गलवान घाटी: शहीद कर्नल संतोष बाबू ने शहादत से पहले चीनी सैनिकों को सिखाया सबक, घायल होने पर भी डटे र

2021-06-15T12:35:13.487

नेशनल डेस्कः लद्दाख की गलवान घाटी को एक साल हो गया है। साल 2020 में 15 जून को भारत-चीन की सेनाएं आमने-सामने आ गई थीं। भारत-चीन सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प में 20 भारतीय जवान शहीद हुए थे तो वहीं चीन के भी कई सैनिक मारे गए थे हालांकि उसने यह स्वीकार नहीं किया था। 15 जून को गलवान घाटी में शहीद हुए कर्नल संतोष बाबू ने बड़ी बहादुरी से चीनी सैनिकों का सामना किया था। वे ही भारतीय जवानों का नेतृत्व कर रहे थे। कर्नल ने चीनी सैनिकों को समझाने की कोशिश की कि जो टेंट उन्होंने लगाए हैं वो भारत की जमीन पर हैं इसलिए इन्हें हटाया जाए लेकिन चीन ने शायद कर्नल के विनम्र स्वाभाव को कमजोरी समझने की भूल कर दी। कर्नल ने अपनी टीम को टैंट उखाड़कर फेंक देने का आदेश दे दिया। इस पर चीनी सैनिक इतने नीचे स्तर पर गिर गए कि उन्होंने पत्थरबाजी करनी शुरू कर दी। इस हमले से कर्नल संतोष काफी घायल हो गए थे लेकिन वे पीछे नहीं हटे और चीनी सैनिकों के सामने डटे रहे।

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हटाने के बाद चीन ने फिर लगाए टेंट
गलवान नदी के किनारे बना चीन का एक निगरानी पोस्ट भारत की सीमा में था, जिसे हटाने को लेकर चीन की सेना के साथ समझौता भी हो गया था। बातचीत के बाद चीन ने अपने पोस्ट हटा भी लिए थे लेकिन 14 जून को चीनी सैनिकों ने फिर से अपनी पोस्ट वहां खड़ी कर दी। 15 जून शाम को कर्नल संतोष बाबू ने तय किया कि वे अपनी टीम के साथ उस कैंप के पास जाएंगे और चीनी सैनिकों से बात करेंगे कि जब टेंट हटा लिए गए थे फिर दोबारा क्यों लगाए गए।  16 बिहार रेजिमेंट में इसको लेकर गरमागर्मी का माहौल था कि चीन ने ऐसी हिमाकत कैसे की। यूनिट के युवा सिपाही नाराज भी थे और वे खुद चीन के उस विवादित पोस्ट को उखाड़ फेंकना चाहते थे लेकिन कर्नल संतोष शांति से बात करना चाहते थे। 

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35 जवानों के साथ कैंप पर गए कर्नल संतोष
15 जून को शाम करीब 7 बजे कर्नल संतोष 35 जवानों के साथ उस कैंप तक गए जहां चीनी डेरा डाले बैठे थे। कर्नल अपने सैनिकों के साथ जब कैंप के पास पहुंचे तो उन्हें महसूस हुआ कि चीनी सैनिकों के हावभाव कुछ बदले से हैं। साथ ही वो चीनी सैनिक वहां मौजूद नहीं थे जिनकी ड्यूटी अक्सर वहां होती है। कर्नल बाबू ने अभी इतना पूछा ही था कि आप लोगों ने टैंट यहां फिर से क्यों गाड़ दिए कि इतने में एक चीनी सैनिक सामने आया और उसने कर्नल संतोष को धक्का दे दिया। इतना ही नहीं चीनी सैनिकों ने चीनी भाषा में अपमानजनक शब्दों का भी प्रयोग किया।

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सैनिकों में हुई धक्का-मुक्की
कर्नल बाबू को धक्का देने पर भारतीय सैनिक भड़क गए और भारतीय जवान चीनी सैनिकों पर टूट पड़े। दोनों तरफ से सैनिकों के बीच मुक्के और घूंसे चले लेकिन किसी तरह के हथियार का इस्तेमाल नहीं हुआ। यह धक्का-मुक्की करीब 30 मिनट तक चली और दोनों तरफ से सैनिकों को चोटें भी लगीं। इस दौरान भारतीय जवान चीन पर ज्यादा भारी पड़ी। भारतीय जवानों ने चीन के लगाए गए टैंट को उखाड़ दिया। कर्नल संतोष समझ गए थे कि ये नए चीनी सैनिक किसी ओर इरादे से यहां तैनात किए गए हैं। उन्होंने घायल भारतीय जवानों को वापिस पोस्ट पर भेज दिया और कहा कि ज्यादा जवानों को यहां भेजा जाए। कर्नल बाबू और उनकी टीम ने कुछ चीनी सैनिकों को हाथपाई में पकड़ लिया और LAC के पार चीनी सीमा की ओर ले गए। कर्नल बाबू चाहते थे कि वे इन चीनी सैनिकों को उनके ऑफिसर्स को सौंप कर पूछे कि आखिर चल क्या रहा है। साथ ही आशंका था कि दूसरी तरफ भी ऐसे ही नए चीनी चैनिक और भी होंगे जो हमले की फिराक में हों तो उनकी संख्या पता चल जाएगी।

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घात लगाए बैठे थे चीनी सैनिक
कर्नल बाबू का अंदेशा सही साबित हुआ, वहां कुछ चीनी सैनिक घात लगाए बैठे थे कि अंधेरा हो और वो भारतीय सैनिकों पर हमला कर दें। जैसे ही भारतीय सैनिक पकड़े गए चीनी सैनिकों को लेकर वहां पहुंचे उनपर बड़े-बड़े पत्थर बरसने लगे। रात करीब 9 बजे कर्नल बाबू के सिर से एक बड़ा पत्थर टकराया और वे गलवान नदी में गिर गए। इसके बाद 45 मिनट तक भारत और चीनी सैनिकों के बीच टकराव चला। सैनिक ग्रुपों में लड़ रहे थे। इस दौरान कई जवान गलवान नदी में गिरे, इसमें भारत के कमांडिंग ऑफिसर भी शामिल थे। चीनियों ने हमले में कील लगे रॉड और डंडों का इस्तेमाल किया। रात 11 बजे तक सबकुछ शांत हुआ तो दोनों देश की सेनाओं ने नदी में गिरे अपने घायल जवानों को उठाया और उन्हें इलाज के लिए भेजा। 

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एक बार फिर गुत्थमगुत्थी हुए जवान
कर्नल संतोष की शहादत पर जवान आक्रोश में थे। रात 11 बजे एक बार फिर से भारतीय जवान चीनियों से भिड़ गए। इस बार लड़ाई चीन की सीमा के अंदर लड़ी गई। इस बार भी कई सैनिक नदी में गिर गए। यह लड़ाई आधी रात तक चलती रही और आखिर में फिर हालात सामान्य हुए। भारत और चीन के स्वास्थ्यकर्मी भी घटनास्थल पर पहुंचे और घायल जवानों को तुरंत इलाज के लिए भेजा गया। अंधेरे में ही जो सैनिक इधर आए थे उनको चीन को सौंपा गया और चीन ने दो दिन बाद 10 जवानों को भारत को सौंपा था।


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Content Writer

Seema Sharma

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