श्रीकृष्ण ने आखिर क्यों सहन की शिशुपाल की 100 गलतियां, जानिए इसके पीछे की कहानी

punjabkesari.in Monday, Jun 08, 2026 - 01:34 PM (IST)

Shri Krishna Shishupal Story : महाभारत और श्रीकृष्ण की कथाओं में ऐसे कई रहस्य छिपे हैं जो आज भी लोगों को हैरान कर देते हैं। उन्हीं में से एक प्रसंग जुड़ा है चेदि नरेश शिशुपाल से। आपने अक्सर सुना होगा कि भगवान श्रीकृष्ण ने शिशुपाल की 100 गलतियां माफ की थीं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर भगवान श्रीकृष्ण जैसा धर्म का पालन करने वाला अवतार किसी व्यक्ति के इतने बड़े अपराधों को बार-बार क्यों सहता रहा। आखिर शिशुपाल कौन था, जिसने खुलेआम श्रीकृष्ण का अपमान किया, सभा में उनका विरोध किया और फिर भी उसे तुरंत दंड क्यों नहीं मिला। इसके पीछे की कथा क्या है और तब क्या हुआ जब शिशुपाल ने 100 गलतियों की सीमा पार कर दी। तो आइए जानते हैं श्रीकृष्ण और शिशुपाल से जुड़े इसी रोचक और रहस्यमयी प्रसंग के बारे में-

Shri Krishna Shishupal Story

पौराणिक कथाओं में शिशुपाल और भगवान श्रीकृष्ण का संबंध केवल इस जन्म तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि इसे कई जन्मों से चले आ रहे वैर से जोड़ा जाता है। मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु के द्वारपाल जय और विजय को सनकादि ऋषियों के श्राप के कारण पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ा। कहा जाता है कि उन्होंने अलग-अलग युगों में भगवान के विरोधी रूप में जन्म लिया - पहले हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यपु, फिर रावण और कुंभकर्ण, और बाद में शिशुपाल तथा अन्य विरोधी पात्रों के रूप में।

इस जन्म में शिशुपाल के मन में श्रीकृष्ण के प्रति शत्रुता के कई कारण बताए जाते हैं। उनमें सबसे प्रमुख कारण रुक्मिणी विवाह का प्रसंग माना जाता है। शिशुपाल, विदर्भ राजकुमार रुक्मी का घनिष्ठ साथी था। रुक्मी अपनी बहन रुक्मिणी का विवाह शिशुपाल से करवाना चाहता था, जबकि रुक्मिणी स्वयं श्रीकृष्ण को अपना पति मान चुकी थीं। अंततः श्रीकृष्ण रुक्मिणी को अपने साथ ले आए, जिससे शिशुपाल का क्रोध और बढ़ गया। इसके अलावा शिशुपाल का संबंध कंस और मगध नरेश जरासंध से भी था। वह कई अवसरों पर श्रीकृष्ण के विरोधियों का साथ देता रहा। उसे यह भी विश्वास था कि श्रीकृष्ण उसके 100 अपराध करने पर भी उसके प्राण नहीं हरेंगे।

Shri Krishna Shishupal Story

शिशुपाल के जन्म से जुड़ी कथा भी काफी रोचक मानी जाती है। कहा जाता है कि जन्म के समय उसका रूप सामान्य नहीं था। उसते तीन नेत्र और चार भुजाएं थी और वह गधे की तरह रो रहा था। इसे देखकर शिशुपाल के माता-पिता भयभीत हो उठे। वह उसका त्याग करना चाहते थे, लेकिन उसी समय आकाशवाणी हुई कि जिस व्यक्ति की गोद में जाने पर बालक का असामान्य रूप सामान्य हो जाएगा, वही आगे चलकर उसकी मृत्यु का कारण बनेगा। कई राजा और वीर उसे देखने पहुंचे, लेकिन जब बालक श्रीकृष्ण की गोद में पहुंचा, तब उसका स्वरूप सामान्य हो गया। यह देखकर उसकी माता चिंतित हो गईं। उन्होंने श्रीकृष्ण से अपने पुत्र के जीवन की रक्षा का वचन मांगा। तब श्रीकृष्ण ने आश्वासन दिया कि वे उसके 100 अपराधों को क्षमा करेंगे। समय बीतता गया और शिशुपाल कई अवसरों पर श्रीकृष्ण के प्रति कटु वचन बोलता रहा। लेकिन श्रीकृष्ण शांत बने रहे।

बाद में धर्मराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें अनेक ऋषि-मुनि, आचार्य और राजाओं को आमंत्रित किया गया। यज्ञ की विधि के दौरान प्रश्न उठा कि सभा में सबसे पहले सम्मान किसे दिया जाए। तब सहदेव ने श्रीकृष्ण को सर्वश्रेष्ठ मानते हुए उनका नाम प्रस्तावित किया। भीष्म सहित अनेक विद्वानों ने भी इस मत का समर्थन किया। जैसे ही युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण का सम्मान करना शुरू किया, शिशुपाल क्रोधित हो उठा। उसने सभा के बीच श्रीकृष्ण की योग्यता पर प्रश्न उठाए और अपमानजनक बातें कहनी शुरू कर दीं। सभा में उपस्थित अनेक राजा और योद्धा उसके व्यवहार से नाराज़ हो गए, लेकिन श्रीकृष्ण ने सबको शांत रहने का संकेत दिया।

इसके बावजूद शिशुपाल नहीं रुका। वह लगातार कटु वचन बोलता रहा। तब श्रीकृष्ण ने उसे चेतावनी देते हुए कहा कि उसकी सीमाएं अब पूरी होने के करीब हैं और उसे रुक जाना चाहिए। लेकिन शिशुपाल ने इसे भी अनदेखा कर दिया और अपना अपमानजनक व्यवहार जारी रखा। अंततः जब उसने सारी सीमाएं पार कर दीं, तब श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उसी क्षण शिशुपाल का अंत कर दिया। कहा जाता है कि उसके शरीर से निकली दिव्य ज्योति अंत में भगवान श्रीकृष्ण में विलीन हो गई। 

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Content Editor

Sarita Thapa

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