Hartalika Teej Vrat Katha: हरतालिका तीज पर व्रत न रख पाएं तो न हों निराश, केवल इस पावन कथा के पठन से मिलेगा अखंड सौभाग्य का वरदान
punjabkesari.in Saturday, Sep 12, 2026 - 12:24 PM (IST)
Hartalika Teej Vrat Katha 2026: हरतालिका तीज का पर्व सुहागिन महिलाओं के जीवन में अखंड सौभाग्य और कुंआरी कन्याओं के लिए मनचाहा वर पाने का पावन अवसर लेकर आता है। धर्मशास्त्रों में इस दिन निर्जला उपवास और रात्रि जागरण का विशेष विधान बताया गया है। हालांकि, यदि कोई महिला किसी कारणवश यह कठिन व्रत रखने में असमर्थ है, तो शास्त्रों के अनुसार इस दिन सच्ची निष्ठा से हरतालिका तीज की पौराणिक व्रत कथा पढ़ने या सुनने मात्र से ही संपूर्ण पूजा का पुण्य फल प्राप्त हो जाता है। आइए जानते हैं माता पार्वती के कठिन तप और भगवान शिव के वरदान की वह पावन गाथा, जिसे स्वयं महादेव ने माता पार्वती को उनके पुनर्जन्म का स्मरण कराने के लिए सुनाया था।
Hartalika Teej Katha: माता गौरी ने पर्वतराज हिमालय के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया था। वे बचपन से ही भगवान शिव को पति रूप में पाना चाहती थी। इसके लिए उन्होंने 12 वर्षों तक अन्न-जल त्यागकर (निराहार रहकर) अत्यंत कठिन तपस्या करी। माता पार्वती के कठिन तप को देखकर देवर्षि नारद महाराज हिमालय के पास पहुंचे और कहा कि भगवान विष्णु उनकी पुत्री से प्रसन्न हैं और उनसे विवाह करना चाहते हैं। यह सुनकर राजा हिमालय अत्यंत प्रसन्न हुए। इसके बाद नारद जी ने भगवान विष्णु को जाकर बताया कि महाराज हिमालय अपनी पुत्री का विवाह आपसे करना चाहते हैं। फिर नारद जी ने माता पार्वती को सूचित किया कि उनके पिता ने उनका विवाह भगवान विष्णु से तय कर दिया है।
भगवान विष्णु से विवाह तय होने की बात सुनकर माता पार्वती अत्यंत निराश हुईं। उन्होंने अपनी सखियों से अनुरोध किया कि वे उन्हें किसी एकांत व गुप्त स्थान पर ले चलें। माता पार्वती की इच्छानुसार, उनकी सखियों ने उन्हें अपने पिता की नजरों से बचाकर एक घने और सुनसान जंगल की गुफा में पहुंचा दिया।
घने जंगल की गुफा में रहकर माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए पुनः कठोर तप शुरू किया। उन्होंने भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन हस्त नक्षत्र में रेत (बालुका) का शिवलिंग स्थापित किया। इस दिन निर्जला उपवास रखते हुए उन्होंने रात्रि भर जागरण कर भगवान शिव की पूजा-अर्चना की।
माता पार्वती के इस अभूतपूर्व और कठोर तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने माता पार्वती को मनोकामना पूर्ण होने का वरदान दिया। अगले दिन सुबह माता पार्वती ने अपनी सखियों के साथ व्रत का विधिवत पारण किया और समस्त पूजा-सामग्री को गंगा नदी में प्रवाहित कर दिया।
दूसरी ओर भगवान विष्णु को अपनी पुत्री का हाथ सौंपने का वचन दे चुके राजा हिमालय अपनी बेटी के गायब होने से अत्यंत व्याकुल थे। वे ढूंढते हुए घने जंगल में उस गुफा तक पहुंचे। वहां माता पार्वती ने अपने पिता को घर छोड़ने का कारण बताया और भगवान शिव से विवाह के अपने संकल्प तथा शिव जी द्वारा मिले वरदान के बारे में जानकारी दी। यह सुनकर पर्वतराज हिमालय ने भगवान विष्णु से क्षमा मांगी और अपनी पुत्री का विवाह भगवान शिव के साथ करने के लिए सहर्ष तैयार हो गए।
मान्यता है कि जो भी महिला या कन्या इस पावन कथा को सच्ची निष्ठा से पढ़ती या सुनती है, भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा से उसके जीवन में सुख, सौभाग्य और अखंड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद बना रहता है।
