Dwijapriya Sankashti Chaturthi 2026 : फरवरी की संकष्टी चतुर्थी का यह शुभ समय बदल सकता है भाग्य, जानें किस दिन रखा जाएगा यह व्रत
punjabkesari.in Tuesday, Feb 03, 2026 - 12:36 PM (IST)
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Dwijapriya Sankashti Chaturthi 2026 : हिंदू धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य माना गया है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत उनके स्मरण के बिना अधूरी मानी जाती है। हर माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी मनाई जाती है, जिसका अर्थ है संकटों को हरने वाली चतुर्थी। वर्ष 2026 के फरवरी महीने में आने वाली संकष्टी चतुर्थी का विशेष महत्व है क्योंकि इस दौरान माघ और फाल्गुन मास का संधिकाल होता है। आइए जानते हैं फरवरी 2026 की संकष्टी चतुर्थी की तिथि, मुहूर्त और संपूर्ण विधि।

Dwijapriya Sankashti संकष्टी चतुर्थी फरवरी 2026 तिथि और शुभ मुहूर्त
चतुर्थी तिथि प्रारंभ: 5 फरवरी 2026, गुरुवार को दोपहर 01:45 बजे से।
चतुर्थी तिथि समाप्त: 6 फरवरी 2026, शुक्रवार को सुबह 11:20 बजे तक।
संकष्टी चतुर्थी व्रत तिथि- चूंकि संकष्टी चतुर्थी में चंद्रोदय व्यापिनी तिथि का महत्व होता है, इसलिए यह व्रत 5 फरवरी 2026 को रखा जाएगा।
संकष्टी चतुर्थी का महत्व
शास्त्रों के अनुसार, संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने से व्यक्ति के जीवन में आ रही बड़ी से बड़ी बाधाएं दूर हो जाती हैं। जैसा कि नाम से स्पष्ट है, संकष्टी का अर्थ है कष्टों को हरने वाली। भगवान गणेश बुद्धि के देवता हैं, इस दिन व्रत रखने से छात्रों और बौद्धिक कार्य करने वालों को सफलता मिलती है। मान्यता है कि यदि कोई लगातार 13 संकष्टी चतुर्थी के व्रत रखता है, तो उसकी सभी जायज मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

Sankashti Chaturthi Puja Vidhi संकष्टी चतुर्थी पूजा विधि
सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें। संभव हो तो जल में थोड़ा गंगाजल मिला लें।
पूजा के लिए लाल, पीले या संतरी रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें ।
उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। एक लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं।
उस पर भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। यदि आपके पास द्विजप्रिय गणेश की मूर्ति नहीं है, तो सामान्य गणेश प्रतिमा का पूजन भी श्रेष्ठ है।
गणेश जी का जलाभिषेक करें और उन्हें सिंदूर, अक्षत, दूर्वा और पीले फूल अर्पित करें।
उन्हें उनके प्रिय मोदक या लड्डू का भोग लगाएं।

संकष्टी चतुर्थी के मंत्र और पाठ
गणेश गायत्री मंत्र: ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात्।
विघ्न दूर करने का मंत्र: गजाननं भूतगणादि सेवितं, कपित्थ जंबूफलसार भक्षितम्। उमासुतं शोक विनाशकारणं, नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजम्॥
चंद्रमा को अर्घ्य देने और आशीर्वाद लेने के बाद ही व्रत खोला जाता है। पारण में सात्विक भोजन ग्रहण करें। यदि संभव हो तो दान स्वरूप ब्राह्मण को या जरूरतमंद को कुछ मिठाई या अन्न का दान करें।
