जाए तो भविष्य में होने वाले जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।


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News Editor

Rahul Singh

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