इस देश में वीकेंड पर काम करके फंसा भारतीय; बॉस ने तारीफ की बजाय लगाई फटकार, X पर शेयर किया Shocking वर्क कल्चर
punjabkesari.in Saturday, Jun 13, 2026 - 01:32 PM (IST)
International Desk: भारत में अक्सर देर रात तक काम करना, छुट्टियों में भी दफ्तर के ईमेल देखना और बीमार होने पर भी ऑफिस का काम जारी रखना समर्पण और मेहनत की पहचान माना जाता है। लेकिन नॉर्वे में रहने वाले एक भारतीय पेशेवर का अनुभव इस सोच से बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करता है। नॉर्वे में कार्यरत भारतीय कर्मचारी विनोद ने सोशल मीडिया पर अपना अनुभव साझा किया, जो अब तेजी से वायरल हो रहा है। उनकी पोस्ट ने दुनिया के अलग-अलग देशों की कार्य संस्कृति और वर्क-लाइफ बैलेंस को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। विनोद ने बताया कि करीब 15 साल पहले जब वह नॉर्वे पहुंचे, तो भारत में सीखी हुई कार्यशैली के अनुसार ही काम करने लगे। वह वीकेंड पर भी ईमेल का जवाब देते थे, लंच ब्रेक छोड़ देते थे और कई बार प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए अपनी छुट्टियां भी रद्द कर देते थे। उन्हें लगता था कि इससे उनकी मेहनत और प्रतिबद्धता साबित होगी।
15 years ago, I moved to Norway 🇳🇴... carrying my Indian work ethic - weekend work, skipped lunches, late evenings, and pushing myself even when I was not well.
— Vinod (@turiyatman) June 10, 2026
Then one day, during my early days in Norway, my boss called me in. I thought I was going to be praised.
You replied…
लेकिन एक दिन उनके मैनेजर ने उन्हें अपने केबिन में बुलाया। विनोद को उम्मीद थी कि उनकी प्रशंसा होगी, लेकिन बातचीत का रुख बिल्कुल अलग निकला। मैनेजर ने उनसे पूछा कि उन्होंने शनिवार को ऑफिस ईमेल का जवाब क्यों दिया और छुट्टियां रद्द करके काम क्यों किया। विनोद के अनुसार उनके मैनेजर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि छुट्टियां लेना कोई विकल्प नहीं बल्कि जरूरी है। मैनेजर ने समझाया कि यदि वरिष्ठ कर्मचारी छुट्टियों में भी काम करेंगे तो कनिष्ठ कर्मचारियों पर भी वही दबाव बनेगा और इससे पूरे कार्यस्थल का संतुलन बिगड़ जाएगा। उनके लिए यह अनुभव किसी बड़े सांस्कृतिक झटके से कम नहीं था। विनोद का कहना है कि भारत में अतिरिक्त काम को अक्सर समर्पण और सफलता का प्रतीक माना जाता है, जबकि नॉर्वे में कर्मचारियों के निजी जीवन, परिवार और मानसिक स्वास्थ्य को भी उतनी ही अहमियत दी जाती है जितनी उनके काम को। नॉर्वे में यह धारणा मजबूत है कि बेहतर जीवन जीने वाला कर्मचारी लंबे समय तक अधिक उत्पादक और रचनात्मक रह सकता है।
दुनिया के सबसे संतुलित कार्यस्थलों में गिने जाने वाले नॉर्वे में कर्मचारी आमतौर पर सप्ताह में लगभग 37.5 घंटे काम करते हैं। कार्य समय समाप्त होने के बाद लोग परिवार, दोस्तों और अपने शौक के लिए समय निकालते हैं। यहां ओवरटाइम सीमित होता है और उसका अतिरिक्त भुगतान भी किया जाता है। इसके अलावा कर्मचारियों को हर साल लगभग पांच सप्ताह की सवैतनिक छुट्टियां मिलती हैं। माता-पिता के लिए लंबी पैरेंटल लीव की सुविधा भी उपलब्ध है। कार्यस्थलों पर बॉस और कर्मचारियों के बीच अत्यधिक औपचारिक दूरी नहीं होती और टीमवर्क को व्यक्तिगत उपलब्धियों से ज्यादा महत्व दिया जाता है। नॉर्वे की कार्य संस्कृति की एक खास बात यह भी है कि कार्य समय खत्म होने के बाद कर्मचारियों से ईमेल या कॉल का जवाब देने की अपेक्षा नहीं की जाती।
नियोक्ता कर्मचारियों पर भरोसा करते हैं कि वे निर्धारित समय के भीतर अपना काम पूरा करेंगे। यही कारण है कि वहां कर्मचारियों में तनाव अपेक्षाकृत कम और संतुष्टि का स्तर अधिक देखा जाता है। विनोद की पोस्ट वायरल होने के बाद हजारों लोगों ने इस पर प्रतिक्रिया दी। कई लोगों ने कहा कि स्वस्थ वर्क-लाइफ बैलेंस ही लंबे समय तक बेहतर प्रदर्शन और खुशहाल जीवन का आधार है। वहीं कुछ लोगों ने यह भी माना कि भारत जैसे तेजी से विकसित हो रहे देशों में अभी भी कई क्षेत्रों में कर्मचारियों के लिए ऐसा संतुलन हासिल करना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। हालांकि इस पूरी चर्चा ने एक महत्वपूर्ण सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या अधिक घंटे काम करना ही सफलता और मेहनत का पैमाना है, या फिर काम और निजी जीवन के बीच संतुलन बनाना ही वास्तविक उपलब्धि है?
