कंस द्वारा मारी गई देवकी की 6 संतानों से जुड़ा ये किस्सा है अविश्वसनीय!

2020-03-11T17:01:07.87

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ

अगर बात श्री कृष्ण की हो तो धार्मिक ग्रंथों में इनसे जु़ड़े ऐसे कई किस्से मिल जाएंगे जिनसे न केवल मनुष्य उनके बारे में जान सकता है। बल्कि उनके द्वारा की गई तमाम लीलाओं का अनुभव भी कर सकता है। हिंदू धर्म में इनके पैदा होने से लेकर कई इनके अंत तक से संबंधित ऐसी बहुत सी कथाएं वर्णित है। क्योंकि कहा जाता है न केवल इनका जन्म बल्कि इनका पूरा जीवन ही बहुत अद्भुत था। अब आप सोच रहे होंगे हम यकीनन आपको इनसे ही जुड़ा कोई प्रंसग बताने वाले हैं तो बता दें आप पूरी तरहग से गलत नहीं है। दरअसल हम आपको बताने वाले हैं इनके भाईयों के बारे में। जी हां, हम बात कर रहे है देवकी की 6 संतानों के बारे में जिनका वध उनके ही मामा कंस द्वारा अपनी मृत्यु के चलते किया गया था। शास्त्रों में इनके बारे में वर्णन किया गाया है कि आख़िर देवकी की 6 संतानें कौैन थी। आइए जानते हैं इनके बारे में- 


बता दें कंस देवकी के भाई था जिसे अपनी मृत्यु के भय के चलते अपनी ही सगी बहन की संतानों को मारने की कसम खा ली थी। जिस दौरान वो उसकी 6 संतानों को मारने में सफल भी हो गया था। लेकिन आख़िर देवकी की ये संतानों थी कौन जिनका जन्म लेते ही कंस ने वध कर दिया था। दरअसल बात है द्वापर युग की जब मथुरा में कंस का राज था। कहा जाता है कि कंस निरंकुश व पाषाण ह्रदय नरेश था। धार्मिक कथाओं के अनुसार कंस अपनी बहन देवकी से बहुत प्यार करता था। परंतु जब उसे ये पता चला कि उसकी बन की आठवीं संतान उसका वश्र करेगी तो उसने तुंरत ही उसे अपनी बहन कों बंदी बना लिया और एक-एक करके अपनी बहन की संतानों का वध करने लगा। 

धार्मिक शास्त्रों के अनुसार ये थी देवकी की पहली 6 संतानें-


कौन थे वे 6 शिशु
शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मलोक में स्मर, उद्रीथ, परिश्वंग, पतंग, क्षुद्र्मृत व घ्रिणी नाम के 6 देवता हुआ करते थे। जो ब्रह्माजी के कृपा पात्र थे। कथाओं के अनुसार इन पर सदैव ब्रह्मा जी की कृपा और स्नेह दृष्टि बनी रहती थी। इनके द्वारा की गई हर छोटी-मोटी गलती को ब्रह्म जी नज़रंदाज़ कर देते थे। जिस कारण धीरे-धीरे अपने ऊपर घमंड होने लगा। उन्हें लगने लगा कि उनके सामने कोई कुछ नहीं है। इसी दौरान उन्होंने एक दिन ब्रह्मा जी का भी अनादर कर दिया। जिसके चलते ब्रह्मा जी को उन पर क्रोध आ गया इसी क्रोध के आवेश में आकर उन्होंने उन्हें पृथ्वी पर दैत्य वंश में जन्म का श्राप दे दिया। श्राप मिलते ही उनकी भ्रष्ट बुद्धि ठीक हो गई और वो ब्रह्मा जी से क्षमा मांगने लगे। ब्रह्मा जी को उन पर दया आ गई और उन्होंने उन्हें श्राप को कम करते हुए कहा कि अब तुम्हें दैत्य वंश नें जन्म तो लेना ही पड़ेगा पर तुम्हारा पू्र्व ज्ञान बना रहेगा। 

जिसके बाद समयानुसार उन 6 देवताओं ने राक्षसराज हिरण्यकश्यप के घर जन्म लिया। इस दौरान उन्होंने पूर्व जन्म का ज्ञान होने के कारण कोई गलत काम नहीं किया। सारा समय उन्होंने ब्रह्मा जी की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न करने में ही बिताया। जिससे प्रसन्न होकर उन्होंने ब्रह्मा जी ने उन्हें वरदान मांगने को कहा।

उन 6 देवताओं ने दैत्य योनि के प्रभाव से उन्होंने वैसा ही वर मांगा कि हमारी मौत न देवताओं के हाथों हो, न गन्धर्वों के, न ही हम हारी-बीमारी से मरें। उनका ये वरदान सुनते ही ब्रह्माजी तथास्तु कह कर अंतर्ध्यान हो गए। इधर हिरण्यकश्यप अपने पुत्रों से देवताओं की उपासना करने के कारण नाराज़ था। जिसके बाद उसने उन सबको श्राप दे डाला की तुम्हारी मौत देवता या गंधर्व के हाथों नहीं एक दैत्य के हाथों होगी।

कहा जाता है इसी श्राप के चलते उन्होंने देवकी के गर्भ से जन्म लिया और कंस के हाथों मरकर सुतल लोक में जगह पाई थी।

अपनों से बड़ों का सम्मान नहीं करता उसे अपने जीवन में सुख की प्राप्ति नहीं। इसलिए अपने जीवन काल में हमेशा अपनों से बड़ों का आदर करें। इससे आप पर देवी लक्ष्मी की कृपा तो होगी ही साथ ही साथ आपके घर में इनका वास भी होगा।।


Jyoti

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