नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती से पहले क्यों पढ़े जाते हैं देवी कवच, अर्गला और कीलक स्तोत्र? जानें वजह
punjabkesari.in Sunday, Oct 18, 2026 - 03:11 PM (IST)
Durga Saptashati Devi Kavach Significance : सनातन धर्म में नवरात्रि का पर्व मां दुर्गा की पूजा करने के लिए बहुत खास और पवित्र माना जाता है। इन नौ दिनों में भक्त माता रानी के नौ स्वरूपों की पूजा करते हैं और उनका आशीर्वाद पाने के लिए व्रत, मंत्र जाप तथा धार्मिक पाठ करते हैं। नवरात्रि के दौरान दुर्गा सप्तशती का पाठ करने की भी विशेष मान्यता है। माना जाता है सच्चे मन और पूरी श्रद्धा के साथ सप्ताशती का पाठ करने से भक्तों को मां दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है और मन में साहस, शक्ति औक सकारात्मकता का संचार होता है। हालांकि, दुर्गा सप्तशती का पाठ शुरू करने से पहले देवी कवच, अर्गला स्तोत्र और कीलक स्तोत्र पढ़ने की परंपरा भी प्रचलित है। तो आइए जानते हैं देवी कवच, अर्गला और कीलक स्तोत्र का महत्व और इनके पाठ से जुड़ी मान्यताएं।
देवी कवच का पाठ क्यों किया जाता है?
देवी कवच दुर्गा सप्तशती के प्रारंभिक भाग में आता है। जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट होता है, कवच का अर्थ रक्षा करने वाले आवरण से है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवी कवच का पाठ करने से भक्त मां दुर्गा से अपने जीवन की रक्षा, सुरक्षा और कल्याण की प्रार्थना करता है। इस स्तोत्र में देवी के विभिन्न स्वरूपों का स्मरण करते हुए शरीर के अलग-अलग अंगों और दिशाओं की रक्षा के लिए प्रार्थना की जाती है। इसमें मां दुर्गा की अनेक शक्तियों का वर्णन मिलता है। भक्तों का विश्वास है कि इसका श्रद्धापूर्वक पाठ करने से मन में निर्भयता आती है और व्यक्ति कठिन परिस्थितियों का सामना करने के लिए मानसिक बल प्राप्त करता है। नवरात्रि के दौरान देवी कवच का पाठ करना विशेष रूप से शुभ माना जाता है। इसे दुर्गा सप्तशती के मुख्य पाठ से पहले पढ़कर साधक माता रानी के संरक्षण और आशीर्वाद की कामना करता है।
अर्गला स्तोत्र का क्या है महत्व?
देवी कवच के बाद अर्गला स्तोत्र पढ़ने की परंपरा है। अर्गला शब्द का संबंध द्वार की कुंडी या अवरोध से माना जाता है। धार्मिक संदर्भ में यह स्तोत्र भक्त की मनोकामनाओं की पूर्ति और जीवन में शुभता प्राप्त करने की प्रार्थना से जुड़ा है। अर्गला स्तोत्र में मां दुर्गा की महिमा का वर्णन करते हुए उनसे रूप, जय, यश और विजय प्रदान करने की प्रार्थना की जाती है। इसमें देवी के विभिन्न स्वरूपों और उनकी शक्तियों का स्मरण किया जाता है। मान्यता है कि अर्गला स्तोत्र का पाठ करने से साधक का मन पूजा में एकाग्र होता है और उसके भीतर सकारात्मक भाव उत्पन्न होते हैं। इसलिए इसे दुर्गा सप्तशती के पाठ से पहले पढ़ने की परंपरा निभाई जाती है।
कीलक स्तोत्र क्यों पढ़ा जाता है?
देवी कवच और अर्गला स्तोत्र के बाद कीलक स्तोत्र का पाठ किया जाता है। कीलक शब्द का सामान्य अर्थ खूंटी या रोकने वाले बंधन से जुड़ा है। दुर्गा सप्तशती के संदर्भ में इस स्तोत्र का विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है। कीलक स्तोत्र में दुर्गा सप्तशती के पाठ की महिमा और उसके आध्यात्मिक महत्व का वर्णन मिलता है। पारंपरिक मान्यता के अनुसार, इसका पाठ साधक को श्रद्धा, नियम और समर्पण के साथ देवी की उपासना करने की प्रेरणा देता है। इसे पढ़ने का उद्देश्य माता की कृपा प्राप्त करने और पाठ के प्रति पूर्ण भक्ति भाव बनाए रखने से भी जोड़ा जाता है। नवरात्रि में जो भक्त दुर्गा सप्तशती का विधिवत पाठ करते हैं, वे परंपरा के अनुसार कीलक स्तोत्र का पाठ करके अपनी पूजा को आगे बढ़ाते हैं।
धार्मिक मान्यता
नवरात्रि में देवी कवच, अर्गला और कीलक स्तोत्र का पाठ दुर्गा सप्तशती की पारंपरिक पूजा-विधि का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इनका पाठ भक्त को मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों का स्मरण करने, मन को एकाग्र करने और श्रद्धा के साथ उपासना करने का अवसर देता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सच्चे मन से की गई देवी आराधना भक्त के भीतर साहस, विश्वास और सकारात्मकता बढ़ाने की प्रेरणा देती है।
