कंबोडिया में बैठकर भारत में करोड़ों की ठगी; गांधी-अंबेदकर की तस्वीरें और...,जानें कैसे चलता था ‘डिजिटल अरेस्ट’ का खौफनाक खेल
punjabkesari.in Saturday, Sep 26, 2026 - 12:35 PM (IST)
Washington: एक फोन कॉल से शुरू होती थी ठगी, दूसरे कमरे में नकली पुलिस अफसर बनकर डराया जाता और तीसरे कमरे में पहुंचते ही करोड़ों रुपये ऐंठ लिए जाते। कंबोडिया में चल रहे एक साइबर ठगी केंद्र की जांच में ‘डिजिटल अरेस्ट’ के ऐसे नेटवर्क का खुलासा हुआ है, जहां ठगी को बाकायदा तीन चरणों में बांटकर चलाया जाता था। पुलिस जांच में सूरत की 24 वर्षीय युवती खुशी चौधरी की गिरफ्तारी के बाद इस पूरे नेटवर्क की कई परतें सामने आई हैं। गुरुग्राम पुलिस की जांच के मुताबिक कंबोडिया की राजधानी नोम पेन्ह स्थित एक साइबर ठगी केंद्र में ठगों का काम तीन अलग-अलग स्तरों में बंटा हुआ था। पहली लाइन में काम करने वाले कर्मचारी फोन करते थे। वे खुद को कभी कुरियर कंपनी का कर्मचारी तो कभी कानून लागू करने वाली एजेंसी का अधिकारी बताते थे। पीड़ितों से कहा जाता था कि उनके नाम से भेजे गए पार्सल में अवैध सामान मिला है या उनके बैंक खाते से जुड़ा हवाला लेनदेन आतंकवादी संगठनों तक पहुंचा है।
अगर कोई व्यक्ति डरकर उनकी बातों में आ जाता तो फोन को दूसरी लाइन में स्थानांतरित कर दिया जाता था। दूसरे कमरे को जानबूझकर भारतीय सरकारी कार्यालय जैसा बनाया गया था। वहां वीडियो कॉल पर पुलिस की वर्दी पहना एक व्यक्ति दिखाई देता था। उसके पीछे महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव आंबेडकर और सरदार वल्लभभाई पटेल की तस्वीरें लगाई गई थीं, ताकि पीड़ित को लगे कि वह वास्तव में किसी भारतीय पुलिस कार्यालय से बात कर रहा है। नकली पुलिस अधिकारी आक्रामक अंदाज में पीड़ित को डराता और उसे निर्देशों का पालन करने के लिए मजबूर करता था। ठगी का अंतिम चरण तीसरी लाइन में होता था। यहां अनुभवी ठग खुद को प्रवर्तन निदेशालय या केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो का अधिकारी बताते थे। जांच के अनुसार, इस मामले में एक ठग कथित तौर पर ‘राहुल गुप्ता’ नाम का इस्तेमाल करता था।
इस चरण में पीड़ित को अलग-अलग बैंक खातों में बड़ी रकम भेजने के लिए कहा जाता था। तब तक पीड़ित काफी देर से ठगों के संपर्क में रहता था और उस पर मानसिक दबाव बनाया जा चुका होता था। ‘डिजिटल अरेस्ट’ के दौरान पीड़ितों पर लगातार मानसिक दबाव बनाया जाता था। उन्हें फोन बंद न करने और किसी दूसरे व्यक्ति से संपर्क न करने का निर्देश दिया जाता था। परिवार को नुकसान पहुंचाने की धमकी देकर उन्हें अलग-थलग रखा जाता था। डर के कारण कई पीड़ित अपनी बैंक जमा राशि से करोड़ों रुपये तक ठगों के खातों में भेज देते थे। कभी उनसे कहा जाता था कि यह रकम जांच के लिए सुरक्षित खाते में भेजी जा रही है और कभी उन्हें यह समझाया जाता था कि इससे उनके खाते में मौजूद धन की वैधता साबित होगी। रकम निकल जाने के बाद अचानक पूरा ‘डिजिटल अरेस्ट’ खत्म हो जाता था।
भारत की खुशी कैसे पहुंची कंबोडिया?
