Raksha Bandhan 2026: भद्रा के साये में राखी बांधना क्यों है वर्जित? जानें, रावण के सर्वनाश और भद्रा काल की पौराणिक कथा
punjabkesari.in Wednesday, Aug 19, 2026 - 08:48 AM (IST)
Raksha Bandhan 2026: भाई-बहन के अटूट प्रेम और विश्वास का महापर्व 'रक्षाबंधन' हर साल सावन मास की पूर्णिमा तिथि को बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस पावन अवसर पर बहनें अपने भाइयों की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती हैं। हालांकि, शास्त्रों में रक्षाबंधन के दिन भद्रा काल का विशेष ध्यान रखने की सलाह दी गई है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भद्रा काल में राखी बांधना न केवल अशुभ माना जाता है, बल्कि यह कुल के विनाश का कारण भी बन सकता है।

साल 2026 में कब है रक्षाबंधन?
ज्योतिषीय गणना और पंचांग के अनुसार, साल 2026 में श्रावण पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त की सुबह 9:08 बजे शुरू होगी और 28 अगस्त की सुबह 9:48 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि को आधार मानते हुए, रक्षाबंधन का त्योहार 28 अगस्त 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा।
इस बार बहनों को शुभ मुहूर्त के लिए लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा। साल 2026 में रक्षाबंधन पर भद्रा का कोई साया नहीं रहेगा, क्योंकि 28 अगस्त को सूर्योदय से पहले ही भद्रा काल समाप्त हो जाएगा।
भाई और बहन के प्रेम का प्रतीक यह त्यौहार हर साल सावन के आख़िरी दिन में मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती हैं और उनकी लंबी उम्र की कामना करती हैं। भाई भी अपनी बहनों की ताउम्र रक्षा करने का वचन देते हैं।
रावण के सर्वनाश से जुड़ा है भद्रा का रहस्य
एक प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार रावण की बहन शूर्पणखा ने उन्हें भद्रा काल में राखी बांधी थी। माना जाता है इसी वजह से ही रावण का विनाश हुआ था अन्यथा रावण का विनाश नहीं होता। इसके अलावा हिंदू समाज में ऐसी कई अन्य कथाएं प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार जब तक तीन त्रिदेव यानि देव ब्रह्मा, विष्णु और महेश साथ में मौजूद नहीं होते हैं तो कोई भी पूजा संपन्न नहीं होती। कहा जाता है कि भद्रा काल में भगवान शंकर तांडव कर रहे होते हैं, जिस इस वजह से वे गायब रहते हैं। इसलिए इस दौरान कोई भी शुभ काम नहीं किया जाता।

कौन है भद्रा और क्यों माना जाता है इसे अशुभ ?
ज्योतिष शास्त्र में तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण के स्पष्ट मान आदि को पंचांग कहा जाता है। पंचांग में कुछ समय ऐसा भी होता है, जिसमें कोई भी मंगल कार्य करना निषिद्ध यानि वर्जित माना जाता है। काम करने पर कुछ न कुछ बुरा होने की आशंका रहती है। ऐसे निषिद्ध समय को 'भद्रा' कहते हैं। पुराणों के अनुसार भद्रा भगवान सूर्यदेव की पुत्री और राजा शनि की बहन है।
शनि की तरह ही इनका स्वभाव भी कड़क बताया गया है। इसलिए उनके स्वभाव को नियंत्रित करने के लिए ही भगवान ब्रह्मा ने उन्हें कालगणना या पंचांग के एक प्रमुख अंग विष्टि करण में स्थान दिया। इसके अलावा आपको बता दें कि भद्रा का स्वरूप अत्यंत विकराल बताया गया है। ब्रह्मा जी के आदेश से भद्रा, काल के एक अंश के रूप में विराजमान रहती है। अपनी उपेक्षा या अपमान करने वालों के कार्यों में विघ्न पैदा करके विपरीत परिणाम देती है। यही कारण है कि विवाह, गृह प्रवेश, कृषि, उद्योग, रक्षाबंधन, होलिका दहन, दाह कर्म जैसे कार्य भद्रा के दौरान नहीं किए जाते हैं।

