Mohini Ekadashi Vrat Katha : मोहिनी एकादशी के दिन जरूर पढ़े ये कथा, जीवन में आने वाली हर परेशानी होगी दूर
punjabkesari.in Sunday, Apr 26, 2026 - 01:26 PM (IST)
Mohini Ekadashi Vrat Katha : सनातन धर्म में मोहिनी एकादशी को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोहिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस बार मोहिनी एकादशी का व्रत 27 अप्रैल, 2026 सोमवार के दिन रखा जाएगा। माना जाता है कि इस दिन सच्चे मन से विष्णु जी पूजा करने और व्रत रखने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और सभी पापों का नाश होता है। इस दिन पूजा और मंत्रों का जाप करने के साथ मोहिनी एकादशी व्रत की कथा पढ़ने और सुनने का भी बहुत महत्व है। तो आइए जानते हैं मोहिनी एकादशी व्रत कथा के बारे में-

मोहिनी एकादशी व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, जब समुद्र मंथन के दौरान अमृत कलश निकाला तो देवताओं और असुरों के बीच अमृत को पीने को लेकर विवाद छिड़ गया। असुर देवताओं को अमृत नहीं देना चाहते थे, तब भगवान विष्णु ने एक सुंदर रूपवती नारी का रूप धरण किया। जिसका नाम मोहिनी था। मोहिनी देवता और दानवों के बीच पहुंच गई। इनके रूप से मोहित होकर असुरों ने अमृत का कलश इन्हें सौंप दिया। मोहिनी का रूप धारण किए हुए भगवान विष्णु ने सारा अमृत देवताओं को पीला दिया। इससे देवता अमर हो गए। जिस दिन भगवान विष्णु मोहिनी रूप में प्रकट हुए थे, उस दिन वैशाख माह के शुक्ल पक्ष के एकादशी थी। इसीलिए इसे मोहिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है और भगवान विष्णु के मोहिनी रूप की पूजा मोहिनी एकादशी के दिन की जाती है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार की बात है। प्रभु श्री राम जी ने महर्षि वशिष्ठ से कहा की है गुरु श्रेष्ठ! मैंने जनक नंदिनी सीता जी के वियोग में बहुत कष्ट भोगे हैं, अतः मेरे कष्टों का नाश किस प्रकार होगा? आप मुझे कोई ऐसा व्रत बताने की कृपा करें, जिससे मेरे सभी पाप और कष्ट नष्ट हो जाए। आप मुझे कोई ऐसा व्रत बताएं जिसके प्रभाव से समस्त पापो और दुखों से मुक्ति प्राप्त हो सके। भगवान राम को संबोधित करते हुए वशिष्ठ मुनी ने कहा की हे राम! आपका प्रिय नाम समस्त प्राणियों के दुखों का नाश करता है, लेकिन फिर भी आपने जनकल्याण के लिए यह प्रश्न पूछा है। जो की प्रशंसनीय है।
मैं आपको एक एकादशी व्रत का माहात्म्य सुनाता हूं- वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम मोहिनी एकादशी है। इस एकादशी का उपवास करने से मनुष्य के सभी पाप और क्लेश नष्ट हो जाते हैं। इस उपवास के प्रभाव से मनुष्य मोह के जाल से मुक्त हो जाता है। अतः हे राम! दुखी मनुष्य को इस एकादशी का उपवास अवश्य ही करना चाहिए इस व्रत को करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं अब आप इसकी कथा को श्रद्धापूर्वक सुने। वशिष्ठ मुनि ने बताया प्राचीन समय में सरस्वती नदी के किनारे भद्रावती नाम की एक नगरी में द्युतिमान नाम का एक राजा राज्य करता था। उसी नगरी में एक वैश्य राहत था, जो धन धन्य से परिपूर्ण था। उसका नाम था धर्मपाल, वह सदा पुण्य कर्मों में ही लगा राहत था। दूसरों के लिए कुआं, मठ बगीचा, पोखरा और घर बनवाया करता था। भगवान श्री विष्णु की भक्ति में वह सदा लीन राहत था। उसे वैश्य के पांच पुत्र थे, जिनमें सबसे बड़ा पुत्र अत्यंत पापी व दुष्ट था। वो वेश्याओं और दुष्टों की संगति करता था। इससे जो समय बचता था, उसे वह जुआ खेलने में व्यतीत करता था।
वह बड़ा ही अधर्मी था और देवता, पितृ आदि किसी को भी नहीं मानता था। अपने पिता का अधिकांश धन वह बुरे व्यंजनों में ही उड़ाया करता था। मद्यपान तथा मांस का भक्षण करना उसका नित्य कर्म था। जब काफी समझाने-बुझाने पर भी सीधे रास्ते पर नहीं आया, तो दुखी होकर उसके पिता, भाइयों और कुटुंम्बियों ने उसे घर से निकाल दिया और उसकी निंदा करने लगे। घर से निकालने के बाद वह अपने आभूषणों तथा वस्त्रों को बेच-बेचकर अपना गुजारा करने लगा। फिर वह चोरी करने लगा। एक बार चोरी करते समय सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और कारागार में डाल दिया। कुछ समय बाद उसे नगर छोड़ने पर विवश होना पड़ा और वह जंगल में पशु पक्षियों को मार कर पेट भरने लगा। उसी समय वो कौटिन्य मुनि के आश्रम में जा पहुंचा। इन दिनों वैशाख का महीना था। कौटिन्य मुनि गंगा से स्नान करके आ रहे थे।
उनके भीगे वस्त्रों के छीटे मात्र से पापी को कुछ सद्बुद्धि प्राप्त हुई। वो ऋषि के पास जाकर हाथ जोड़कर कहने लगा कि हे महात्मा ! मैंने बहुत सारे पाप किया हैं। कृपया मुझे इन पापों से मुक्त होने का उपाय बताएं। महर्षि ने उसे एकादशी व्रत का महत्व समझाया और एकादशी व्रत रखना को कहा। ऋषि ने कहा कि अगर तुम वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करोगे तो इसके उपवास करने से तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे क्योंकि इस एकादशी को मोहिनी एकादशी भी कहा जाता है। इस व्रत के प्रभाव से वैश्य पुत्र के सभी पाप नष्ट हो गए। अंत में वह गरुड़ पर सवार होकर विष्णु लोक को गया। संसार में इस व्रत से उत्तम कोई दूसरा व्रत नहीं है इसे महात्म्य के श्रवण व पाठ से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह पुण्य एक सहस्त्र गोदान के पुण्य के बराबर है।

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