Gangaur Vrat Katha: पति का लंबी आयु तक साथ प्राप्त करने के लिए पढ़ें गणगौर व्रत कथा
punjabkesari.in Friday, Mar 20, 2026 - 09:17 AM (IST)
Gangaur Vrat Story: गणगौर यानी गवरजा यानी इसर-गौरी (शंकर-पार्वती) की पूजा। 18 दिवसीय यह पर्व चैत्र कृष्ण पक्ष एकम से शुरू होकर चैत्र शुक्ल पक्ष की तृतीया तक चलता है। यह राजस्थान व सीमावर्ती राज्यों का एक प्रमुख त्यौहार है। गणगौर के दौरान कुंवारी लड़कियां श्रेष्ठ वर व विवाहित महिलाएं वर की सलामती के लिए शिव (इसर) और पार्वती (गौरी) की पूजा करती हैं।

पूजा करते हुए दूब से पानी के छींटे देते हुए ‘गोर गोर गोमती’ गीत गाती हैं। इस दौरान गौर पर सिंदूर और चूड़ी चढ़ाने का विशेष प्रावधान है। चंदन, अक्षत, धूपबत्ती, दीप, नैवेद्य से पूजन करके भोग लगाया जाता है। गणगौर राजस्थान में आस्था, प्रेम और पारिवारिक सौहार्द का सबसे बड़ा उत्सव है। विवाहित महिलाएं चैत्र शुक्ल तृतीया को गणगौर पूजन और व्रत रखकर अपने पति की दीर्घायु की कामना करती हैं।
शास्त्रों के मुताबिक होलिका दहन के दूसरे दिन चैत्र कृष्ण एकम (प्रतिपदा) से चैत्र शुक्ल तृतीया यानी 18 दिनों तक चलने वाला त्यौहार है- गणगौर। माना जाता है कि माता गवरजा होली के दूसरे दिन अपने पीहर आती हैं और आठ दिनों के बाद इसर (शिव) उन्हें वापस लेने के लिए आते हैं। चैत्र शुक्ल तृतीया को उनकी विदाई होती है।
गणगौर की पूजा में गाए जाने वाले लोकगीत इस अनूठे पर्व की आत्मा हैं। इस पर्व में गवरजा और इसर की बड़ी बहन और जीजाजी के रूप में गीतों के माध्यम से पूजा होती है।
गणगौर की पौराणिक व्रत कथा :
कहते हैं एक बार भगवान शंकर, माता पार्वती व नारदजी के साथ भ्रमण के लिए निकले। वह चलते-चलते चैत्र शुक्ल तृतीया को एक गांव में पहुंचे। उनका आना सुनकर ग्राम की साधारण कुल की स्त्रियां उनके स्वागत के लिए थालियों में हल्दी व अक्षत लेकर पूजन को पहुंच गईं। पार्वती जी ने उनके पूजा भाव को समझकर सारा सुहाग रस उन पर छिड़क दिया। वे अटल सुहाग प्राप्त कर लौटीं।
थोड़ी देर बाद उच्च कुल की स्त्रियां अनेक प्रकार के पकवान सोने-चांदी के थालों में सजाकर सोलह शृंगार करके शिव और पार्वती के सामने पहुंचीं। इन स्त्रियों को देखकर भगवान शंकर ने पार्वती से कहा, ‘‘तुमने सारा सुहाग रस तो निर्धन वर्ग की स्त्रियों को ही दे दिया। अब इन्हें क्या दोगी?’’

