अमेरिका, अन्य समृद्ध देश बढ़ते कर्ज पर काबू पाने के कदम उठाएंः IMF
punjabkesari.in Wednesday, Oct 14, 2026 - 04:37 PM (IST)
बैंकॉकः अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की प्रबंध निदेशक क्रिस्टलिना जॉर्जीवा ने बुधवार को अमेरिका और अन्य समृद्ध देशों से बढ़ते वैश्विक कर्ज पर काबू पाने के लिए तत्काल कदम उठाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि इसका सबसे अधिक बोझ कम आय वाले देशों पर पड़ रहा है और वैश्विक वित्तीय प्रणाली पर दबाव बढ़ रहा है। जॉर्जीवा ने कहा कि अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट और अन्य अमेरिकी नेता संघीय बजट घाटे तथा राष्ट्रीय कर्ज के बहुत अधिक बढ़ जाने की बात स्वीकार करते हैं।
हालांकि, 40,000 अरब डॉलर से अधिक के अमेरिकी राष्ट्रीय कर्ज पर केवल आर्थिक वृद्धि के जरिये काबू पाना पर्याप्त नहीं होगा। उन्होंने आईएमएफ और विश्व बैंक की बैंकॉक में आयोजित शरदकालीन बैठक में कहा, ''आर्थिक वृद्धि से मदद तो मिलती है लेकिन जरूरी वित्तीय समायोजन इतनी तेजी से नहीं हो सकते। कोई जादू नहीं है... बजट घाटे और कर्ज को कम करने के लिए अन्य कदम उठाने होंगे।''
जॉर्जीवा और अन्य विशेषज्ञ जिस प्रक्रिया को 'राजकोषीय समेकन' कहते हैं, उसके जरिये कर्ज पर काबू पाने की कोशिशों को कोविड-19 महामारी के दौरान और उसके बाद सरकारों के भारी खर्च से झटका लगा है। आईएमएफ के राजकोषीय मामलों के विभाग के निदेशक रोड्रिगो वाल्देस ने कहा कि कई देशों में राजकोषीय जोखिम बढ़ रहे हैं लेकिन उनसे निपटने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि बड़ी विकसित अर्थव्यवस्थाओं में राजकोषीय अनुशासन की कमी का असर दूसरे देशों पर भी पड़ता है।
आईएमएफ की ताजा राजकोषीय निगरानी रिपोर्ट के अनुसार, सबसे गरीब देशों में राजस्व की तुलना में ब्याज भुगतान ऐतिहासिक रूप से ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है। सहायता में कमी से पैदा हुए वित्तीय अंतर की भरपाई कुछ देश नहीं कर पा रहे हैं। इससे उन्हें कमजोर वर्गों की मदद करने और कर्ज चुकाने के बीच कठिन विकल्प चुनने पड़ रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के प्रशासक और बेल्जियम के पूर्व प्रधानमंत्री अलेक्जेंडर डी क्रू ने कहा कि विकासशील देश विकसित देशों की तुलना में औसतन तीन गुना अधिक ब्याज चुका रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकारों के कुल खर्च का औसतन करीब 10 प्रतिशत कर्ज चुकाने में जा रहा है। ईंधन एवं उर्वरक की ऊंची कीमतों, अल नीनो के प्रभाव तथा महंगे कर्ज ने कम आय वाले देशों के लिए आर्थिक सुधार की गुंजाइश कम कर दी है। इसके साथ, रोजगार सृजन भी बड़ी चुनौती है। कृत्रिम मेधा (एआई) के बढ़ते इस्तेमाल से कई पारंपरिक रोजगार खत्म होने का खतरा है। अगले करीब एक दशक में 1.2 अरब से अधिक युवा वैश्विक कार्यबल में शामिल होंगे, जबकि इस दौरान शुद्ध रूप से केवल 40 करोड़ नए रोजगार ही पैदा होने का अनुमान है।
यूएनडीपी ने इस सप्ताह 'जॉब्स फॉर प्रॉस्पेरिटी' पहल की घोषणा की। इसके तहत सरकारों, विश्व बैंक जैसे विकास बैंकों और निजी कंपनियों के साथ मिलकर पर्यटन, स्वास्थ्य सेवा और खाद्य प्रसंस्करण जैसे रोजगार सृजन वाले क्षेत्रों में निवेश को प्रोत्साहित किया जाएगा।
