इस मंदिर में 1 नहीं बल्कि स्थापित हैं 30 हज़ार प्रतिमाएं! पुत्र प्राप्ति के लिए प्रसिद्ध है स्थल

punjabkesari.in Sunday, Apr 24, 2022 - 09:20 AM (IST)

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कहा जाता है हमारे देश के हर कोने में धार्मिक स्थल मौजूद हैं, इनमें से कुछ प्राचीन होने के साथ-साथ ऐतिहासिक व रहस्यमयी भी माने जाते हैं। इन्हीं में से तीन प्राचीन मंदिरों के बारे में हम आपको बताने जा रहे है, जो न केवल अपने अपने शहर में बल्कि देश के साथ-साथ विदेशों में अपने खास रहस्यों के लिए बखूबी जाने जाते हैं। तो आइए जानते हैं कौन से हैं ये मंदिर व कहां है स्थित-

30 हजार नागों वाला ‘श्री नागराज मंदिर’
केरल में अलाप्पुझा जिले के मन्नारशाला में स्थित यह मंदिर नागराज और नाग यक्षि को समर्पित है। करीब 16 एकड़ जमीन पर बने इस मंदिर में सांपों की 30 हजार तस्वीरें तथा प्रतिमाएं बनी हैं। मां बनने की इच्छुक महिलाएं यहां आकर पूजा करती हैं और संतान का जन्म होने पर यहां विशेष पूजा-अर्चना करती हैं और अक्सर अपने साथ सांप की तस्वीरें या प्रतिमाएं लाती हैं। मंदिर में देवता भगवान विष्णु का और वासुकी भगवान शिवजी का प्रतिनिधित्व करते हैं। यहां सर्पयक्षि, नागयक्षि का विशेष स्थान है। पुराने समय में इस क्षेत्र में हर परिवार द्वारा घर में एक नागिन उपवन रखने की परंपरा थी, जिसमें परिवार के सभी सदस्य पूजा किया करते थे।

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एक अनूठा मंदिर ‘वरसिद्धि विनायक’
आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में कनिपक्कम नामक गांव में मौजूद वरसिद्धि विनायक मंदिर बेहद अनूठा है। मंदिर में भगवान गणपति की स्वयंभू प्रतिमा है। इन्हें सत्य के रक्षक माना जाता है। यह मूॢत एक कुएं से निकली थी। मंदिर की खासियत है कि यहां प्रवेश के पहले ही व्यक्ति अपने पापों को स्वीकार करता है, फिर मंदिर के कुंड में स्नान करने के बाद दर्शन करता है। मंदिर को लेकर स्थानीय लोगों में मान्यता इतनी गहरी है कि लोग यहां अपने कई बड़े विवाद भगवान की प्रतिमा के सामने सौगंध उठाकर सुलझा लेते हैं। माना जाता है कि मंदिर में गणेश प्रतिमा का आकार बढ़ता जा रहा है। मंदिर का निर्माण 11वीं सदी में चोल वंश के राजा कुलोथूंगा प्रथम ने करवाया था। विजयनगर के शासकों ने वर्ष 1336 में इसका विस्तार किया। कनिपक्कम गांव की ख्याति इस गणपति मंदिर के कारण पूरे भारत में है। कनि का अर्थ होता है गीली भूमि और पक्कम का अर्थ होता है बहता पानी। इस तरह कनिपक्कम का शाब्दिक अर्थ है बहते पानी की भूमि। ये गांव बाहुदा नदी के किनारे बसा है। इस नदी का भी तीर्थ के लिहाज से आंध्र प्रदेश में काफी महत्व है। बाहुदा का अर्थ है भुजाएं देने वाली नदी।

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द्रविड़ वास्तुकला का सुंदर नमूना ‘ऐरावतेश्वर’
तमिलनाडु में कुम्भकोणम के पास दारासुरम में स्थित इस मंदिर को 12वीं सदी में राजराजा चोल द्वितीय द्वारा बनवाया गया था। यह द्रविड़ वास्तुकला का एक बहुत ही सुंदर नमूना है। यह एक विशाल रथ के रूप में बनाया गया है। इसे तंजावुर के बृहदीश्वर मंदिर तथा गांगेय कोंडा चोलापुरम के गांगेयकोंडाचोलीश्वरम मंदिर के साथ यूनेस्को द्वारा वैश्विक धरोहर स्थल घोषित किया गया है जिन्हें महान जीवंत चोल मंदिरों के रूप में जाना जाता है। मंदिर भगवान शिव को समर्पित है जिन्हें यहां ऐरावतेश्वर के रूप में जाना जाता है क्योंकि इस मंदिर में देवताओं के राजा इंद्र के सफेद हाथी ऐरावत द्वारा भगवान शिव की पूजा की गई थी।

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Content Writer

Jyoti

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