Govatsa Dwadashi Puja Vidhi & Vrat Katha: संतान के मंगल और आरोग्य के लिए इस विधि से करें गोवत्स द्वादशी व्रत, पढ़ें माता यशोदा और बाल गोपाल की पौराणिक कथा
punjabkesari.in Tuesday, Nov 03, 2026 - 12:03 PM (IST)
Nandini fast 2026: कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को गोवत्स द्वादशी (जिसे नंदिनी व्रत या वसु बारस भी कहा जाता है) के रूप में अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह पावन पर्व मुख्य रूप से पुत्रवती महिलाओं द्वारा अपनी संतान की मंगल-कामना, दीर्घायु और समृद्धि के लिए रखा जाता है। इस दिन गऊ माता और उनके बछड़े की पूजा-अर्चना करने का विशेष विधान है।

Govatsa Dwadashi Puja Vidhi गोधूलि बेला में पूजा की विशेष विधि
गोवत्स द्वादशी के दिन महिलाएं दिनभर निराहार रहकर व्रत का पालन करती हैं। शाम के समय यानी गोधूलि बेला में पूजन का मुख्य समय होता है:
आंगन की तैयारी: संध्याकाल में घर के आंगन को पवित्र मिट्टी या गोबर से लीपकर सुंदर चौक पूरा जाता है।
पूजन प्रक्रिया: चौक में गऊ माता और उनके बछड़े को खड़ा करके चंदन, अक्षत, धूप, दीप तथा नैवेद्य अर्पित कर विधिवत पूजन किया जाता है।
अंकुरित अन्न से शृंगार: मध्यान्ह (दोपहर) के समय मूंग, मोठ और बाजरा को अंकुरित करके बछड़े को सजाने और खिलाने की विशेष परंपरा है।

व्रत के कड़े नियम: क्या खाएं और किन चीजों से बचें?
शास्त्रों में गोवत्स द्वादशी व्रत के नियम अत्यंत विशिष्ट और कड़े बताए गए हैं:
वर्जित वस्तुएं: इस व्रत में गेहूं, सामान्य धान/चावल और गाय के दूध का सेवन व्रत रखने वालों के लिए पूरी तरह वर्जित माना गया है।
पूजा में चावल का विकल्प: पूजन के दौरान साधारण चावल के स्थान पर काकून के चावल का उपयोग किया जाता है और इसी से मंत्राक्षत दिए जाते हैं।
आहार का नियम: इस दिन चने की दाल के व्यंजन तथा अंकुरित अन्न (मूंग, मोठ और बाजरा) खाने का ही विधान है।

पौराणिक कथा: भगवान श्री कृष्ण के प्रथम गोचारण का पावन दिन
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी पावन तिथि को भगवान श्री कृष्ण पहली बार वन में गऊएं और बछड़े चराने गए थे। इस दिन माता यशोदा ने बाल कृष्ण का सुंदर शृंगार करके उन्हें गोचारण के लिए तैयार किया था। पूजा-पाठ के बाद जब बछड़ों को खोला गया, तब माता यशोदा ने बड़े भाई बलराम जी से कहा था कि वे कान्हा को अकेला न छोड़ें और ध्यान रखें कि वह यमुना के किनारे दूर न जाएं। गोपालों द्वारा गोवत्स-चारण की इसी पुण्यतिथि की स्मृति में यह पर्व मनाया जाता है।
मिट्टी की मूर्तियों से पूजन का विकल्प
यदि पूजा के समय प्रत्यक्ष रूप से गाय और बछड़ा उपलब्ध न हों, तो गीली मिट्टी से गाय, बछड़े, बाघ और बाघिन की मूर्तियां बनाकर उन्हें लकड़ी के पाट (चौकी) पर स्थापित किया जाता है और उनकी विधिवत पूजा की जाती है।
(आपको बता दें कि यह व्रत कार्तिक के अलावा माघ, वैशाख और श्रावण मास की कृष्ण द्वादशी को भी आता है, परंतु कार्तिक माह में वत्स वंश की पूजा का विशेष महात्म्य माना गया है।)

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ
