GPS और बैंकिंग सेवाएं जोखिम में... AI साइबर हमलों से सैटेलाइट सिस्टम पर मंडराया खतरा
punjabkesari.in Saturday, Mar 21, 2026 - 07:07 PM (IST)
नेशनल डेस्क : दुनिया भर में जीपीएस, मोबाइल नेटवर्क और बैंकिंग सेवाएं जिन सैटेलाइट सिस्टम पर निर्भर हैं, वे अब एक नए तरह के खतरे का सामना कर रहे हैं। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि आने वाले 2 सालों के भीतर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित साइबर हमले अंतरिक्ष ढांचे को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं, जिससे वैश्विक स्तर पर बड़ी बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं।
एआई ने बदले साइबर हमलों के तरीके
तकनीकी जानकारों के अनुसार, अब साइबर अपराधी उन्नत ‘एजेंटिक एआई’ का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह तकनीक स्वतः निर्णय लेने और सिस्टम की कमजोरियों को तुरंत पहचानने में सक्षम है। यही कारण है कि सैटेलाइट नेटवर्क, जो पहले से ही जटिल और संवेदनशील हैं, अब पहले से ज्यादा जोखिम में आ गए हैं।
अंतरिक्ष सिस्टम पर बढ़ता खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि जैसे-जैसे सैटेलाइट और ग्राउंड सिस्टम आपस में अधिक कनेक्टेड हो रहे हैं, उनकी सुरक्षा चुनौतीपूर्ण होती जा रही है। हैकर्स अब सिग्नल ट्रांसमिशन और सॉफ्टवेयर सिस्टम को निशाना बनाकर सैटेलाइट नियंत्रण हासिल करने की कोशिश कर सकते हैं।
संभावित नुकसान बेहद गंभीर
अगर किसी हमले के जरिए सैटेलाइट्स का नियंत्रण बिगड़ता है, तो इससे नेविगेशन, मौसम पूर्वानुमान और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसी सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं। इसके अलावा, सैटेलाइट्स के आपस में टकराने की स्थिति में अंतरिक्ष में मलबे का खतरा भी बढ़ सकता है, जिससे पृथ्वी की कक्षा पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है।
पुराने सिस्टम बन रहे कमजोर कड़ी
विशेषज्ञों के मुताबिक, कई मौजूदा सैटेलाइट ऐसे समय में बनाए गए थे, जब एआई आधारित खतरों की कल्पना भी नहीं की गई थी। इनमें आधुनिक एन्क्रिप्शन और सुरक्षा अपडेट की सीमित क्षमता है, जिससे ये नई तकनीकों के सामने कमजोर साबित हो रहे हैं।
सुरक्षा के लिए बढ़ाए जा रहे कदम
दुनिया की प्रमुख अंतरिक्ष एजेंसियां अब एआई आधारित सुरक्षा प्रणालियों के विकास पर जोर दे रही हैं। साथ ही, यह भी माना जा रहा है कि भविष्य में साइबर हमलों को पूरी तरह रोकना संभव नहीं होगा, इसलिए मजबूत रिकवरी सिस्टम तैयार करना जरूरी है।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरिक्ष एक साझा क्षेत्र है, लेकिन साइबर सुरक्षा को लेकर वैश्विक स्तर पर एकरूपता नहीं है। ऐसे में अलग-अलग देशों के बीच बेहतर तालमेल और साझा रणनीति बनाना बेहद जरूरी हो गया है।
