सबसे पहले कहां पाए गए थे चमगादड़? सामने आया जवाब

punjabkesari.in Tuesday, Oct 27, 2026 - 05:07 PM (IST)

साउथैंपटन : दशकों से वैज्ञानिक इस सवाल पर बहस करते रहे हैं कि चमगादड़ों की उत्पत्ति कहां हुई थी। 'नेचर' पत्रिका में हाल में प्रकाशित एक अध्ययन इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए नए साक्ष्य प्रस्तुत करता है। 'डीएनए' और जीवाश्मों के साथ किए गए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन इस बात का समर्थन करते हैं कि चमगादड़ों की जन्मस्थली संभवत: यूरोप है। अब तक इस सवाल का जवाब तलाशने में एक बड़ी मुश्किल यह रही है कि पक्षियों के विपरीत, चमगादड़ों के जीवाश्मों में उनके विकास की शुरुआती अवस्थाओं के प्रमाण बहुत कम मिलते हैं। पक्षियों के जीवाश्मों का रिकॉर्ड इतना समृद्ध है कि उससे डायनासोर से मुर्गी तक जैसे पक्षियों एवं जानवरों के विकास की कड़ी को समझा जा सकता है, लेकिन जब वैज्ञानिकों को चमगादड़ों के जीवाश्म मिलते हैं, तो वे लगभग पूरी तरह विकसित चमगादड़ों के ही होते हैं।

प्रारंभिक चमगादड़ों के बारे में अब तक क्या पता था 
चमगादड़ उड़ान भरने और हवा में बने रहने के लिए सक्रिय रूप से अपने पंखों का इस्तेमाल करने वाले इकलौते स्तनधारी हैं। पहले किए गए अध्ययनों में अमेरिका, अफ्रीका या एशिया को उनकी संभावित जन्मस्थली बताया गया था। अलग-अलग आंकड़ों और गणना के तरीकों से अलग-अलग नतीजे सामने आए। अब तक मिले चमगादड़ों के सबसे पुराने ज्ञात कंकाल अमेरिका के वायोमिंग में मिले थे। ये करीब 5.2 करोड़ साल पुराने हैं और भूवैज्ञानिक काल के प्रारंभिक इयोसीन युग के हैं। पंखों को सहारा देती इनकी लंबी उंगलियां इस बात का संकेत हैं कि उस समय तक चमगादड़ उड़ने में सक्षम हो चुके थे। हालांकि, सबसे पुराने ज्ञात जीवाश्म जहां मिले हैं, जरूरी नहीं कि वही जगह हो जहां किसी जीव-समूह का विकास पहली बार हुआ हो। फिर भी, ये जीवाश्म शुरुआती चमगादड़ों की शारीरिक बनावट, उनके आपसी विकासवादी संबंधों और उनके भौगोलिक फैलाव को समझने में अहम सुराग देते हैं। अब तक जिस चीज की कमी रही है, वह ऐसे जीवाश्मों की पूरी शृंखला है, जिससे उड़ान न भर पाने वाले पूर्वजों से लेकर उड़ने वाले शुरुआती चमगादड़ों तक के विकास का पता चल सके। अधिकांश चमगादड़ प्रतिध्वनि के सहारे रास्ता खोजते हैं। यह सोनार जैसी एक प्रणाली है, जिसमें वे आवाजें निकालते हैं और उनसे लौटने वाली प्रतिध्वनि के आधार पर दिशा पहचानते तथा भोजन खोजते हैं। चमगादड़ों की उत्पत्ति कहां हुई, इस सवाल के साथ ही वैज्ञानिक इस बात पर भी बहस करते रहे हैं कि उड़ने और प्रतिध्वनि के सहारे रास्ता खोजने की क्षमता का विकास कैसे हुआ। क्या पहले उड़ने की क्षमता विकसित हुई या प्रतिध्वनि के सहारे रास्ता खोजने की? अथवा दोनों क्षमताएं एक साथ विकसित हुईं? जीवाश्म चमगादड़ प्रजाति 'ओनिकोनिक्टेरिस' पर 2008 में किए गए एक अध्ययन से इस विचार को समर्थन मिला कि उड़ने की क्षमता पहले विकसित हुई थी। 

