Ahmedabad plane crash: सात समंदर पार इंतजार करता रह गया बेटा, कंक्रीट के मलबे में दफन हो गए बुजुर्ग माता-पिता और उनके सपने

punjabkesari.in Friday, Jun 12, 2026 - 12:18 PM (IST)

नेशनल डेस्क : आज यानि की 12 जून का दिन इतिहास के पन्नों में काले शब्दों से लिखा जाएगा। आज ही के दिन अहमदाबाद में हुई विमान दुर्घटना को एक साल पूरा हो चुका है। इस हादसे में कई हंसते- खेलते परिवार उजड़ गए। यह खौफनाक मंजर जिसने भी देखा उसकी आंखों में आज भी इसकी यादें ताजा हैं। अब दुर्घटनास्थल से मलबा साफ हो चुका है और चीख-पुकार भी शांत है, लेकिन अपनों को खोने वाले परिवारों के लिए जिंदगी उसी दर्दनाक मोड़ पर ठहर गई है।

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कई बेकसूरों की गई जान

इस विमान हादसे ने कई मासूम सपनों को बेरहमी से कुचल दिया, जिसमें खेड़ा के रहने वाले एक बुजुर्ग दंपति, रजनीकांत भाई और पुष्पाबेन दर्जी की कहानी सबसे ज्यादा झकझोर देने वाली है। रजनीकांत भाई और पुष्पाबेन ने बेहद तंगी और मुश्किलों का सामना करते हुए जीवन भर संघर्ष किया। उनका एकमात्र लक्ष्य अपने बेटे को एक बेहतर भविष्य देना था। माता-पिता के त्याग की बदौलत बेटे ने कड़ी मेहनत की और उसी मेडिकल नेटवर्क कैंपस से डॉक्टर की डिग्री हासिल की, जहां बाद में यह विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ।  डॉक्टर बनने के बाद बेटा ब्रिटेन (UK) चला गया, जहाँ उसने अपने करियर में बड़ी सफलता हासिल की। ब्रिटेन में सेटल होने के बाद बेटे ने अपने बुजुर्ग माता- पिता को अपने पास बुलाना चाहा इसके लिए उसने फ्लाइट की टिकट से लेकर हर छोटी-बड़ी व्यवस्था पूरी कर ली थी। बुजुर्ग दंपति ने इससे पहले कभी अहमदाबाद से बाहर कदम भी नहीं रखा था।

पहली उड़ान बनी जीवन का आखिरी सफर

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हादसे की पहली बरसी पर शोक में डूबा परिवार दुर्घटनास्थल पर दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए प्रार्थना करने पहुँचा। उस मनहूस जगह पर खड़े होकर रिश्तेदारों के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। रजनीकांत भाई के भाई, प्रमोद भाई ने बेहद भावुक होते हुए बताया, "मेरे भाई और भाभी ने जीवन भर तकलीफें सहकर बेटे को पढ़ाया-लिखाया। आज उनका बेटा यूके में बेहद कामयाब है। वह सबसे पहले अपने माता-पिता को सुख-सुविधा भरा जीवन देने के लिए अपने पास बुला रहा था। दोनों कभी अहमदाबाद से बाहर नहीं गए थे और यह उनकी जिंदगी का पहला हवाई सफर था, जो आखिरी बन गया। हमारा हंसता-खेलता परिवार पूरी तरह बिखर चुका है।" एक साल बाद भी इस परिसर की खामोशी उस अधूरे पुनर्मिलन की गवाही दे रही है, जहां एक बेटा अपने माता-पिता का स्वागत करने का इंतजार ही करता रह गया।

 

 


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News Editor

Radhika

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