सिर्फ 4% सैनिक स्कूल छात्र ही NDA में सफल, रिपोर्ट में हुआ बड़ा खुलासा
punjabkesari.in Monday, Mar 30, 2026 - 11:10 AM (IST)
नेशनल डेस्क: भारत में सैनिक स्कूल की स्थापना 1970 के दशक में इस उद्देश्य से की गई थी कि सेना के लिए अनुशासित और योग्य अधिकारी तैयार किए जा सकें। लंबे समय तक ये स्कूल इस लक्ष्य को पूरा करने में काफी सफल भी रहे। उदाहरण के तौर पर मौजूदा सेना प्रमुख जनरल उपेन्द्र द्विवेदी और नौसेना प्रमुख एडमिरल डीके त्रिपाठी दोनों ही एक ही सैनिक स्कूल के छात्र रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में इन स्कूलों के प्रदर्शन में गिरावट देखने को मिली है। पहले जहां करीब 20 प्रतिशत तक छात्र सेना में अधिकारी बनते थे, वहीं अब यह आंकड़ा घटकर लगभग 4 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
यह आंकड़ा घटकर न्यूनतम स्तर 4 फीसदी पर आ गया है।
रक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2020-21 में सैनिक स्कूलों के करीब 11 प्रतिशत छात्र एनडीए परीक्षा में सफल हुए थे। लेकिन 2023-24 तक यह संख्या घटकर सिर्फ 4.3 प्रतिशत रह गई। इससे साफ है कि इन स्कूलों से सेना में जाने वाले छात्रों की संख्या लगातार कम हो रही है। दूसरी ओर, राष्ट्रीय मिलिट्री स्कूल (RMS) और राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कॉलेज (RIMC) के छात्रों का प्रदर्शन इस दौरान बेहतर बना हुआ है। इन संस्थानों से एनडीए में चयन का प्रतिशत अभी भी अधिक है।
स्थायी समिति ने कहा, उपाय तलाशें
इस मुद्दे पर हाल ही में संसद की रक्षा मामलों की स्थायी समिति ने चिंता जताई है। राधामोहन सिंह की अध्यक्षता वाली इस समिति ने सरकार से कहा है कि सैनिक स्कूलों के प्रदर्शन को सुधारने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि इनकी सफलता RMS और RIMC के बराबर हो सके।
वहीं, रक्षा मंत्रालय का कहना है कि पिछले 10 से 15 वर्षों में छात्रों के सामने करियर के कई नए विकल्प खुल गए हैं। इसी वजह से अब सभी छात्र सेना में ही करियर बनाने का विकल्प नहीं चुन रहे। मंत्रालय के अनुसार, सैनिक स्कूलों का मुख्य उद्देश्य छात्रों में अनुशासन और नेतृत्व क्षमता विकसित करना है, जबकि करियर का चुनाव छात्र स्वयं करते हैं। कुल मिलाकर, सैनिक स्कूलों की भूमिका अभी भी महत्वपूर्ण है, लेकिन बदलते समय और करियर विकल्पों के चलते इनके मूल उद्देश्य को लेकर नई चुनौतियां सामने आ रही हैं।
