UAPA को इस तरह से सीमित करने का देशव्यापी असर हो सकता है: SC, तीनों छात्रों को शीर्ष अदालत का नोटिस

2021-06-18T20:21:08.123

नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि दिल्ली दंगा मामले में तीन छात्र कार्यकर्ताओं को जमानत देने के फैसले में हाईकोर्ट द्वारा आतंकवाद रोधी कानून यूएपीए के दायरे को ‘सीमित करना एक महत्वपूर्ण' मुद्दा है जिसका पूरे देश पर असर हो सकता है। इसलिए इसकी व्याख्या की जरूरत है।

शीर्ष अदालत ने हालांकि तीनों आरोपियों की जमानत देने के हाईकोर्ट के 15 जून के फैसले पर रोक लगाने से इंकार कर दिया, लेकिन स्पष्ट किया कि इन फैसलों को देश में अदालतें मिसाल के तौर पर दूसरे मामलों में ऐसी ही राहत के लिए इस्तेमाल नहीं करेंगी। न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता और न्यायमूर्ति वी रामसुब्रमण्यम की अवकाशकालीन पीठ ने कहा कि हमारे लिये ‘‘परेशानी'' की बात यह है कि हाईकोर्ट ने जमानत के फैसले में पूरे यूएपीए पर चर्चा करते हुए ही 100 पृष्ठ लिखे हैं और शीर्ष अदालत को इसकी व्याख्या करनी होगी।

शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के फैसलों को चुनौती देने वाली दिल्ली पुलिस की अपीलों पर जेएनयू छात्र नताशा नरवाल और देवांगना कालिता और जामिया छात्र आसिफ इकबाल तनहा को नोटिस जारी किए हैं। तीनों आरोपियों को इन अपील पर चार सप्ताह के भीतर जवाब देने हैं। इस मामले पर अब 19 जुलाई को शुरू हो रहे हफ्ते में सुनवाई की जाएगी। इन आरोपियों को जमानत देने के उच्च न्यायालय के फैसलों पर रोक लगाने से इनकार करते हुए पीठ ने कहा कि किसी भी अदालत में कोई भी पक्ष इन फैसलों को मिसाल के तौर पर पेश नहीं करेगा।

पीठ ने कहा, ‘‘यह स्पष्ट किया जाता है कि प्रतिवादी (नरवाल, कालिता और तनहा) को जमानत पर रिहा करने पर इस वक्त हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा।'' सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने यह दलील दी कि हाईकोर्ट ने तीन छात्र कार्यकर्ताओं को जमानत देते हुए पूरे गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) कानून (यूएपीए) को पलट दिया है।

इस पर गौर करते हुए पीठ ने कहा, ‘‘यह मुद्दा महत्वपूर्ण है और इसके पूरे भारत में असर हो सकते हैं। हम नोटिस जारी करके दूसरे पक्ष को सुनना चाहेंगे। इस कानून की जिस तरह व्याख्या की गई है उस पर संभवत: सुप्रीम कोर्ट को गौर करने की आवश्यकता होगी। इसलिए हम नोटिस जारी कर रहे हैं।'' छात्र कार्यकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट को यूएपीए के असर और व्याख्या पर गौर करना चाहिए ताकि इस मुद्दे पर शीर्ष अदालत का सुविचारित फैसला आए।

अदालत ने कहा, ‘‘कई सवाल हैं जो इसलिए खड़े हुए क्योंकि हाईकोर्ट में यूएपीए की वैधता को चुनौती नहीं दी गई थी। ये जमानत अर्जियां थी।'' इस मामले की सुनवाई की शुरुआत में मेहता ने उच्च न्यायालय के फैसलों का उल्लेख किया और कहा, ‘‘पूरे यूएपीए को सिरे से उलट दिया गया है।''


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Content Writer

Yaspal

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