रेत माफिया, भ्रष्टाचार और पत्रकारों की लड़ाई, ‘रिपोर्टिंग लाइव’ की कास्ट ने खोले फिल्म से जुड़े राज

punjabkesari.in Thursday, Oct 22, 2026 - 12:45 PM (IST)

नई दिल्ली/ टीम डिजिटल। अवैध रेत खनन... एक ऐसा कारोबार, जिसके पीछे करोड़ों रुपये का खेल चलता है। इस खेल में शामिल होते हैं माफिया, बड़े बिजनेसमैन, राजनेता और भ्रष्ट व्यवस्था से जुड़े लोग। इसी मुद्दे पर आधारित फिल्म रिपोर्टिंग लाइव नेटफ्लिक्स पर रिलीज हो चुकी है। फिल्म का निर्देशन ध्रुव त्रिपाठी ने किया है। परिणीति चोपड़ा स्टारर इस क्राइम थ्रिलर में देवेन भोजानी, आदिल हुसैन और आमोल पारेकर अहम भूमिकाओं में हैं। फिल्म के बारे में कास्ट ने पंजाब केसरी, नवोदय टाइम्स, जगबाणी और हिंद समाचार से खास बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश...   

ध्रुव त्रिपाठी 

सवाल: फिल्म पत्रकारिता का एक ऐसा पक्ष दिखाती है, जो आमतौर पर मुख्यधारा की कहानियों में नजर नहीं आता। कहानी की शुरुआत कैसे हुई?
इस कहानी का सफर करीब सात साल पहले शुरू हुआ था। मेरे सह-लेखक मेहदी जाधव के साथ मैं एक दूसरे प्रोजेक्ट पर काम कर रहा था। उसी दौरान उन्होंने रेत चोरी और रेत माफिया के बारे में बताया। यह जानने के बाद मेरे मन में इस दुनिया को समझने की उत्सुकता पैदा हुई। मैंने घर जाकर इस विषय पर रिसर्च शुरू की और पूरी रात सो नहीं पाया। मुझे लगा कि इसके भीतर एक बड़ी और अनकही दुनिया है, जिस पर कहानी बनाई जा सकती है। इसके बाद हमने इस विषय पर काम शुरू किया। रिसर्च के दौरान पता चला कि रेत माफिया के खिलाफ आवाज उठाने वाले कई पत्रकारों, पुलिसकर्मियों और अधिकारियों को धमकियों का सामना करना पड़ा है। कुछ लोगों ने इसकी कीमत अपनी जान देकर भी चुकाई। हमें लगा कि इन लोगों की कहानियां सामने आनी चाहिए। इसी सोच के साथ हमने एक रिपोर्टर और कैमरामैन के नजरिए से फिल्म की कहानी तैयार की। हमने करीब दो साल तक रिसर्च की, पत्रकारों और अधिकारियों से बात की और फिर इस दुनिया से प्रेरित एक काल्पनिक कहानी बनाई।

सवाल: आप फिल्म की कास्टिंग प्रक्रिया में कितने शामिल थे कलाकारों का चुनाव कैसे किया गया?
कास्टिंग इस फिल्म का बहुत अहम हिस्सा थी। जब हमने स्क्रिप्ट लिखी थी, तभी हमारी मुलाकात कास्टिंग डायरेक्टर संजीव मौर्य से हुई थी। उस समय न कोई निर्माता जुड़ा था और न ही कोई स्टूडियो। संजीव ने स्क्रिप्ट पढ़ने के बाद कहा था कि यह इतनी अच्छी कहानी है कि इसमें नए कलाकारों को लेकर भी फिल्म बनाई जा सकती है। उन्हें कहानी पर बहुत भरोसा था। इसके बाद हमने साथ मिलकर कास्टिंग पर काम किया। हमने सिर्फ मुख्य किरदारों के लिए ही नहीं, बल्कि एक छोटे से दृश्य में नजर आने वाले कलाकारों के चुनाव पर भी ध्यान दिया। हमने परिणीति और देवेनजी सहित कई कलाकारों से संपर्क किया। इसके अलावा आदिल साहब, अमोल साहब, शेखर साहब, नासिर साहब, समीर कोचर, प्राचीशा, गीता अग्रवाल और दूसरे कलाकारों को भी कहानी से जोड़ा गया।

