जयंत नगरी से जींद तक: जानिए इस पौराणिक नगरी का रामायण और महाभारत कालीन इतिहास
punjabkesari.in Wednesday, Apr 15, 2026 - 02:12 PM (IST)
Jayanti Devi Temple Jind: देवताओं के राजा इंद्र ने अपने पुत्र जयंती के लिए बसाई थीं जयंत नगरी। जिसे अब जींद के नाम से जाना जाता है। महाभारत के समय श्री कृष्ण ने पांडवो के लिए मांगे गए 5 गांव में से सोनप्रस्थ के अंतर्गत था जींद। कुरुक्षेत्र युद्धभूमि का भी हिस्सा था जींद। जहां युद्धभूमि का चौथा यक्ष विराजमान था। दुर्योधन 21 घंटे जिस सरोवर में छिपा था वह सरोवर भी जींद के इक्कास गांव में ही है, 12 साल पांडवों संग जींद में ही रुके थे भगवान श्री कृष्ण और सोमवती अमावस को कलयुग में बार-बार आने का दिया था श्राप।

श्रीराम चंद्र जी सीता माता व भाई लक्ष्मण जी के साथ वनवास यात्रा के दौरान देवताओं के राजा इंद्र के पुत्र के लिए बसाई गयी जयंत नगरी (आज के समय में जीन्द के नाम से जाना जाता है) में कुछ समय व्यतीत किया। इस दौरान इस नगरी के राजा जयंत वायु मार्ग से विचरण कर रहे थे और श्रीराम जी व माता सीता को वन में देखकर उनके मन में विचार आया कि अगर यह श्रीराम चंद्र जी ही श्रीहरि विष्णु जी का पूर्ण अवतार हैं, तो वे यहां वन में क्यों भटक रहे हैं। अपने इस भ्रम को दूर करने के लिये जयंत ने श्रीराम चंद्र जी की परीक्षा लेने के लिये एक कौवे का रूप धारण करके माता सीता के पैर पर अपनी चोंच से प्रहार कर भाग निकला। तब राम जी ने एक सरकंडे को उठाया और कौवे को शिक्षा देने के भाव से अपने कोदंड नामक धनुष पर संधान कर कौवे पर चला दिया, वह सरकंडा रूपी बाण कौवे की आंख में जा लगा और कौवे की एक आंख भंग हो गयी। तदोपरांत कौवे की दो आंखें होने के बावजूद भी वह एक बार में एक ही आंख का पूर्णतः प्रयोग कर पाता है। यह श्रीराम जी के प्रहार का प्रभाव आज भी देखा जा सकता है।
जब इसके पश्चात भी कौवा तीव्र गति से उड़ता रहा। राम जी ने भी अपनी बाजु से पकड़ने का प्रयास किया तो कौवा तीव्र गति से उड़ गया व श्रीराम जी ने भी अपनी बाजु को बढ़ा लिया। अब जयंत के रूप में कौवा आगे-आगे और श्रीराम जी की बाजु पीछे-पीछे। तब जयंत रूपी कौवा त्रिलोकी में सबके पास गया और शरण देने का आग्रह किया, परन्तु हर जगह उसे एक ही ज्वाब मिला कि - श्रीराम का शत्रु हमारा शत्रु।

तब भागते भागते जयंत पर नारद मुनी की दृष्टि पड़ी और पूछने पर जयंत ने सारी व्यथा सुनाई व मार्गदर्शन का आग्रह किया, जिस पर नारद जी ने मार्गदर्शन करते हुए कहा कि अपने भ्रम को त्याग कर त्रिलौकीनाथ श्रीहरि के पूर्ण अवतार श्रीराम चंद्र जी की शरण में चले जाओ। तब कौवे रूपी जयंत ने श्रीराम व सीता माता की शरण में जाकर क्षमा याचना की तथा किस प्रकार जयंत को भ्रम हुआ यह व्यथा सुनाई। जिस पर भक्तवत्सल श्रीरामचंद्र व जगतजननी आदि शक्ति भगवती स्वरूपनी माता सीता ने जयंत को क्षमा दान दिया।
इसके पश्चात जयंत ने माता सीता को बहन के रूप में स्वीकार किया तथा जहां पर माता सीता व श्रीराम चंद्र जी विराजमान थे, वहीं पर विराजित होने का आग्रह किया। आज के समय जिस स्थान पर माता जयंती का गर्भ गृह है, इसी ही स्थान पर कभी माता सीता ने विराजित होकर जयंत को इसी ही स्थान पर, विराजमान रहकर भक्तों का कल्याण करने का आर्शीवाद दिया था।
इसके पश्चात श्रीराम जी ने भी जयंत रूपी कौवे को यह वरदान दिया कि - तुम्हे भोजन करवाने से पितृ तृप्त होंगे (माना जाता है कि इस घटना के बाद ही पितृपक्ष में पितरों के साथ कौवे के लिए भी भोजन निकालने की परंपरा आरम्भ हुई)। यह घटना इसी जयंती देवी मंदिर परिसर में ही घटित हुई थी।
माता सीता जी को बहन के रूप में स्वीकार करने के पश्चात माता सीता इसी स्थान पर जयंती देवी के रूप में विराजमान हैं। इस घटना के पश्चात इस राज्य का नाम जयंत पुरी पड़ गया।

सृष्टिकर्ता श्री ब्रह्मा जी ने भी माता जयंती को विजय श्री प्रदान करने का आर्शीवाद दिया और विधान किया कि जो भी व्यक्ति माता जयंती की शरण में आकर नतमस्तक होगा, माता जयंती के आर्शीवाद से उसे विजय प्राप्त होगी। महाभारत के समय भगवान श्री कृष्ण जी ने भी पांडवों सहित इस जयंती देवी मंदिर के स्थान पर आकर युद्ध से पहले विजय का आर्शीवाद प्राप्त किया था। इसी ही स्थान पर श्री कृष्ण जी ने अपना पाञचजन्य शंख बजाकर युद्ध के लिये प्रस्थान किया था।
एक अन्य वृतांत के अनुसार राजा जयंत की एक सगी बहन भी थी जिसका नाम भी जयंती ही था। माता सीता को भी जयंती के रूप में बहन स्वीकार करने के पश्चात यह स्थान जयंत की दोनों बहनों को समर्पित है। पवित्र सनातन ग्रंथों के अनुसार, राजा जयंत की सगी बहन व इंद्र की पुत्री जयंती का विवाह महार्षि भृगु जी के पुत्र शुक्र जी की दूसरी पत्नी के रूप में हुआ। इन्ही शुक्र जी को शुक्राचार्य के नाम से भी जाना जाता है।
उक्त सभी घटनाक्रम के पश्चात श्रीराम जी, सीता माता व लक्ष्मण जी यहां से होते हुए आगे की यात्रा को प्रस्थान किया व आगे चलकर एक कबंध नामक राक्षस का वध किया। वर्णित है कि यह कबंध नामक राक्षस एक विशाल पहाड़ के रूप में था। जो भी यात्री वहां से गुजरता तो वह पहाड़ रूपी कबंध राक्षस अपनी सांस खींचनें की शक्ति से यात्री को अपनी तरफ खींचकर उसका वध कर देता था। श्रीराम जी ने उस कबंध राक्षस का भी वध कर उसका उद्धार किया।

Sanjay Dara Singh
AstroGem Scientist
LLB., Graduate Gemologist GIA (Gemological Institute of America), Astrology, Numerology and Vastu (SSM)
