हम किसी को मां बनने के लिए मजबूर नहीं कर सकते, 30 हफ्ते के गर्भपात पर...
punjabkesari.in Saturday, Feb 07, 2026 - 04:45 PM (IST)
नेशनल डेस्क। महिला के अपने शरीर और प्रजनन संबंधी अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (6 फरवरी, 2026) को एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने एक नाबालिग लड़की को 30 हफ्ते की गर्भावस्था समाप्त करने (Medical Termination of Pregnancy) की अनुमति देते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी महिला, विशेषकर नाबालिग को उसकी इच्छा के विरुद्ध मां बनने के लिए मजबूर करना उसकी स्वायत्तता का उल्लंघन है।
अदालत की बड़ी टिप्पणी: इच्छा सर्वोपरि है
जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जवल भुइयां की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। अदालत ने कहा कि यहाँ मुख्य मुद्दा यह नहीं है कि गर्भधारण सहमति से हुआ या किसी अपराध की वजह से बल्कि सबसे महत्वपूर्ण यह है कि क्या नाबालिग उस बच्चे को जन्म देना चाहती है। कोर्ट ने माना कि चूंकि लड़की खुद नाबालिग है और उसने गर्भावस्था जारी रखने के प्रति अनिच्छा जाहिर की है इसलिए उसकी मानसिक स्थिति और भविष्य को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। नाबालिग के वकील ने दलील दी कि बिन ब्याही मां बनने और बच्चे को जन्म देने से लड़की को गहरा मानसिक आघात पहुंचेगा और सामाजिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार किया।
न्यायाधीशों का धर्मसंकट: हमारे लिए भी यह आदेश देना मुश्किल
सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने एक भावुक टिप्पणी भी की। उन्होंने कहा, 'हमारे लिए भी ऐसा आदेश देना बहुत कठिन होता है क्योंकि जो जन्म लेगा, वह भी अंततः एक जीवन है। सवाल यह है कि यदि 24 हफ्ते में गर्भपात हो सकता है तो 30 हफ्ते में क्यों नहीं? विशेषकर तब जब पीड़िता खुद इस जिम्मेदारी को नहीं उठाना चाहती।'
मुंबई के जेजे हॉस्पिटल को जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग को सुरक्षित गर्भपात की इजाजत देते हुए मुंबई के जेजे अस्पताल को निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने साफ किया कि यह प्रक्रिया पूरी तरह से चिकित्सा विशेषज्ञों की देखरेख में होनी चाहिए ताकि नाबालिग की जान को कोई खतरा न हो।
