हर मतभेद की शुरुआत मुकदमेबाजी से नहीं होनी चाहिए: सीतारमण

punjabkesari.in Tuesday, Sep 22, 2026 - 07:22 PM (IST)

नई दिल्लीः वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मंगलवार को कंपनियों से हर मतभेद को अदालत में ले जाने से बचने और कंपनी संचालन व्यवस्था को मजबूत करने पर ध्यान देने का आग्रह किया। सीतारमण ने यहां एआईएमए (ऑल इंडिया मैनेजमेंट एसोसिएशन) के एक कार्यक्रम में कहा कि अच्छा कंपनी संचालन केवल बाहरी नियमों को अपनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन मानकों पर भी निर्भर करता है जिन्हें संस्थान खुद के लिए तय करते हैं। सीतारमण ने कहा कि कारोबार क्षेत्रों के बीच भरोसा मांगा नहीं जा सकता, बल्कि दोनों पक्षों के आचरण से उसे बनाया जाता है।

उन्होंने कहा, ''कंपनियों को सरकार और नियामकों के साथ रचनात्मक तरीके से बातचीत करनी चाहिए। कानूनी रास्ता हमेशा उपलब्ध रहेगा, लेकिन हर असहमति की शुरुआत कानूनी विवाद से नहीं होनी चाहिए। मतभेद विवाद का रूप लें, इससे पहले तथ्यों को सामने रखकर, परामर्श प्रक्रिया में गंभीरता से भाग लेकर और समाधान की दिशा में काम करके शुरुआती स्तर पर बातचीत करना काफी महत्वपूर्ण है।'' सीतारमण ने कहा कि इसके साथ ही कंपनियों को अपने कामकाज में निश्चितता, पारदर्शिता और दूसरों की बात सुनने की इच्छा दिखानी चाहिए। एक परिपक्व अर्थव्यवस्था में असहमति को तुरंत टकराव में बदले बिना उससे निपटने की क्षमता होनी चाहिए। वित्त मंत्री ने भारतीय उद्योग जगत से केवल कारोबार का विस्तार करने के बजाय मजबूत, टिकाऊ और बेहतर संचालन वाली कंपनियां बनाने पर ध्यान देने को कहा।

उन्होंने कहा कि 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए उद्योग को इस दिशा में आगे बढ़ना होगा। उन्होंने कहा कि भारतीय उद्योग को ऐसे संस्थान और कंपनियां बनानी चाहिए, जिनमें बड़े पैमाने के साथ टिकाऊपन, बेहतर गुणवत्ता, अच्छा संचालन और मजबूत प्रौद्योगिकी क्षमता हो। सीतारमण ने कहा, ''भारत के पास आज बड़े बाजार का आकार, उद्यमिता का उत्साह और संस्थागत क्षमता है, जिससे वह कहीं अधिक ऊंचे लक्ष्य तय कर सकता है। इन क्षमताओं को देश की दीर्घकालिक क्षमता में कितनी सफलता से बदला जाता है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि योजनाओं और कार्यों को कितनी प्रभावी ढंग से अमल में लाया जाता है।'' उन्होंने कहा कि देश के विकसित भारत की ओर बढ़ने के साथ आज बनाए जा रहे उद्यमों और संस्थानों की गुणवत्ता से भारतीय प्रबंधन के योगदान को आंका जाएगा।

वित्त मंत्री ने उद्योग जगत से ऐसी कंपनियां बनाने पर ध्यान देने को कहा जो केवल बड़ी न हों, बल्कि प्रतिस्पर्धी, नवोन्मेषी, भरोसेमंद और मजबूत भी हों, ताकि आने वाले दशकों में भारत की आर्थिक वृद्धि में योगदान दे सकें। उन्होंने देश की वृद्धि के अगले चरण में गुणवत्ता को प्राथमिकता देने की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि कंपनियों को अनुसंधान एवं विकास पर अधिक खर्च करना चाहिए। इसके लिए वे अपने स्तर पर अनुसंधान करने के साथ शैक्षणिक संस्थानों के साथ भी सहयोग कर सकती हैं।

उन्होंने कहा कि इससे नवोन्मेष को बढ़ावा देने और मौजूदा उत्पादों में सुधार करने में मदद मिलेगी। साथ ही, अनुसंधान एवं विकास पर अधिक खर्च का परिणाम भारत में और भारत से अधिक बौद्धिक संपदा के सृजन के रूप में भी सामने आना चाहिए। सीतारमण ने कहा, हमारा लक्ष्य 'भारत में विनिर्मित' से आगे बढ़कर 'भारत में विकसित' उत्पादों का होना चाहिए। ऐसे उत्पाद जो केवल यहां बनाए न जाएं, बल्कि उनकी कल्पना, डिजाइन और तकनीकी विकास भी यहीं हो तथा उन्हें दुनिया के बाजारों तक पहुंचाया जाए।

 उन्होंने कहा कि भारत का सकल अनुसंधान एवं विकास व्यय जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का 0.83 प्रतिशत है। यह आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) के औसत 2.7 प्रतिशत, चीन के 2.6 प्रतिशत और अमेरिका के 3.5 प्रतिशत से काफी कम है। यह निजी क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास की लगातार बनी कमी को दर्शाता है। भारत में घरेलू निजी क्षेत्र का योगदान केवल 36 प्रतिशत है, जबकि प्रमुख विकसित अर्थव्यवस्थाओं में यह 70 प्रतिशत से अधिक है।

सीतारमण ने प्रबंधन शिक्षा के क्षेत्र में क्षमता निर्माण का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कंपनियों के संस्थापकों और शुरुआती कर्मचारियों के लिए नियुक्ति, जिम्मेदारियों के बंटवारे, वित्तीय अनुशासन, ग्राहक प्रबंधन, नियमों के अनुपालन और बेहतर कार्यप्रणाली विकसित करने जैसे विषयों पर छोटे तथा व्यावहारिक पाठ्यक्रम तैयार किए जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि पारिवारिक कारोबार के लिए भी उत्तराधिकार योजना, संचालन व्यवस्था, पेशेवर प्रबंधन, विवाद प्रबंधन और जिम्मेदारियों के बंटवारे से जुड़े व्यावहारिक कार्यक्रमों की जरूरत है। वित्त मंत्री ने कंपनियों के नेतृत्व से केवल औपचारिक शहरी अभिजात्य वर्ग को ध्यान में रखकर उत्पाद और सेवाएं तैयार करने से बचने को कहा।

उन्होंने कहा, ''भारत की खपत का आधार कृषि, ग्रामीण निर्माण, परिवहन और असंगठित उद्यमों से जुड़े कामकाजी परिवार हैं। अगर भारतीय कंपनियां केवल शहरी वर्ग के लिए महंगे और प्रीमियम उत्पादों पर ध्यान देंगी, तो आर्थिक वृद्धि की संरचनात्मक मजबूती कमजोर होगी।'' सीतारमण ने कहा कि अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों को निजी भागीदारी के लिए खोलने से अवसरों का दायरा भी बढ़ रहा है। देश की विकास संबंधी जरूरतें बाजार के जरिये पूरी की जा सकती हैं और उद्योग जगत को इन्हें पूरा करने के लिए आगे आना चाहिए। 


 


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Content Editor

Sahil Kumar

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