जीवन में सुख चाहिए तो अपनाएं संत सरयूदास की सहनशीलता और संतोष की राह
punjabkesari.in Monday, May 04, 2026 - 01:40 PM (IST)
Inspirational Story : महात्मा सरयूदास की शिक्षा-दीक्षा बहुत थोड़ी हुई थी। युवावस्था में वह अपने मामा के घर पर रह कर उनका व्यापार संभालते थे। कुछ समय बाद सरयूदास का विवाह हो गया। दुर्भाग्य से उनकी पत्नी अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सकी और वह घर-बार छोड़कर संत बन गए। एक बार की बात है सरयूदास रेलगाड़ी से कहीं जा रहे थे। गाड़ी में भारी भीड़ थी। कहीं तिल रखने की जगह नहीं थी।
किसी तरह से संत जी को गाड़ी में बैठने की जगह मिल गई। गाड़ी में संत जी के पास ही एक मजबूत कद-काठी का व्यक्ति बैठा था। वह बार-बार संत की ओर पैर बढ़ाकर उन्हें ठोकर मार देता था। संत सरयूदास ने बड़े दया भाव से कहा, “भाई संकोच मत करना। लगता है तुम्हारे पैर में कहीं पीड़ा है जिसे दिखाने के लिए तुम बार-बार पैर मेरी ओर बढ़ाते हो, फिर वापस खींच लेते हो। मुझे सेवा का मौका दो। मैं भी तुम्हारा अपना ही हूं।
यह कहते हुए संत ने व्यक्ति के पैर उठाकर अपनी गोद में रख लिए और उन्हें सहलाने लगे। संत के ऐसा करने पर यात्री शर्मिंदा हुआ और क्षमा याचना करते हुए कहने लगा, “महाराज, मेरा अपराध क्षमा करें। आप महात्मा हैं और आपके अंदर सहनशीलता की शक्ति है।”
सहनशीलता ऐसा गुण है, जिसे हमें अपने अंदर विकसित करना चाहिए। व्यक्ति का सहनशील होना ही उसे इस दुनिया में आगे ले जाता है। हृदय में संतोष है तो इंसान कुटिया में भी सुखी रहता है और असंतोष है तो ऐसा जीव महलों में भी सुखी नहीं है।
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