Interview: फिल्म सिर्फ आतंकवादी हमले की नहीं, संकट के बीच जारी जिंदगी की कहानी है- गिरिजा ओक

punjabkesari.in Sunday, Jun 14, 2026 - 01:14 PM (IST)

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। 12 जून को सिनेमाघरों में रिलीज हुई फिल्म भारत भाग्य विधाता सच्ची घटना पर आधारित है। फिल्म में कंगना रनौत,  गिरिजा ओक, स्मिता तांबे और ईशा डे मुख्य भूमिका में नजर आ रहे हैं। फिल्म की कहानी 2008 के मुंबई हमलों के दौरान एक अस्पताल में फंसी उन नर्सों और अस्पताल के कर्मचारियों पर केंद्रित है जो अपनी जान की परवाह किए बिना पूरे साहस के साथ मरीजों की जान बचाती हैं। फिल्म को  मनोज तापड़िया ने डायरेक्ट किया है और इसकी निर्माता कंगना रनौत हैं। फिल्म के बारे में गिरिजा ओक गोडबोले , स्मिता तांबे और ईशा डे ने पंजाब केसरी, नवोदय टाइम्स, जगबाणी और हिंद समाचार से खास बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश...


गिरिजा ओक

सवाल: जब आपने पहली बार स्क्रिप्ट पढ़ी तो आपका क्या रिएक्शन था? क्या आप पहले से इस घटना के बारे में जानते थे?

गिरिजा ओक: कामा अस्पताल के बारे में हमने अखबारों और कुछ प्रकाशनों में थोड़ा-बहुत पढ़ा था। लेकिन यह खबर हमेशा दो-चार लाइनों में ही सिमटकर रह गई। मुझे नहीं लगता कि इसके पीछे कोई खास वजह थी, बस यह कहानी लोगों तक उतनी नहीं पहुंची। जिन जगहों पर ज्यादा जानें गईं, जहां ज्यादा गोलीबारी हुई, उनका रिपोर्टेज भी ज्यादा हुआ। कामा अस्पताल में मौतें कम हुईं, लेकिन जानें ज्यादा बचाई गईं। हम अक्सर कहते हैं कि बाकी जगहों पर ‘डेथ टोल’ ज्यादा था, जबकि यहां ‘सेव टोल’ ज्यादा था। शायद इसी वजह से यह कहानी भीड़ में कहीं खो गई। मुझे भी उस रात कामा अस्पताल के अंदर क्या हुआ था, इसकी कोई जानकारी नहीं थी। मैंने भी सिर्फ दो-तीन लाइनों में इसके बारे में पढ़ा था।

स्क्रिप्ट पढ़ने के बाद मुझे एहसास हुआ कि उस अस्पताल के भीतर कितना कुछ घटा था। लेकिन मुझे लगता है कि फिल्म का सबसे बड़ा फोकस सिर्फ आतंकवादी हमला नहीं है, बल्कि उस हमले के बावजूद अस्पताल के भीतर चल रही जिंदगी है। वहां डिलीवरी हो रही थीं, मरीजों का इलाज चल रहा था, लोगों को सुरक्षित छिपाया जा रहा था। यह एक बेहद महत्वपूर्ण कहानी है, जिसे लोगों के सामने आना ही चाहिए था।

सवाल: इतने गंभीर और भावनात्मक किरदार निभाने के बाद घर लौटकर फिर से मां और गृहिणी बनना कितना मुश्किल होता है?

गिरिजा ओक: मुझे लगता है कि मैंने आज तक जितने भी किरदार निभाए हैं, उनमें से हर किरदार का थोड़ा-थोड़ा हिस्सा मेरे भीतर रह गया है। मैंने भी हर किरदार में अपना कुछ हिस्सा छोड़ा है। इसलिए वे हमेशा मेरे साथ रहते हैं। लेकिन जब आप सेट से बाहर निकलते हैं तो आपको बहुत जल्दी अपनी असली जिंदगी में लौटना पड़ता है। दुनिया आपके मूड या किरदार के हिसाब से नहीं चल सकती। मेरा बेटा है, और उसकी उम्मीद होती है कि जब मैं घर आऊं तो उसे उसकी मां मिले। कभी-कभी ऐसा होता है कि किसी किरदार या सीन का असर कुछ समय तक रहता है, लेकिन मैं खुद को थोड़ा वक्त देकर फिर अपने परिवार और अपनी जिंदगी में लौट आती हूं। पिछले बीस-बाइस सालों से मैं यह काम कर रही हूं, इसलिए अब यह प्रक्रिया सहज हो गई है। आज जब मैं सेट से बाहर निकलती हूं तो मेरा 80-90 प्रतिशत किरदार वहीं रह जाता है। जो थोड़ा बहुत मेरे भीतर रहता है, वह शायद जीवनभर रहेगा।

सवाल: ईशा और स्मिता, क्या आप भी इस घटना के बारे में सिर्फ संक्षेप में जानती थीं?