इस मामले में गिरफ्तार 24 वर्षीय खुशी चौधरी सूरत में एक कैफे में बरिस्ता के तौर पर काम करती थी। पुलिस के मुताबिक नवंबर 2023 में एक परिचित के पति ने उसे बेहतर नौकरी का लालच देकर दुबई जाने के लिए राजी किया। वहां उसने कुछ समय अजमान के एक साइबर ठगी केंद्र में काम किया। इसके बाद कथित तौर पर उसे एक पाकिस्तानी भर्ती कराने वाले व्यक्ति के संपर्क में लाया गया, जो उसे अगस्त 2024 में कंबोडिया ले गया। बोडिया में वह नोम पेन्ह स्थित ‘मैंगो पार्क’ नाम की इमारत में चल रहे साइबर ठगी केंद्र में काम करने लगी। जांचकर्ताओं के मुताबिक खुशी ने शुरुआत लाइन-1 ऑपरेटर के रूप में की थी। बाद में वह ‘मर्चेंट’ की भूमिका में आ गई। इस काम में ठगी से मिली रकम को भारत में मौजूद अलग-अलग म्यूल बैंक खातों में बांटना शामिल था।इसके बाद पैसा विदेश भेजा जाता और कथित तौर पर क्रिप्टोकरेंसी में बदला जाता था। पुलिस अधिकारी के मुताबिक यह पूरा लेनदेन कई बार महज कुछ मिनटों में पूरा कर दिया जाता था।
पुलिस जांच के अनुसार खुशी को करीब 700 डॉलर यानी लगभग 60 हजार रुपए मासिक वेतन मिलता था। इसके अलावा हर उस व्यक्ति पर करीब 50 डॉलर का अतिरिक्त भुगतान मिलता था जो उसके जरिए ठगी के जाल में फंस जाता था। उसके काम के घंटे सुबह 9 बजे से रात 8 बजे तक बताए गए हैं। जांच के मुताबिक लाइन-1 में काम करने वाले कर्मचारी एक घंटे में 30 से 40 फोन तक करते थे। इस साइबर ठगी केंद्र में कर्मचारियों को सिर्फ वेतन ही नहीं दिया जाता था, बल्कि ज्यादा लोगों को ठगी के जाल में फंसाने के आधार पर पदोन्नति का लालच भी दिया जाता था। पुलिस के अनुसार, जो कर्मचारी अच्छा प्रदर्शन करते थे उन्हें ऊपर की भूमिका में पहुंचाया जाता था। इसके साथ वेतन बढ़ने और गिरोह के शीर्ष स्तर के करीब पहुंचने का मौका मिलता था।इतना ही नहीं, कर्मचारियों को आकर्षित करने के लिए सप्ताहांत में महंगी विला में पार्टियां भी आयोजित की जाती थीं।
चीनी नागरिक थे बॉस
खुशी ने पुलिस पूछताछ में कथित तौर पर बताया कि उसके दो वरिष्ठ अधिकारी चीनी नागरिक थे, जिन्हें वह ‘लायन’ और ‘पांडा’ के नाम से जानती थी। जांचकर्ताओं का कहना है कि यह पूरा नेटवर्क अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करता था और ठगी की रकम का वित्तीय रास्ता कई देशों से होकर गुजरता था। इस पूरे मामले की जांच तब तेज हुई जब गुरुग्राम की एक 81 वर्षीय महिला ने शिकायत दर्ज कराई कि उससे करीब 2.9 करोड़ रुपये की ठगी की गई। महिला को कथित तौर पर तीन दिनों तक ‘डिजिटल अरेस्ट’ में रखा गया था। दिसंबर 2024 में हुई इस ठगी के बाद पुलिस ने नेटवर्क की जांच शुरू की। खुशी को 29 जून को दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से गिरफ्तार किया गया। पुलिस के मुताबिक वह भारत लौट रही थी। वह इस मामले में गिरफ्तार होने वाली 16वीं आरोपी थी। जिस मामले की जांच के दौरान खुशी तक पुलिस पहुंची, उसमें उसके अलावा 15 अन्य संदिग्धों को भी गिरफ्तार किया गया है। इनमें बड़ी संख्या उन लोगों की बताई गई है जिनके बैंक खातों का इस्तेमाल कथित तौर पर ठगी की रकम प्राप्त करने के लिए किया गया था। पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धोखाधड़ी, जालसाजी और फर्जी दस्तावेज से संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है।
