छह साल बाद: जम्मू-कश्मीर में विकास की नई तस्वीर
punjabkesari.in Thursday, Aug 06, 2026 - 10:53 AM (IST)
श्रीनगर : 5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक पुनर्गठन को छह वर्ष पूरे हो गए हैं। इस दौरान इस फैसले को लेकर राजनीतिक बहसें लगातार होती रही हैं, लेकिन किसी भी नीति की वास्तविक सफलता का आकलन उसके जमीनी परिणामों से होता है। आज सवाल यह नहीं है कि बहस किसने जीती, बल्कि यह है कि आम नागरिक के जीवन में क्या बदलाव आया। क्या कनेक्टिविटी बेहतर हुई? क्या रोजगार के अवसर बढ़े? क्या पर्यटन और निवेश में वृद्धि हुई? क्या सरकारी सेवाएं लोगों तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुंचीं? पिछले छह वर्षों के विकास कार्यों और उपलब्ध आंकड़ों को देखें तो जम्मू-कश्मीर की तस्वीर पहले की तुलना में काफी बदलती हुई दिखाई देती है।
सबसे बड़ा परिवर्तन बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में देखने को मिलता है। दशकों तक कठिन हिमालयी भूगोल ने इस क्षेत्र के विकास की गति को सीमित रखा। लेकिन हाल के वर्षों में सड़क, रेल और सुरंग परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर निवेश ने इस स्थिति को बदलना शुरू किया है। उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक (यूएसबीआरएल) के पूरा होने से पहली बार कश्मीर घाटी सीधे देश के रेल नेटवर्क से जुड़ गई है। इस परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा चिनाब रेल पुल है, जो नदी तल से 359 मीटर की ऊंचाई पर दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे आर्च ब्रिज है। इसके अलावा जोजिला और जेड-मोड़ सुरंग, राष्ट्रीय राजमार्गों का विस्तार, आधुनिक हवाई अड्डे और श्रीनगर स्मार्ट सिटी जैसी परियोजनाओं ने पूरे क्षेत्र की कनेक्टिविटी को नई दिशा दी है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में बिजली की पहुंच भी लगभग सार्वभौमिक स्तर तक पहुंच चुकी है।
यदि नियंत्रण रेखा (एलओसी) के दूसरी ओर पाकिस्तान के प्रशासन वाले क्षेत्रों की स्थिति देखें तो तस्वीर अलग दिखाई देती है। मंगला और नीलम-झेलम जैसे बड़े जलविद्युत परियोजनाओं के बावजूद स्थानीय लोग लंबे समय से महंगी बिजली, बार-बार होने वाली कटौती और स्थानीय स्तर पर सीमित लाभ मिलने की शिकायत करते रहे हैं। आज भी वहां रेल संपर्क उपलब्ध नहीं है और कई क्षेत्रों में सड़क एवं आधारभूत ढांचे की कमी विकास की बड़ी चुनौती बनी हुई है।
पर्यटन के क्षेत्र में भी जम्मू-कश्मीर ने उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। हाल के वर्षों में यहां दो करोड़ से अधिक पर्यटक पहुंचे हैं। सुरक्षा संबंधी कुछ घटनाओं के कारण अस्थायी गिरावट के बाद भी वर्ष 2025 में लगभग 1.77 से 1.78 करोड़ पर्यटकों ने जम्मू-कश्मीर का दौरा किया। गुलमर्ग, पहलगाम और सोनमर्ग जैसे पारंपरिक पर्यटन स्थलों के साथ-साथ केरन, गुरेज, दूधपतरी और लोलाब घाटी जैसे नए पर्यटन केंद्र भी तेजी से लोकप्रिय हुए हैं। इससे होम-स्टे, होटल, परिवहन सेवाओं, हस्तशिल्प और स्थानीय व्यापार को नई गति मिली है। आज पर्यटन क्षेत्र जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था में लगभग सात प्रतिशत का योगदान दे रहा है और लाखों लोगों की आजीविका इससे जुड़ी हुई है।