ईशा डे: हां, मुझे भी इसके बारे में सिर्फ संक्षेप में ही जानकारी थी। 26/11 हम सभी के दिलों में एक बहुत दर्दनाक और अंधेरी याद की तरह मौजूद है। लेकिन यह फिल्म उसी अंधेरी रात के भीतर उम्मीद की एक किरण दिखाती है। जैसा गिरिजा ने कहा, हमने भी इस घटना के बारे में सिर्फ दो-तीन लाइनों में ही सुना था। लेकिन जो काम उस रात अस्पताल के स्टाफ ने किया, वह सचमुच प्रशंसनीय है। यह फिल्म उसी साहस और उम्मीद की कहानी है।

सवाल- क्या यह फिल्म आज की पीढ़ी को अपनी तरफ आकर्षित करेगी?
गिरिजा ओक -
मुझे ऐसा लगता है आज का डेट में ओटीटी प्लेटफॉर्म हैं और हम एक बहुत अलग तरह का कंटेंट लेकर आए हैं। इसका जॉनर आ तय नहीं कर पाओगे क्योंकि इसमें कई तरह का मिक्सचर है। तो मुझे लगता है कि इस फिल्म के एस्पेक्ट्स यूथ को पसंद आएंगे और मुझे विश्वास है कि वो देखने भी जरूर आएंगे। मैं यह बी कहूंगी कि ये फिल्म देखकर यूथ में देशभक्ति और डिवोशन की भावना जागेगी। 

सवाल: आतंकवादी हमलों के खिलाफ एक आम नागरिक क्या कर सकता है? इस फिल्म से आपने क्या सीखा?

गिरिजा ओक: फिल्म में दो बहुत महत्वपूर्ण संवाद हैं। पहला यह कि आतंकवादी हमले के समय कौन से प्रोटोकॉल और प्रक्रियाएं काम आती हैं? और दूसरा यह कि आतंकवादियों से इंसानियत की उम्मीद नहीं की जा सकती। आतंकवाद तर्क, संवेदना और समझ से परे की चीज है। इसका कोई उचित कारण नहीं होता। जब किसी चीज की जड़ ही अतार्किक हो, तो उससे तर्क नहीं किया जा सकता। ऐसी घटनाएं कई स्तरों पर हुई विफलताओं का परिणाम होती हैं। लेकिन एक नागरिक के रूप में हम सम्मान, संवेदनशीलता और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी को मजबूत कर सकते हैं। शायद यही हमारी सबसे बड़ी भूमिका है।

सवाल: हाल के दिनों में फिल्म इंडस्ट्री में महिलाओं की ‘ऑब्जेक्टिफिकेशन’ को लेकर काफी चर्चा हुई है। आप इस विषय को कैसे देखती हैं?

गिरिजा ओक: मेरे हिसाब से ‘ब्यूटीफिकेशन’ और ‘ऑब्जेक्टिफिकेशन’ के बीच सबसे बड़ा अंतर यह है कि ब्यूटीफिकेशन मैं चुनती हूं, जबकि ऑब्जेक्टिफिकेशन देखने वाला चुनता है। अगर मैं कोई कपड़ा पहनती हूं, कोई सीन करती हूं या कोई संवाद बोलती हूं, तो वह मेरा निर्णय है और उसकी जिम्मेदारी भी मेरी है। लेकिन कोई व्यक्ति उसे कैसे देखता है या उसका क्या अर्थ निकालता है, उसकी जिम्मेदारी मेरी नहीं हो सकती।

अगर किसी महिला को ऐसा कुछ करने के लिए मजबूर किया जा रहा है जो वह नहीं करना चाहती, तो यह गंभीर सवाल है। क्या उसके पास ‘ना’ कहने की आजादी है? क्या उसे अपने करियर की कीमत पर समझौता करना पड़ता है?

मुझे लगता है कि हमें सिर्फ कलाकारों से सवाल नहीं पूछने चाहिए। हमें उन लोगों से भी सवाल पूछने चाहिए जो यह तय करते हैं कि कौन काम करेगा और कौन नहीं। अगर कोई अभिनेत्री बोल्ड सीन नहीं करना चाहती, तो क्या उसके लिए इंडस्ट्री में जगह है? यही असली चर्चा होनी चाहिए।

सवाल: आखिर में, जब दर्शक ‘भारत भाग्य विधाता’ देखकर सिनेमाघरों से बाहर निकलेंगे, तो आप चाहेंगी कि वे किस भावना के साथ लौटें?

