हिंसा में झुलस रहे ईरान का खास लोहड़ी कनेक्शन उजागर, बड़ी गहराई से जुड़ा भारत से खास नाता
punjabkesari.in Monday, Jan 12, 2026 - 06:18 PM (IST)
International Desk: ईरान इस वक्त हिंसा, विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक अस्थिरता की “आग” में जल रहा है। लेकिन इसी उथल-पुथल के बीच एक सांस्कृतिक पहलू भी सामने आता है, जो भारत और ईरान को गहराई से जोड़ता है। पंजाब की लोहड़ी और ईरान का पारंपरिक त्योहार चहार-शंबे सूरी दोनों में आग को पवित्र मानने और सामूहिक उत्सव की परंपरा समान रूप से दिखाई देती है। यूं तो आज ईरान एक इस्लामी देश है, लेकिन उसका इतिहास उसे उसकी फारसी जड़ों से जोड़ता है। यह वह सभ्यता है, जहां सूर्य, चंद्रमा, जल, वन और विशेष रूप से अग्नि को दैवीय माना गया। यही कारण है कि नमाज़ और सिजदे से अलग, ईरान की संस्कृति में प्रतीकों और प्रकृति-पूजा की परंपराएं आज भी जीवित हैं।
13 जनवरी को लोहड़ी, उधर ईरान में अग्नि उत्सव
उत्तर भारत, खासकर पंजाब और हरियाणा में 13 जनवरी को लोहड़ी का पर्व मनाया जाता है। यह सर्दी की एक सामूहिक शाम होती है, जहां आग जलाई जाती है, नई फसल की बालियां भूनी जाती हैं, मूंगफली और रेवड़ियां बांटी जाती हैं। भांगड़ा और गिद्दा के साथ यह त्योहार नई ऊर्जा और खुशहाली का प्रतीक बनता है। ईरान में साल खत्म होने से पहले मनाया जाने वाला चहार-शंबे सूरी भी कुछ इसी भावना को दर्शाता है। लोग परिवार और समाज के साथ इकट्ठा होकर आग जलाते हैं, उसके चारों ओर नाचते-गाते हैं और आग के ऊपर से छलांग लगाते हैं। मान्यता है कि इससे बीते साल की नकारात्मकता आग में जलकर खत्म हो जाती है और नया साल उम्मीदों के साथ शुरू होता है।
अग्नि: भारत और ईरान की आस्था
भारतीय सनातन परंपरा में अग्नि को पंचतत्वों में सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। ऋग्वेद में अग्नि प्रथम देव है “इदं अग्नये इदं न मम” यानी यह अग्नि को समर्पण की भावना का प्रतीक है। इसी तरह ईरान में चहार-शंबे सूरी के दौरान लोग आग से यह प्रार्थना करते हैं-“ऐ आतिश-ए-मुक़द्दस! ज़रदी-ए-मन अज़ तू, सुर्ख़ी-ए-तू अज़ मन” अर्थात, “हे पवित्र आग, मेरा पीलापन तुम ले लो और अपनी ऊर्जा की लालिमा मुझे दे दो।”यह भावना भारतीय वैदिक मंत्रों से आश्चर्यजनक रूप से मेल खाती है, जहां अग्नि से जीवन, चेतना और सुख की कामना की जाती है।
साझी सांस्कृतिक विरासत
ईरान और भारत की यह साझा सांस्कृतिक विरासत बताती है कि त्योहार केवल धर्म से नहीं, बल्कि सभ्यता से जन्म लेते हैं। हालांकि बीते वर्षों में ईरानी शासन ने सुरक्षा और अराजकता का हवाला देकर इस अग्नि उत्सव को सीमित करने की कोशिश की है, लेकिन परंपराएं किसी सरकारी आदेश से खत्म नहीं होतीं।आज जब ईरान राजनीतिक हिंसा और दमन के दौर से गुजर रहा है, तब लोहड़ी और चहार-शंबे सूरी जैसे त्योहार याद दिलाते हैं कि आग सिर्फ विनाश की नहीं, बल्कि नई शुरुआत और उम्मीद की भी प्रतीक है।
