Dussehra 2026 : विजयादशमी पर क्यों किया जाता है रावण दहन? जानें भगवान श्रीराम और मां दुर्गा की विजय की पौराणिक कथा
punjabkesari.in Tuesday, Oct 20, 2026 - 10:52 AM (IST)
Dussehra 2026 : आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी को मनाया जाने वाला विजयादशमी का त्यौहार भारतीय सनातन संस्कृति का एक मुख्य पर्व है। विजयादशमी पर्व असत्य पर सत्य की, अन्याय पर न्याय की, दुराचार पर सदाचार की, तमोगुण पर दैवीय गुण की, असुरत्व पर देवत्व की विजय का पर्व है। भारतीय संस्कृति सदा से ही वीरता व शौर्य की समर्थक रही है। विद्वानों के अनुसार आश्विन शुक्ल दशमी को तारा उदय होने के समय ‘विजय’ नामक मुहूर्त होता है। यह काल सर्वकार्य सिद्धिदायक होता है।
इसलिए भी इसे विजयादशमी कहते हैं।
आश्विनस्य सिते पक्षे दशम्यां तारकोदये।
स कालो विजयो ज्ञेय: सर्वकार्यार्थसिद्धये॥
अर्थात- आश्विन शुक्ल दशमी को सायंकाल तारा उदय होने के समय ‘विजयकाल’ रहता है। यह सभी कार्यों को सिद्ध करता है। इसलिए विजयादशमी वर्ष की अत्यंत शुभ तिथियों में से एक है। यह पर्व वीरता, शौर्य, साहस और संकल्प का पर्व है। शक्ति की उपासना का पर्व शारदीय नवरात्र आश्विन मास की प्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाता है। दसवें दिन विजयादशमी का पर्व पूरे भारतवर्ष में बड़ी श्रद्धा एवं उत्साह से मनाया जाता है।
विजयादशमी के दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण का वध किया था। रावण भगवान श्रीराम की धर्मपत्नी भगवती सीता जी का अपहरण कर लंका ले गया था। तब भगवान श्रीराम ने युद्ध के दौरान पहले नौ दिनों तक मां भगवती आदिशक्ति मां दुर्गा की पूजा कर वर प्राप्त किया और दसवें दिन दुष्ट रावण का विजयादशमी के दिन वध किया। इसलिए यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।
मां भगवती देवी दुर्गा ने भी नौ रात्रि एवं दस दिन के युद्ध के उपरान्त महिषासुर पर विजय प्राप्त की थी। भारतीय संस्कृति वीरता और शौर्य की उपासक है। विजयादशमी इसी साहस और संकल्प का महापर्व है। दशहरे से पूर्व मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की पावन लीलाओं का मंचन किया जाता है। शारदीय नवरात्रि पर्व के शुभ अवसर पर श्रीरामलीला का मंचन प्रारम्भ होता है तथा दशहरे के दिन रावण वध के पश्चात विजयादशमी के पर्व के रूप में रावण दहन का पूरे देश में भव्य आयोजन होता है। कुम्भकर्ण, मेघनाद आदि असुरों के वध के साथ अन्तिम दिन रावण वध के दृश्यों का मंचन किया जाता है तथा सायंकाल में रावण दहन का कार्यक्रम होता है जिसे हम विजयादशमी का त्यौहार भी कहते हैं।
समस्त बच्चे, वृद्ध तथा नर-नारी इस रावण दहन के कार्यक्रम को देखने के लिए सम्मिलित होते हैं। किसी खुले स्थान पर रावण, कुम्भकर्ण, मेघनाद के पुतलों को स्थापित किया जाता है। कलाकार भगवान श्रीराम, सीता जी और लक्ष्मण जी के रूप धारण करते हैं और आग के तीर से पुतलों का दहन होता है। विजयादशमी के दिन शमी वृक्ष का पूजन करने की परम्परा है। महाभारत के युद्ध में पांडवों ने इसी वृक्ष के ऊपर अपने अस्त्र-शस्त्र छुपाए थे और बाद में उन्हें कौरवों से जीत प्राप्त हुई थी।
वास्तव में विजयादशमी पर्व भारतवर्ष की सांस्कृतिक, पारंपरिक व राष्ट्रीय एकता का पर्व है जिसे मर्यादित ढंग से मना कर हर भारतवासी गौरवान्वित महसूस करता है। समाज में सद्प्रवृत्ति के प्रवाह हेतु कुत्सित मानसिकता का विनाश आवश्यक है। इन पर्वों को मनाने का एकमात्र उद्देश्य यही है कि आज के वैज्ञानिक युग में मानवीय समाज को सद्व्यवहार के लिए प्रेरित किया जा सके। पर्व हमारे जीवन में उत्साह का संचार करते हैं। इनके आगमन से हमें अपनी प्राचीन संस्कृति से जुड़ने का सुअवसर प्राप्त होता है। युगों-युगों से हमारी भारतीय सनातन संस्कृति पर्वों के माध्यम से ही अपने अस्तित्व और महानता का बोध कराती है। इसलिए हमें भी अपनी संस्कृति को सम्मान देते हुए इन पर्वों को श्रद्धा व सम्मानपूर्वक मनाना चाहिए।