पार्वती जी बोलीं, ‘‘प्राणनाथ! उन स्त्रियों को ऊपरी पदार्थों से निर्मित रस दिया गया है, इसलिए उनका सुहाग धोती से रहेगा किंतु मैं इन धनी वर्ग की स्त्रियों को अपनी अंगुली चीरकर रक्त का सुहाग रख दूंगी, इससे वे मेरे समान सौभाग्यवती हो जाएंगी।’’
जब इन स्त्रियों ने शिव-पार्वती पूजन समाप्त कर लिया तब पार्वती जी ने अपनी अंगुली चीर कर उसके रक्त को उनके ऊपर छिड़क दिया, जिस पर जैसे छींटे पड़े उसने वैसा ही सुहाग पा लिया।
पार्वतीजी ने कहा, ‘‘तुम सब वस्त्र-आभूषणों का परित्याग कर, माया-मोह से रहित हो जाओ और तन, मन, धन से पति की सेवा करो। तुम्हें अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होगी।’’
इसके बाद पार्वतीजी भगवान शंकर से आज्ञा लेकर नदी में स्नान करने चली गईं। स्नान करने के पश्चात बालू की शिवजी की मूर्ति बनाकर उन्होंने पूजन किया। भोग लगाया और प्रदक्षिणा करके दो कणों का प्रसाद ग्रहण कर मस्तक पर टीका लगाया। इतना सब करते-करते पार्वती जी को काफी समय लग गया। पार्वती जी नदी के तट से चलकर उस स्थान पर आईं जहां पर भगवान शंकर व नारद जी को छोड़कर गई थीं।
शिवजी ने विलंब से आने का कारण पूछा तो उत्तर में पार्वतीजी ने कह दिया कि वहां मेरे भाई-भावज आदि मायके वाले मिल गए थे। उन्हीं से बातें करने में देर हो गई परंतु महादेव तो महादेव ही थे। वह कुछ और ही लीला रचना चाहते थे। अत: उन्होंने पूछा, ‘‘पार्वती! तुमने नदी के तट पर पूजन करके किस चीज का भोग लगाया था और स्वयं कौन-सा प्रसाद खाया था?’’
पार्वतीजी ने पुन: झूठ बोल दिया, ‘‘मेरी भावज ने मुझे दूध-भात खिलाया। उसे खाकर मैं सीधी यहां चली आ रही हूं।’’
यह सुनकर शिवजी भी दूध-भात खाने की लालच में नदी-तट की ओर चल दिए। पार्वती दुविधा में पड़ गईं। तब उन्होंने मौन भाव से भगवान भोले शंकर का ही ध्यान किया और प्रार्थना की, ‘‘हे भगवन! यदि मैं आपकी अनन्य दासी हूं तो आप इस समय मेरी लाज रखिए।’’

यह प्रार्थना करती हुई पार्वतीजी भगवान शिव के पीछे-पीछे चलती रहीं। उन्हें दूर नदी के तट पर माया का महल दिखाई दिया। उस महल के भीतर वह देखती हैं कि शिवजी के साले तथा सलहज आदि सपरिवार उपस्थित हैं। उन्होंने गौरी तथा शंकर का भाव-भीना स्वागत किया। वे दो दिनों तक वहां रहे।
तीसरे दिन पार्वतीजी ने शिव से चलने के लिए कहा, पर शिवजी तैयार न हुए। वे अभी और रुकना चाहते थे। तब पार्वतीजी रूठकर अकेली ही चल दीं। ऐसी हालत में भगवान शिवजी को पार्वती के साथ चलना पड़ा। नारदजी भी साथ-साथ चल दिए। चलते-चलते वे बहुत दूर निकल आए। उस समय भगवान सूर्य अपने धाम (पश्चिम) को पधार रहे थे। अचानक भगवान शंकर पार्वतीजी से बोले, ‘‘मैं तुम्हारे मायके में अपनी माला भूल आया हूं।’’
‘‘ठीक है, मैं ले आती हूं।’’ पार्वतीजी ने कहा और जाने को तत्पर हो गईं परंतु भगवान ने उन्हें जाने की आज्ञा न दी और इस कार्य के लिए नारदजी को भेज दिया परंतु वहां पहुंचने पर नारदजी को कोई महल नजर न आया। नारदजी जंगल में भटकने लगे और सोचने लगे कि कहीं वे किसी गलत स्थान पर तो नहीं आ गए? मगर सहसा ही बिजली चमकी और नारदजी को शिवजी की माला एक पेड़ पर टंगी हुई दिखाई दी। नारदजी ने माला उतार ली और शिवजी के पास पहुंचकर वहां का हाल बताया।
शिवजी ने हंसकर कहा, ‘‘नारद! यह सब पार्वती की ही लीला है।’’
इस पर पार्वती बोलीं, ‘‘मैं किस योग्य हूं।’’
तब नारदजी ने सिर झुकाकर कहा, ‘‘माता! आप पतिव्रताओं में सर्वश्रेष्ठ हैं। आप सौभाग्यवती समाज में आदिशक्ति हैं। यह सब आपके पतिव्रत का ही प्रभाव है। संसार की स्त्रियां आपके नाम-स्मरण मात्र से ही अटल सौभाग्य प्राप्त कर सकती हैं और समस्त सिद्धियों को बना तथा मिटा सकती हैं। तब आपके लिए यह कर्म कौन-सी बड़ी बात है? महामाए! गोपनीय पूजन अधिक शक्तिशाली तथा सार्थक होता है।’’
आपकी भावना तथा चमत्कारपूर्ण शक्ति को देखकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई है। मैं आशीर्वाद रूप में कहता हूं कि जो स्त्रियां इसी तरह गुप्त रूप से पति का पूजन करके मंगलकामना करेंगी, उन्हें महादेवजी की कृपा से दीर्घायु वाले पति का संसर्ग मिलेगा।