इसके विपरीत, पाकिस्तान के प्रशासन वाले क्षेत्रों में प्राकृतिक सौंदर्य होने के बावजूद पर्यटन अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुंच पाया है। स्थानीय पर्यटन कारोबारियों का मानना है कि अपर्याप्त बुनियादी ढांचा, सीमित प्रचार और सरकारी सहयोग की कमी इस क्षेत्र की सबसे बड़ी बाधाएं हैं।
आर्थिक गतिविधियों के क्षेत्र में भी जम्मू-कश्मीर ने नई संभावनाएं विकसित की हैं। पर्यटन, बागवानी, खाद्य प्रसंस्करण, विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों में लगातार निवेश बढ़ा है। वर्ष 2025-26 के दौरान लगभग 5,824 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव आकर्षित हुए। नए शैक्षणिक संस्थानों, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और डिजिटल सेवाओं के विस्तार ने युवाओं के लिए अवसर बढ़ाए हैं, जबकि कारोबार पंजीकरण और स्थानीय उद्यमिता में भी वृद्धि दर्ज की गई है।
दूसरी ओर, पाकिस्तान के प्रशासन वाले क्षेत्रों में बेरोजगारी, महंगाई और बिजली की बढ़ती कीमतें लगातार जन असंतोष का कारण बनी हुई हैं। स्थानीय संगठनों द्वारा रोजगार, सस्ती बिजली, आवश्यक वस्तुओं पर राहत और छोटे व्यवसायों के लिए अधिक सहायता की मांग लगातार उठाई जाती रही है।
संवैधानिक पुनर्गठन के बाद शासन व्यवस्था में भी कई बदलाव आए हैं। सामाजिक न्याय, आरक्षण, शिक्षा, पारदर्शिता और आर्थिक नियमन से जुड़े केंद्रीय कानूनों का विस्तार हुआ है। महिलाओं के संपत्ति अधिकारों को अधिक मजबूती मिली है और पंचायती राज संस्थाओं की भूमिका भी बढ़ी है। डिजिटल गवर्नेंस के माध्यम से प्रमाणपत्र, सरकारी योजनाओं और सार्वजनिक सेवाओं तक लोगों की पहुंच पहले की तुलना में अधिक आसान हुई है।
निस्संदेह, नियंत्रण रेखा के दोनों ओर रहने वाले लोगों की आकांक्षाएं समान हैं—शांति, सुरक्षा, सम्मान और बेहतर भविष्य। लेकिन पिछले छह वर्षों में विकास के संकेतकों पर दोनों क्षेत्रों के अनुभव अलग दिखाई देते हैं। एक ओर नई रेल सेवाएं, सुरंगें, रिकॉर्ड पर्यटन, बढ़ता निवेश और मजबूत होती सार्वजनिक सेवाएं हैं, जबकि दूसरी ओर बिजली, बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दे अब भी जन आंदोलन और विरोध प्रदर्शनों का प्रमुख कारण बने हुए हैं।
किसी भी संवैधानिक या प्रशासनिक निर्णय का अंतिम मूल्यांकन राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में आए वास्तविक बदलावों से किया जाता है। जम्मू-कश्मीर में पिछले छह वर्षों के दौरान कनेक्टिविटी, बुनियादी ढांचे, पर्यटन, निवेश और सार्वजनिक सेवा वितरण में हुए बदलाव यह संकेत देते हैं कि निरंतर निवेश और संस्थागत सुधार कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी विकास की नई संभावनाएं पैदा कर सकते हैं। इसलिए 5 अगस्त की वर्षगांठ केवल एक संवैधानिक घटना की याद नहीं है, बल्कि उन ठोस परिवर्तनों का आकलन करने का अवसर भी है, जिन्होंने जम्मू-कश्मीर के विकास को नई दिशा देने का प्रयास किया है।
