चेक बाउंस मामले में कंपनी को पक्ष न बनाए जाने पर शिकायत सुनवाई योग्य नहीं : न्यायालय

punjabkesari.in Tuesday, Aug 04, 2026 - 05:59 PM (IST)

नई दिल्लीः उच्चतम न्यायालय ने चेक बाउंस से जुड़े मामले में एक महिला के खिलाफ जारी आपराधिक कार्यवाही यह कहते हुए रद्द कर दी कंपनी एक "कानूनी व्यक्ति" होती है और अगर उसे खुद मामले में पक्षकार (आरोपी) नहीं बनाया जाता है, तो किसी निदेशक या अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता के खिलाफ शिकायत पर सुनवाई नहीं की जा सकती। 

न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें निचली अदालत से कंपनी को मामले में पक्षकार बनाने के लिए कहा गया था। पीठ ने आरोपी की ओर से पेश वकील अश्विनी कुमार दुबे की इस दलील पर गौर किया कि जब किसी कंपनी के खिलाफ परक्राम्य लिखत (नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स) अधिनियम की धारा-138 के तहत दंडनीय अपराध का मामला दायर किया जाता है, तो कंपनी को आरोपी बनाए बिना उसके निदेशक के खिलाफ शिकायत पर सुनवाई नहीं की जा सकती। 

दुबे ने कहा कि शिकायत और उससे जुड़ी सभी कार्यवाही को रद्द करने का अनुरोध ठुकराकर उच्च न्यायालय ने स्पष्ट गलती की है। पीठ ने कहा, "हमारा मानना है कि उच्च न्यायालय ने मजिस्ट्रेट/निचली अदालत को कंपनी को खुद आरोपी बनाने का निर्देश देकर स्पष्ट रूप से अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है।" उसने कहा, "इसके परिणामस्वरूप और इस बात को ध्यान में रखते हुए कि शिकायत में एक गंभीर खामी है, हमें यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि शिकायत और उससे जुड़ी सभी कार्यवाही रद्द किए जाने योग्य हैं और उन्हें रद्द किया जाता है।" 

पीठ ने कहा कि कंपनी एक "ऐसी इकाई होती है, जिसे कानून व्यक्ति का दर्जा देता है" और वह बैंक में अपने नाम से खाता रख सकती है। उसने कहा, "इसलिए अगर संबंधित चेक कंपनी के खाते से जारी किया गया है और एनआई अधिनियम की धारा 138 की अन्य शर्तें पूरी होती हैं, तो अपराध कंपनी की ओर से किया गया माना जाएगा।" 


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Content Writer

jyoti choudhary

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