''ग्रेट निकोबार'' की राहुल की यात्रा से मोदी सरकार घबराई, संबंधित चिंताओं पर चर्चा हो: कांग्रेस
punjabkesari.in Sunday, May 03, 2026 - 02:12 PM (IST)
नेशनल डेस्क: कांग्रेस ने ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर पारिस्थितिकी, जनजातीय अधिकारों, पारदर्शिता और सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं को विस्तार से उठाते हुए कहा कि इन मुद्दों पर संसदीय मंच में चर्चा होनी चाहिए। विपक्षी दल ने दावा किया कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की पिछले सप्ताह ग्रेट निकोबार की यात्रा के बाद से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ''घबराई हुई'' है और बचाव की मुद्रा में आ गई है। कांग्रेस महासचिव एवं संचार प्रभारी जयराम रमेश ने एक बयान में कहा, ''लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की 28 अप्रैल, 2026 को ग्रेट निकोबार की बेहद प्रभावशाली यात्रा के बाद से मोदी सरकार स्पष्ट रूप से बचाव की मुद्रा में आ गई है और उसने तीन दिन बाद ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना पर एक प्रेस नोट जारी किया।''
रमेश ने कहा कि यह प्रेस नोट उन गंभीर चिंताओं का कोई जवाब नहीं देता जिन्हें स्थानीय प्रभावित समुदायों, पर्यावरणविदों, मानवविज्ञानियों, शिक्षाविदों, नागरिक समाज के विशेषज्ञों और अन्य पेशेवरों ने उठाया है। पूर्व पर्यावरण मंत्री ने कहा, ''मैंने इन चिंताओं के बारे में केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री को 10 सितंबर, 2024 को विस्तार से बताया था और 27 सितंबर, 2024 को इस संबंध में फिर से पत्र लिखा था।'' गांधी ने पिछले सप्ताह ग्रेट निकोबार की यात्रा के दौरान आरोप लगाया था कि अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के कैंपबेल बे में ग्रेट निकोबार परियोजना ''देश की प्राकृतिक और जनजातीय विरासत के खिलाफ सबसे बड़े घोटालों और सबसे गंभीर अपराधों में से एक'' है। सरकार ने एक मई को अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों के जवाब के साथ एक विस्तृत बयान जारी किया था।
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The Modi government, clearly in damage control mode after the hugely impactful visit of the LoP Shri @RahulGandhi to Great Nicobar on April 28, 2026, issued a press note on the Great Nicobar Island Development Project three days later.
— Congress (@INCIndia) May 3, 2026
Yet, its press note issued three days later… pic.twitter.com/cUkM04i9Hn
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सरकारी बयान में कहा गया था, ''ग्रेट निकोबार परियोजना अंडमान सागर में भारत की उपस्थिति को मजबूत करने की एक रणनीतिक पहल है। इसका उद्देश्य बंदरगाह आधारित विकास को सोच-समझकर तय किए गए पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों के साथ संतुलित करना है। स्थानीय समुदायों की सुरक्षा इस योजना के केंद्र में है।'' रमेश ने चार पृष्ठों के अपने विस्तृत बयान में ग्रेट निकोबार परियोजना से जुड़ी प्रमुख चिंताओं का उल्लेख किया। कांग्रेस नेता ने पारिस्थितिकी संबंधी चिंताओं को उठाते हुए कहा कि ग्रेट निकोबार, अंडमान और निकोबार समूह के अन्य सभी द्वीपों से अलग और विशिष्ट है। उन्होंने कहा, ''सरकार का यह दावा अप्रासंगिक और भ्रामक है कि इस परियोजना के लिए द्वीप समूह की कुल भूमि का केवल 1.82 प्रतिशत इस्तेमाल किया जा रहा है। यह ग्रेट निकोबार के उस पारिस्थितिकी तंत्र की पारिस्थितिक और जैविक समृद्धि की अनदेखी करता है जो द्वीप समूह और दुनिया, दोनों में अद्वितीय है।''
रमेश ने आरोप लगाया कि भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) और भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (जेडएसआई) जैसे संस्थानों पर परियोजना की पर्यावरणीय मंजूरी और संबंधित प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाने के लिए दबाव डाला गया। उन्होंने कहा, ''अब इन्हीं संस्थानों को ग्रेट निकोबार में जैव विविधता अनुसंधान और निगरानी की परियोजनाएं दी गई हैं। यहां हितों का स्पष्ट टकराव है।'' कांग्रेस नेता ने कहा कि इसके अलावा, परियोजना की कड़ी आलोचना करने वाले कुछ प्रतिष्ठित और स्वतंत्र सोच वाले संस्थानों को मोदी सरकार ने काली सूची में डाल दिया है। रमेश ने कहा कि परियोजना को दी गई पर्यावरणीय मंजूरी को चुनौती देने के मामले में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) द्वारा गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति (एचपीसी) को लेकर भी यही स्थिति है। उन्होंने कहा कि उच्चाधिकार प्राप्त समिति के सभी सदस्य या तो परियोजना प्रस्तावकों का प्रतिनिधित्व करते हैं या उन एजेंसियों से जुड़े हैं जिन्होंने मंजूरी दी है। रमेश ने कहा कि हरियाणा में प्रतिपूरक वनीकरण का प्रस्ताव पारिस्थितिकी सिद्धांतों का उपहास है। रमेश ने जनजातीय अधिकारों से जुड़ी चिंताओं को उठाते हुए कहा कि निकोबारी जनजातीय समुदाय ने परियोजना और उनके जंगलों, अधिकारों एवं जीवनशैली पर इसके प्रभाव को लेकर कई बार चिंता जताई है।
