आम आदमी के खर्चों पर पड़ने वाली है चौतरफा मार, पेट्रोल-डीजल के बाद और क्या-क्या होगा महंगा?
punjabkesari.in Tuesday, May 26, 2026 - 08:29 AM (IST)
बिजनेस डेस्कः पिछले 10 दिनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में करीब 7.5 रुपए तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर अब सीधे आम लोगों की जेब पर दिखाई देने लगा है। यह महंगाई केवल वाहन चालकों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसका असर रोजमर्रा की जिंदगी के लगभग हर हिस्से पर पड़ता है। ईंधन महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ती है, जिसके कारण खाने-पीने की चीजों से लेकर कपड़े, यात्रा और ऑनलाइन सेवाएं तक महंगी हो जाती हैं।
रसोई पर सबसे ज्यादा असर
डीजल की कीमत बढ़ते ही माल ढुलाई महंगी हो जाती है। फल, सब्जियां, अनाज, दूध और अन्य जरूरी सामान ट्रकों के जरिए शहरों तक पहुंचते हैं, इसलिए ट्रांसपोर्ट खर्च बढ़ने का सीधा असर बाजार कीमतों पर पड़ता है। आलू, प्याज, टमाटर जैसी रोजमर्रा की सब्जियों के दाम तेजी से बढ़ सकते हैं। वहीं दूध, दाल, खाद्य तेल और पैकेट वाले सामान भी महंगे होने लगते हैं, जिससे घरेलू बजट पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
यात्रा और रोजाना का सफर पड़ेगा भारी
ईंधन महंगा होने का असर सार्वजनिक और निजी परिवहन पर भी साफ दिखाई देता है। ऑटो, टैक्सी, कैब और बस सेवाओं के किराए बढ़ जाते हैं। निजी वाहन इस्तेमाल करने वालों का मासिक फ्यूल खर्च भी काफी बढ़ जाता है। इसके अलावा लॉजिस्टिक्स कंपनियों की लागत बढ़ने से ऑनलाइन डिलीवरी सेवाएं भी महंगी हो सकती हैं। विमान ईंधन की कीमतें बढ़ने से हवाई टिकट महंगे होते हैं, जबकि लंबी दूरी की बस और ट्रेन यात्राओं का खर्च भी बढ़ जाता है।
कपड़े और लाइफस्टाइल उत्पादों पर भी असर
कपड़ा उद्योग और अन्य उपभोक्ता सामानों की सप्लाई भी बड़े पैमाने पर परिवहन पर निर्भर करती है। ईंधन की कीमतें बढ़ने से कपड़ों की मैन्युफैक्चरिंग और डिलीवरी लागत बढ़ जाती है। सिंथेटिक कपड़ों में इस्तेमाल होने वाले कई रसायन भी क्रूड ऑयल से जुड़े होते हैं, इसलिए उनकी लागत में भी इजाफा होता है। इसका असर बाजार में बिकने वाले कपड़े, फुटवियर, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य लाइफस्टाइल प्रोडक्ट्स की कीमतों पर पड़ता है।
मिडिल क्लास पर बढ़ता दबाव
लगातार बढ़ती महंगाई का सबसे ज्यादा असर मिडिल और लोअर मिडिल क्लास परिवारों पर पड़ता है। घर का मासिक बजट बिगड़ने लगता है और लोग गैर-जरूरी खर्चों में कटौती करने को मजबूर हो जाते हैं। इससे बाजार में खरीदारी कम होती है और आर्थिक गतिविधियों पर भी असर पड़ सकता है।