गिरिजा ओक: मैं चाहती हूं कि दर्शक गर्व की भावना के साथ थिएटर से बाहर निकलें। उन्हें यह महसूस हो कि वे भारतीय हैं और इस देश का हिस्सा हैं। हम चाहे कोई भी काम करते हों, किसी भी भूमिका में हों, लेकिन हम सभी मिलकर इस देश का निर्माण करते हैं। जब हम ‘देश’, ‘समाज’ या ‘लोग’ कहते हैं, तो वह हम ही हैं। अगर हम ईमानदारी, सम्मान और प्रेम के साथ अपना काम करते रहें और एक-दूसरे का सम्मान करें, तो सच मायनों में हम सभी ही इस देश के ‘भारत भाग्य विधाता’ हैं।

स्मिता तांबे
सवाल: आपका थिएटर बैकग्राउंड रहा है। क्या इस फिल्म के किरदार की तैयारी में थिएटर ने आपकी मदद की?

स्मिता तांबे: थिएटर जीवन में बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह आपको अनुशासन सिखाता है। थिएटर में किरदार को समझने और उसके साथ समय बिताने का मौका मिलता है। नाटकों की रिहर्सल दरअसल एक लंबी प्रक्रिया होती है, जो कलाकार को गहराई देती है। स्क्रीन पर इतना समय नहीं मिलता। न ही सभी सह-कलाकारों के साथ लंबी रिहर्सल होती है। लेकिन थिएटर से जो अनुभव मिलता है, वह अभिनय के हर पहलू में मदद करता है। हालांकि स्क्रीन और थिएटर का काम करने का तरीका अलग होता है, लेकिन चरित्र निर्माण, अनुशासन और दर्शकों की प्रतिक्रिया को समझने की क्षमता थिएटर से ही आती है। मेरा मानना है कि हर अभिनेता को अपने जीवन में कुछ समय थिएटर जरूर करना चाहिए। मैं आज भी बीच-बीच में थिएटर करती हूं क्योंकि जब मुझे खुद को फिर से तराशने और अपने भीतर के कलाकार को रीफ्रेश करने की जरूरत महसूस होती है, तो मैं थिएटर का सहारा लेती हूं।

सवाल: एक टीम के साथ काम करते हुए कलाकारों के बीच तालमेल बैठाना कितना जरूरी और कितना चुनौतीपूर्ण होता है?

स्मिता तांबे: मेरा बैकग्राउंड स्पोर्ट्स का है। कुछ खेल ऐसे होते हैं जहां खिलाड़ी अकेले खेलता है, लेकिन फिल्म बनाना टीम गेम की तरह होता है। यह खो-खो या कबड्डी जैसा है, जहां पूरी टीम मिलकर एक लक्ष्य तक पहुंचती है। जब आप टीम में काम करते हैं, तो कई बार ऐसी चीजें भी स्वीकार करनी पड़ती हैं जो शायद व्यक्तिगत रूप से आपको पसंद न हों, लेकिन फिल्म के लिए जरूरी हों। वहीं, अगर आपको लगता है कि आपकी कोई बात फिल्म को बेहतर बना सकती है, तो आपको उसे रखना भी चाहिए। सबसे जरूरी चीज डायलॉग है। अगर आप अच्छे तरीके से अपनी बात रखते हैं, तो सामने से भी अच्छा जवाब मिलता है। स्पोर्ट्स ने मुझे टीमवर्क और संवाद का महत्व सिखाया है और यह अनुभव आज भी मेरे काम में बहुत मदद करता है।

सवाल: जब आप इस फिल्म की शूटिंग कर रही थीं, तब आप उन भयावह पलों को दोबारा जी रही थीं। सेट का माहौल कैसा रहता था?

ईशा डे: सेट पर हमारे लिए एक बहुत सुरक्षित माहौल बनाया गया था। पूरा सेट कामा अस्पताल की तरह डिजाइन किया गया था, इसलिए हमें ऐसा महसूस होता था जैसे हम वास्तव में उसी परिस्थिति का हिस्सा हों। उस दिन काम करने वाले सभी मेडिकल प्रोफेशनल्स के लिए हमारे मन में बेहद सम्मान और कृतज्ञता थी। केवल उस रात ही नहीं बल्कि हर दिन मेडिकल प्रोफेशनल्स जो काम करते हैं वह असाधारण है।