उसके पंखों की बनावट से संकेत मिलता था कि वह उड़ सकता था, जबकि उसके कानों की संरचना से पता चलता था कि वह प्रतिध्वनि के सहारे रास्ता नहीं खोज सकता था। हालांकि, 2010 में किए गए एक अध्ययन में ओनिकोनिक्टेरिस की शारीरिक बनावट की तुलना आज जीवित चमगादड़ों से की गई और इस निष्कर्ष पर सवाल उठाए गए। उड़ने की क्षमता ने चमगादड़ों को नए क्षेत्रों तक पहुंचने में मदद की, जबकि प्रतिध्वनि ने उन्हें अंधेरे में रास्ता खोजने और भोजन तलाशने का तरीका दिया। यदि किसी जीवाश्म को ऐसे उड़ने वाले चमगादड़ का माना जाए, जिसमें प्रतिध्वनि के सहारे रास्ता खोजने की क्षमता नहीं थी, तो उसके विकास के इतिहास की अलग-अलग संभावनाएं हो सकती हैं। हो सकता है कि उसका वंश प्रतिध्वनि की क्षमता विकसित होने से पहले ही बाकी चमगादड़ों से अलग हो गया हो, या यह भी संभव है कि उसके पूर्वजों में यह क्षमता रही हो, लेकिन बाद में खत्म हो गई हो। जीवित चमगादड़ों के डीएनए से मिले साक्ष्यों को जीवाश्मों की शारीरिक बनावट के साथ मिलाने से शोधकर्ताओं को यह पता लगाने में मदद मिलती है कि वह जीव अपने विकासवादी संबंधियों के बीच कहां आता है और इन संभावनाओं में से कौन-सी सही हो सकती है। यहां तक कि अगर किसी जीवाश्म में उड़ने और प्रतिध्वनि के सहारे रास्ता खोजने, दोनों क्षमताओं के प्रमाण मिलें, तब भी केवल उसके आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि इनमें से कौन-सी क्षमता पहले विकसित हुई या दोनों का विकास एक साथ हुआ।

नए अध्ययन से क्या बदला?
हालिया अध्ययन बैट1के नाम की अंतरराष्ट्रीय परियोजना के लिए एक अहम उपलब्धि है। इस परियोजना का लक्ष्य आज जीवित चमगादड़ों की सभी प्रजातियों के उच्च गुणवत्ता वाले जीनोम तैयार करना है। जीनोम किसी जीव में मौजूद आनुवंशिक निर्देशों का पूरा संग्रह होता है। जीवाश्मों से मिले आंकड़ों के आधार पर जीनोम की तुलना करने से शोधकर्ताओं को साझा पूर्वजों के बारे में कहीं अधिक सुराग मिलते हैं। इससे पहले के अध्ययनों में केवल कुछ जीन के आधार पर विश्लेषण किया जाता था। इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने चमगादड़ों की 103 प्रजातियों के जीनोम का विश्लेषण किया। इनमें आज जीवित चमगादड़ों के सभी 21 प्रजातियों का प्रतिनिधित्व था। अध्ययन में 65 प्रजातियों की शारीरिक बनावट से जुड़ी जानकारी भी जुटाई गई, जिनमें 44 विलुप्त प्रजातियां शामिल थीं। वैज्ञानिक इससे पहले भी आणविक साक्ष्यों और जीवाश्मों से मिली जानकारी को एक साथ रखकर अध्ययन कर चुके हैं, लेकिन यह अध्ययन साक्ष्यों के व्यापक दायरे, जीनोम की गुणवत्ता और इस पड़ताल के कारण अलग है कि डीएनए के अलग-अलग हिस्से कभी-कभी चमगादड़ों के समूहों के आपसी संबंधों के बारे में अलग-अलग संकेत क्यों देते हैं। नए विश्लेषण के मुताबिक, चमगादड़ों की उत्पत्ति 5.6 करोड़ साल से भी पहले, भूवैज्ञानिक काल के अंतिम पैलियोसीन युग में यूरोप में हुई थी। इस अध्ययन में तैयार किए गए विकासक्रम के अनुसार, उनके वंशज पहले अफ्रीका पहुंचे। इसके बाद चमगादड़ों के प्रमुख समूहों में विविधता बढ़ने के साथ वे दूसरे महाद्वीपों में भी फैलते गए। यह निष्कर्ष चमगादड़ों के विकासवादी वंश-वृक्ष, जीवाश्मों और ऐसे गणितीय मॉडलों के आधार पर निकाला गया है, जिनमें महाद्वीपों की गति और जीवों के एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में फैलने की प्रक्रिया को शामिल किया गया। इस विश्लेषण में यूरोप को चमगादड़ों की उत्पत्ति का स्थान मानने के पक्ष में मजबूत साक्ष्य मिले।


 


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News Editor

Rahul Singh

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