NALSAR विवाद में BCI का यू-टर्न, कुछ घंटों में बदला फैसला,अब 2026 बैच के छात्र बन सकेंगे वकील
punjabkesari.in Thursday, Aug 13, 2026 - 10:43 PM (IST)
नई दिल्ली/हैदराबाद: बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने एक बड़ा कदम उठाते हुए नालसार (NALSAR) यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के 2026 बैच के ग्रेजुएट छात्रों के वकालत पंजीकरण (Enrolment) पर रोक लगाने के अपने फैसले को वापस ले लिया है। बीसीआई ने पहले यह प्रतिबंध इसलिए लगाया था क्योंकि छात्र दीक्षांत समारोह में देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किए जाने का विरोध कर रहे थे। लेकिन इस फैसले के बाद शुरू हुई तीखी आलोचना और सोशल मीडिया पर बढ़े विरोध को देखते हुए परिषद को महज कुछ ही घंटों के भीतर अपना फैसला बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा।
बीसीआई ने कहा - 'मासूम छात्रों का नुकसान नहीं होने देंगे'
एक आपातकालीन बैठक के बाद जारी नए पत्र में बीसीआई ने स्पष्ट किया कि 2026 बैच के सभी छात्र अपनी पसंद के किसी भी स्टेट बार काउंसिल में पंजीकरण कराने के पूरी तरह हकदार होंगे। परिषद का मानना है कि नालसार के अधिकांश छात्र निर्दोष हैं और वे सीजेआई के अनादर की इस मुहिम का हिस्सा नहीं बनना चाहते थे। बीसीआई ने यह भी दावा किया है कि कुछ "शिक्षकों और बाहरी तत्वों" ने भोले-भाले छात्रों को उकसाने का काम किया है। हालांकि, परिषद ने इस मामले को पूरी तरह बंद नहीं किया है और कुलपति (VC) से जांच रिपोर्ट मिलने के बाद ही आगे की कार्रवाई पर फैसला लिया जाएगा।
क्यों विरोध कर रहे हैं कानून के छात्र?
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब नालसार यूनिवर्सिटी के 450 से अधिक छात्रों ने सीजेआई सूर्यकांत को दीक्षांत समारोह का मुख्य अतिथि बनाए जाने के खिलाफ कुलपति, रजिस्ट्रार और प्रोफेसरों को एक हस्ताक्षरित पत्र लिखा। छात्रों ने सीजेआई के हालिया अदालती आचरण पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
छात्रों के अनुसार, जंतर-मंतर से संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस बर्बरता के मामले की सुनवाई (23 जुलाई) करते हुए सीजेआई ने वीडियो सबूत देखने से यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि "हमें वीडियो में कोई दिलचस्पी नहीं है; हमारे पास देखने का समय नहीं है"। इसके अलावा, छात्रों ने सीजेआई द्वारा भारतीय युवाओं की तुलना कथित तौर पर 'कॉकरोच' से करने और छात्रों के प्रति असंवेदनशील रवैया अपनाने पर भी गहरी आपत्ति जताई है। छात्रों का तर्क है कि ऐसे गरिमामयी अवसर पर उनके हाथों से डिग्री लेना विश्वविद्यालय के संवैधानिक मूल्यों और सिद्धांतों के खिलाफ होगा।