गिरिजा ओक: फिल्म में मेरा किरदार लेबर वार्ड से जुड़ा है। जब मैं उन दृश्यों को पढ़ रही थी कि उस रात बीस डिलीवरी हुई थीं, तो मैं सोच भी नहीं पा रही थी कि उस परिस्थिति को उन्होंने कैसे संभाला होगा। एक रात मैं अगले दिन के सीन की तैयारी कर रही थी। तैयारी तो हो चुकी थी कि मुझे क्या करना है, लेकिन एक अभिनेता के तौर पर आप उस भावना को महसूस करना चाहते हैं। मैं स्क्रिप्ट पढ़ते-पढ़ते रोने लगी क्योंकि जो कुछ उन्होंने उस रात किया, वह कल्पना से भी परे है। मैं बहुत आभारी हूं कि मुझे इस फिल्म का हिस्सा बनने और एक नर्स का किरदार निभाने का मौका मिला। मुझे उम्मीद है कि इस फिल्म के बाद नर्सों को वह सम्मान मिलेगा, जिसकी वे सचमुच हकदार हैं।


सवाल: फिल्म के डायलॉग बेहद प्रभावशाली हैं। एक अभिनेता के लिए अच्छी राइटिंग और अच्छे डायलॉग कितने अहम होते हैं?

स्मिता तांबे: बहुत जरूरी। यह पूरी तरह ‘मेक ऑर ब्रेक’ की स्थिति होती है। फिल्म की आत्मा ही उसकी लेखनी होती है। मनोज तिवारी जी ने इस फिल्म को बेहद खूबसूरती से लिखा है। कहानी तो लोगों को पता है, लेकिन उसे एक फिल्म के रूप में इतना रोचक और प्रभावी बनाना बहुत बड़ी बात है।

गिरिजा ओक: मुझे लगता है कि मनोज जी के विज्ञापन जगत के लंबे अनुभव का असर इस फिल्म में साफ दिखाई देता है। विज्ञापन बहुत कम समय में बहुत बड़ा संदेश देने का माध्यम होते हैं। वहां एक लाइन, एक शब्द या एक भाव के भीतर बड़ी भावना समेटनी पड़ती है। इस फिल्म में भी कई ऐसे डायलॉग हैं जो बिल्कुल सही समय पर आते हैं। अगर आप उन्हें अलग से सुनें तो वे शायद बहुत नाटकीय लगें लेकिन फिल्म के संदर्भ में वे बेहद प्रभावी बन जाते हैं। हमने खुद दर्शकों को उन संवादों पर तालियां बजाते और उत्साहित होते देखा है।

सवाल: कंगना रनौत इस फिल्म की निर्माता भी हैं और अहम भूमिका भी निभा रही हैं। एक लीडर और फिल्ममेकर के तौर पर आपने उन्हें कैसा पाया?

स्मिता तांबे: उनमें नेतृत्व के सारे गुण मौजूद हैं। वह अपने विचारों को खुलकर रखने वाली महिला हैं। इसी वजह से उन्होंने अपनी जिंदगी को जितना सरल बनाया है उतना ही चुनौतीपूर्ण भी। लेकिन एक लीडर में यह साहस होना चाहिए। एक निर्माता के रूप में उन्होंने पूरी टीम के लिए बहुत अच्छा माहौल बनाया। एक कलाकार के रूप में भी वह शानदार टीम लीडर हैं। वह सिर्फ अपने काम पर ध्यान नहीं देतीं, बल्कि दूसरे कलाकारों के प्रदर्शन को भी सराहती हैं और फिल्म को बेहतर बनाने के लिए लगातार सुझाव देती रहती हैं।

ईशा डे: मैं उन्हें बेहद बुद्धिमान इंसान मानती हूं। एक बार सेट पर मैं और मनोज सर किसी सीन पर चर्चा कर रहे थे। कंगना वहां आईं और हर नर्स के किरदार की यात्रा और उसकी बारीकियों पर विस्तार से बात करने लगीं। वह हर चीज पर नजर रखती थीं। यह देखना बहुत प्रेरणादायक था।

गिरिजा ओक: मुझे लगता है कि यह फिल्म आज बन पाई है तो उसकी सबसे बड़ी वजह कंगना हैं। मनोज तिवारी ने यह कहानी सात साल पहले लिखी थी लेकिन कागज पर लिखी कहानी को फिल्म बनाने के लिए किसी को उसकी क्षमता पहचाननी पड़ती है। कंगना ने इस कहानी की ताकत को पहचाना। इसके लिए दूरदृष्टि, साहस और समझ की जरूरत होती है। मैं उनके प्रति आभारी हूं कि उन्होंने इस कहानी पर विश्वास किया।

 


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Content Editor

Manisha

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