10-मिनट डिलीवरी पर ब्रेक! भारी संकट में Zepto और Blinkit, क्या बंद होगा सुपरफास्ट मॉडल?
punjabkesari.in Friday, Jan 09, 2026 - 10:56 AM (IST)
नेशनल डेस्क: भारत में तेजी से बढ़ रहा क्विक कॉमर्स सेक्टर इन दिनों गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। नए साल की पूर्व संध्या पर अचानक हुई राष्ट्रव्यापी हड़ताल में 2 लाख से अधिक गिग वर्कर्स ने भोजन, किराना और अन्य आवश्यक वस्तुओं की डिलीवरी करने से इनकार कर दिया। इस हड़ताल ने न सिर्फ प्लेटफॉर्म्स के ऑपरेशंस को झटका दिया, बल्कि 10 मिनट डिलीवरी जैसे आक्रामक बिजनेस मॉडल की सामाजिक और आर्थिक कीमत पर भी सवाल खड़े कर दिए।
10 मिनट डिलीवरी पर बुनियादी सवाल
हड़ताल का नेतृत्व करने वाले संगठनों का कहना है कि सिर्फ वेतन या बीमा जैसे मुद्दों से समस्या का समाधान नहीं होगा। उनकी प्रमुख मांग है कि 10 मिनट डिलीवरी के दबाव को पूरी तरह खत्म किया जाए। उनका तर्क है कि अल्ट्रा-फास्ट डिलीवरी गिग वर्कर्स को जोखिम भरी ड्राइविंग के लिए मजबूर करती है, जिससे सड़क हादसों और स्वास्थ्य जोखिमों की आशंका बढ़ जाती है।
महामारी में बदली आदतों से उभरा क्विक कॉमर्स
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में आधे घंटे से कम समय में डिलीवरी की आदत कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान विकसित हुई, खासकर रोजमर्रा के इस्तेमाल की वस्तुओं के लिए। अमेरिका में फ्रिज नो मोर, बायक, जोकर और गेटिर जैसी क्विक कॉमर्स कंपनियां मांग घटने के बाद बंद हो गईं, लेकिन भारत में यह सेक्टर और आक्रामक होता गया। यहां कंपनियों ने डिलीवरी समय घटाने के साथ-साथ प्रोडक्ट कैटेगरी को भी तेजी से बढ़ाया किराने से लेकर दवाइयों और घरेलू सामान तक।
2030 तक तीन गुना होंगे डार्क स्टोर्स
ब्लिंकइट, स्विगी इंस्टामार्ट और जेप्टो जैसे प्लेटफॉर्म्स ने तथाकथित “डार्क स्टोर्स” में भारी निवेश किया है। ये छोटे, रणनीतिक रूप से स्थित गोदाम होते हैं, जो तेजी से ऑर्डर पूरा करने में मदद करते हैं। रियल एस्टेट कंसल्टेंट सैविल्स पीएलसी का अनुमान है कि 2030 तक भारत में डार्क स्टोर्स की संख्या 2,500 से बढ़कर 7,500 हो सकती है। छोटे शहरों में भी 10 मिनट डिलीवरी की मांग तेजी से बढ़ रही है। मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाले पारंपरिक रिटेल प्लेयर्स के साथ-साथ अमेजन और वॉलमार्ट के स्वामित्व वाली फ्लिपकार्ट भी अब इस सेक्टर में आक्रामक निवेश कर रही हैं।
गिग वर्कर्स की हड़ताल से छिड़ी बड़ी बहस
हड़ताल ने इस सुविधा की असली कीमत पर बहस छेड़ दी है। कंपनियों का दावा है कि वे ड्राइवर्स पर समय का दबाव नहीं डालतीं, लेकिन हकीकत में देरी का असर खराब रेटिंग, सुपरवाइजरों की फटकार और आर्थिक जुर्माने के रूप में सामने आता है। इससे राइडर्स को भीड़भाड़ वाली, संकरी और गड्ढों से भरी सड़कों पर तेज और जोखिम भरी ड्राइविंग करनी पड़ती है। नई दिल्ली जैसे शहरों में वायु प्रदूषण भी एक अतिरिक्त खतरा है।
शेयर बाजार में भी दिखा असर
हड़ताल से पहले ही गिग वर्कर्स के लिए नए लेबर कोड्स के तहत बेहतर सोशल सिक्योरिटी की मांगों ने निवेशकों को चिंतित कर दिया था। ब्लूमबर्ग के अनुसार, अक्टूबर के मध्य से स्विगी लिमिटेड और इटरनल लिमिटेड (ज़ोमैटो और ब्लिंकइट की पेरेंट कंपनी) के शेयरों में लगभग 20% की गिरावट आ चुकी है, जबकि निफ्टी 50 लगभग स्थिर रहा। अचानक हुई हड़ताल ने निवेशकों की आशंकाओं को और बढ़ा दिया है।
जोमैटो के फाउंडर दीपिंदर गोयल का पक्ष
इटरनल के सीईओ दीपिंदर गोयल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा कि हड़ताल “कुछ शरारती तत्वों” की वजह से हुई, जो काम करने वाले डिलीवरी पार्टनर्स को बाधित कर रहे थे। उन्होंने दावा किया कि 31 दिसंबर को 75 लाख ऑर्डर्स के साथ ऑर्डर वॉल्यूम ऑल-टाइम हाई पर था और हड़ताल से ऑपरेशंस पर बड़ा असर नहीं पड़ा। गोयल के मुताबिक, 10 मिनट डिलीवरी असुरक्षित ड्राइविंग को बढ़ावा नहीं देती। ब्लिंकइट के राइडर्स औसतन 2 किलोमीटर की दूरी 16 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से तय करते हैं। कंपनी इंश्योरेंस प्रीमियम भी वहन करती है। उनका कहना है कि एक डिलीवरी पार्टनर औसतन प्रति घंटे 102 रुपये कमाता है, जिससे महीने में 26 दिन और 10 घंटे रोज काम करने पर लगभग 21,000 रुपये की शुद्ध आय हो सकती है।
आंकड़ों में ही छिपी है मॉडल की कमजोरी
हालांकि, गोयल के ही आंकड़े इस मॉडल की सीमाओं को उजागर करते हैं। वास्तविकता यह है कि बहुत कम गिग वर्कर्स इतने लंबे समय तक लगातार काम करते हैं। एक साल में ज़ोमैटो के एक डिलीवरी पार्टनर ने औसतन सिर्फ 38 दिन काम किया, और केवल 2.3% वर्कर्स ने 250 दिनों से अधिक काम किया। यदि यह मॉडल वास्तव में टिकाऊ होता, तो अधिक लोग इसे स्थायी आय के स्रोत के रूप में अपनाते।
भारत में लेबर की भरमार, लेकिन स्थिरता की कमी
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में अतिरिक्त श्रम बल की विशाल उपलब्धता के कारण प्लेटफॉर्म्स पर वर्कर्स का लगातार आना-जाना बना रहता है। लाखों गिग वर्कर्स हर साल प्लेटफॉर्म छोड़ते हैं और उतने ही नए जुड़ जाते हैं, जिससे कंपनियों को ड्राइवरों की कमी नहीं होती। अनुमान है कि 2030 तक भारत में गिग इकॉनमी से जुड़े लोगों की संख्या 23.5 मिलियन तक पहुंच जाएगी—जो एक दशक में तीन गुना वृद्धि होगी।
