शहादत का वो असर, जब बंगाल के युवाओं के लिए खुदीराम बोस के नाम वाली धोती बन गई थी सम्मान का प्रतीक
punjabkesari.in Wednesday, Aug 12, 2026 - 12:46 PM (IST)
Khudiram Bose: भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अनेक वीरों ने मातृभूमि की आजादी के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए। उन्हीं अमर क्रांतिकारियों में खुदीराम बोस का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। मात्र 18 वर्ष 8 महीने की आयु में हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूमने वाले इस युवा क्रांतिकारी ने देशभक्ति, साहस और बलिदान की ऐसी मिसाल कायम की, जो आज भी युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है।

3 दिसम्बर, 1889 को बंगाल के मिदनापुर जिले के हबीबपुर गांव में जन्मे खुदीराम बोस ने बचपन में ही माता-पिता को खो दिया था। उनका पालन-पोषण उनकी बड़ी बहन ने किया। छात्र जीवन से ही उनके मन में देशभक्ति की भावना प्रबल थी। 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में चले आंदोलन में उन्होंने सक्रिय भाग लिया और नौवीं कक्षा की पढ़ाई छोड़कर क्रांतिकारी संगठन ‘युगांतर’ से जुड़ गए। वह ‘वंदे मातरम’ के पर्चे बांटते और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जनजागरण का कार्य करते थे। क्रांतिकारी सत्येंद्रनाथ बोस के मार्गदर्शन में उन्होंने बम बनाना सीखा और अंग्रेजी शासन के विरुद्ध कई साहसिक कार्रवाइयों में भाग लिया। अंग्रेज न्यायाधीश डगलस किंग्सफोर्ड अपनी कठोर और दमनकारी नीतियों के कारण क्रांतिकारियों के निशाने पर था।

‘युगांतर’ संगठन ने उसे दंडित करने का निर्णय लिया और यह जिम्मेदारी खुदीराम बोस तथा प्रफुल्ल कुमार चाकी को सौंपी गई। 30 अप्रैल, 1908 को मुजफ्फरपुर में दोनों ने किंग्सफोर्ड की बग्घी समझकर एक गाड़ी पर बम फेंका। दुर्भाग्यवश उसमें किंग्सफोर्ड नहीं था और 2 यूरोपीय महिलाएं मारी गईं। घटना के बाद प्रफुल्ल कुमार चाकी ने गिरफ्तारी से बचने के लिए स्वयं को गोली मार ली, जबकि खुदीराम बोस गिरफ्तार कर लिए गए। उन्होंने अदालत में स्वीकार किया कि उनका लक्ष्य किंग्सफोर्ड था और निर्दोष लोगों की मृत्यु पर उन्हें गहरा दुख है।
13 जून, 1908 को उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। जब न्यायाधीश ने पूछा कि क्या वह फैसले का अर्थ समझते हैं, तो खुदीराम ने निर्भीकता से उत्तर दिया, ‘‘हां, मैं समझ गया हूं। मेरे वकील कहते हैं कि मैं बम बनाने के लिए बहुत छोटा हूं। अगर आप मुझे मौका दें तो मैं आपको भी बम बनाना सिखा सकता हूं।’’ उनकी यह निडरता पूरे देश में चर्चा का विषय बन गई।

11 अगस्त, 1908 को मुजफ्फरपुर जेल में खुदीराम बोस को फांसी दे दी गई। उनकी शहादत ने युवाओं में स्वतंत्रता की अलख जगा दी। बंगाल में उनके नाम की किनारी वाली धोती तक बुनी जाने लगी और वह राष्ट्रभक्ति के अमर प्रतीक बन गए।