देवेन भोजानी 

सवाल: एक पत्रकार और कैमरामैन की दुनिया का हिस्सा बनकर आपने क्या समझा?
सच कहूं तो पहले मैं अखबार ज्यादा नहीं पढ़ता था और न ही पत्रकारिता की दुनिया को इतनी गहराई से समझता था। इस फिल्म ने मुझे इस दुनिया को करीब से देखने का मौका दिया। मेरा किरदार सिर्फ एक कैमरामैन का नहीं, बल्कि वीडियो जर्नलिस्ट का है। वह रिपोर्टर के साथ मैदान में जाता है और खबर को सामने लाने में अहम भूमिका निभाता है। कहानी में रेत माफिया और अवैध खनन जैसे गंभीर मुद्दे हैं। जैसे-जैसे मेरा किरदार इस मामले की तह तक पहुंचता है, उसके और उसके परिवार के लिए खतरे बढ़ने लगते हैं। इस किरदार में कई परतें हैं। इसमें काम का दबाव, रिश्ते, डर और मुश्किल परिस्थितियों के बीच सही फैसला लेने की चुनौती शामिल है।

सवाल: आपको अक्सर कॉमिक रोल में देखा है आप मानते है कॉमेडी करने वाले कलाकार गंभीर भूमिकाओं में भी कमाल कर सकते हैं?
बिल्कुल। मैंने भी अपने करियर में कई कॉमिक किरदार निभाए हैं और मुझे उन पर गर्व है। लेकिन मैं हमेशा अलग-अलग तरह की भूमिकाएं करना चाहता था। पहले मुझे ऐसे मौके कम मिलते थे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मुझे विविध किरदार निभाने का अवसर मिला है।

ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने कलाकारों को अपनी प्रतिभा के अलग-अलग पहलू दिखाने का मौका दिया है। मैंने भी टेलीविजन से कुछ समय का ब्रेक लेकर खुद को नए किरदारों में तलाशने की कोशिश की। सतीश कौशिक जी जैसे कलाकारों ने कॉमेडी के साथ गंभीर भूमिकाओं में भी अपनी प्रतिभा साबित की। हाल के समय में राकेश बेदी जैसे कलाकारों को भी अलग तरह के किरदारों में देखा गया है। ऐसे उदाहरण बताते हैं कि किसी कलाकार को सिर्फ एक तरह की भूमिका तक सीमित नहीं करना चाहिए।

आदिल हुसैन

सवाल: फिल्म में पत्रकारिता की दुनिया को दिखाया गया है। आपके हिसाब से एक पत्रकार के काम के फायदे और नुकसान क्या हैं?
पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। इसका काम सिर्फ राजनीति या घटनाओं की रिपोर्टिंग करना नहीं है, बल्कि गलत कामों और सत्ता के अनुचित प्रभाव पर सवाल उठाना भी है। अगर कोई व्यक्ति अपना काम ईमानदारी से नहीं करता, तो उसका असर समाज पर पड़ता है। यही बात पत्रकारिता पर भी लागू होती है। अगर पत्रकार अपना काम ठीक से नहीं करेंगे, सच्चाई सामने नहीं लाएंगे और जवाबदेही तय करने के लिए सवाल नहीं पूछेंगे, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होने लगेगी।

पत्रकारिता का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसके जरिए लोगों तक अपनी बात पहुंचाई जा सकती है। पत्रकार समाज को जागरूक कर सकता है और लोगों को सच्चाई से परिचित करा सकता है। लेकिन इस जिम्मेदारी के साथ चुनौतियां भी आती हैं। अगर कोई व्यक्ति पत्रकार होने का दावा करता है, लेकिन अपना काम ईमानदारी से नहीं करता, तो यह निराशाजनक है।

सवाल: क्या सोशल मीडिया फॉलोअर्स की संख्या कलाकारों के काम और कास्टिंग को प्रभावित करती है?
सोशल मीडिया पर फॉलोअर्स की संख्या को लेकर आजकल बहुत चर्चा होती है। कई बार मुझे ऐसे संदेश भी मिलते हैं, जिनमें पैसे देकर फॉलोअर्स बढ़ाने की बात कही जाती है। लेकिन मुझे सिर्फ फॉलोअर्स की संख्या से ज्यादा उन लोगों की परवाह है, जिन्हें मेरा काम पसंद आता है।
मेरे हिसाब से सोशल मीडिया पर फॉलोअर्स होना और उन लोगों का किसी फिल्म को देखने के लिए सिनेमाघर तक पहुंचना दो अलग बातें हैं। फॉलोअर्स की संख्या हमेशा दर्शकों की संख्या में नहीं बदलती। इसलिए सिर्फ सोशल मीडिया पर लोकप्रियता देखकर कलाकारों को फिल्म में लेना सही तरीका नहीं है। मैं सोशल मीडिया पर बहुत ज्यादा सक्रिय नहीं रहता। जब निर्माता कुछ पोस्ट करने के लिए कहते हैं और मुझे वह ठीक लगता है, तो मैं पोस्ट कर देता हूं। लेकिन मेरे लिए फॉलोअर्स बढ़ाना कोई लक्ष्य नहीं है।


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Content Editor

Mansi

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